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ChatGPT Caste Controversy: AI भी ‘सवर्ण सोच’ से ग्रसित? UPSC गुरु विजेंद्र चौहान के बयान से बवाल

ChatGPT Caste Vijendra Chauhan: भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में जातिवाद की जड़ें लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं में देखी जाती रही हैं। लेकिन अब यह बहस एक नए मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सवाल तकनीक की निष्पक्षता पर उठने लगे हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जिसे अब तक तटस्थ और वस्तुनिष्ठ माना जाता था, क्या वह भी सामाजिक पूर्वाग्रहों से अछूता है? यूपीएससी अभ्यर्थियों को पढ़ाने वाले चर्चित शिक्षक विजेंद्र चौहान के वायरल वीडियो ने इसी सवाल को केंद्र में ला दिया है। उनके बयान ने ChatGPT जैसे एआई टूल्स, उनके प्रशिक्षण डेटा और समाज में व्याप्त असमानताओं के बीच संबंध पर गंभीर चर्चा छेड़ दी है।

ChatGPT caste Vijendra Chauhan

ChatGPT का 'सवर्ण' कनेक्शन और विजेंद्र चौहान का दावा

विजेंद्र चौहान ने अपने वीडियो में बताया कि ChatGPT का पूरा नाम 'जेनरेटिव प्री-ट्रेंड ट्रांसफार्मर' है और इसकी सबसे बड़ी चुनौती इसका 'प्री-ट्रेंड' होना है। उनका तर्क है कि इंटरनेट पर मौजूद अधिकतर डेटा उन्हीं वर्गों ने तैयार किया है जिनका लंबे समय से सूचना और विमर्श पर प्रभुत्व रहा है। ऐसे में एआई अनजाने में उच्च जातियों के दृष्टिकोण को प्राथमिकता दे सकता है। चौहान के मुताबिक, किसी भी प्रॉम्प्ट पर एआई का जवाब सवर्ण सोच से प्रभावित होने की आशंका रहती है।

AI स्वयं जातिवादी नहीं, प्रशिक्षित करने वाला डेटा पक्षपाती

शिक्षक का तर्क है कि एआई स्वयं जातिवादी नहीं होता, बल्कि उसे प्रशिक्षित करने वाला डेटा पक्षपाती है। उन्होंने 'कचरा अंदर, कचरा बाहर' (Garbage In, Garbage Out) के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यदि इनपुट डेटा में सामाजिक भेदभाव मौजूद है, तो आउटपुट भी उसी का प्रतिबिंब होगा। विजेंद्र चौहान के अनुसार, एआई एल्गोरिदम उन वर्गों के डेटा को अधिक महत्व देता है जिनका प्रतिनिधित्व इंटरनेट पर अधिक है, जो सामाजिक न्याय की अवधारणा के खिलाफ जा सकता है।

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सोशल जस्टिस बनाम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

चौहान ने चेतावनी दी कि जिस तकनीक की बुनियाद ही ऐतिहासिक रूप से पक्षपाती डेटा पर रखी गई हो, उससे सामाजिक न्याय की अपेक्षा करना कठिन है। उनके मुताबिक, एआई द्वारा दिए गए जवाब महज तकनीकी सूचना नहीं होते, बल्कि वे समाज में मौजूद गहरी असमानताओं को डिजिटल रूप में दोहराते और मजबूत करते हैं। यही वजह है कि यह बहस अब केवल तकनीक तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक गंभीर सामाजिक सवाल बन गई है-क्या भविष्य की मशीनें अतीत के जातिगत भेदभाव को और अधिक गहरा करेंगी?

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सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर

जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ, कई यूज़र्स ने विजेंद्र चौहान पर 'जातिवाद का जहर' फैलाने का आरोप लगाया। आलोचकों का तर्क है कि एआई एक गणितीय मॉडल (Mathematical Model) है और इसमें जाति ढूंढना बेतुका है। लोगों का कहना है कि एक शिक्षक (Vijendra Chauhan caste controversy) को तकनीक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए, न कि उसे सामाजिक विभाजन का जरिया बनाना चाहिए।

दूसरी ओर, एक बड़ा वर्ग चौहान के समर्थन में खड़ा है। समर्थकों का तर्क है कि वैश्विक स्तर पर 'एल्गोरिद्मिक बायस' (Algorithmic Bias) एक प्रमाणित तथ्य है। उनका कहना है कि अगर डेटा पक्षपाती है, तो एआई कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता। समर्थकों के अनुसार, चौहान ने केवल उस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है कि कैसे डिजिटल दुनिया में भी हाशिए के समुदायों का प्रतिनिधित्व कम है और एआई अनजाने में पुरानी रूढ़ियों को मजबूत कर रहा है।

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