Chandrayaan 2: क्यों बिगड़ी लैंडर विक्रम की चांद पर लैंडिंग? ISRO वैज्ञानिक ने बताए तीन बड़े कारण
नई दिल्ली। चांद पर लैंडिंग से ठीक पहले चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का इसरो से संपर्क टूट गया था, जिसके बाद से इसरो के वैज्ञानिक लगातार उससे संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं। अब अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा भी इसरो की मदद में जुट गई है। लैंडर विक्रम को लेकर इसरो की तरफ से बयान आया था कि वह पूरी तरह सुरक्षित है और लैंडर को कोई नुकसान नहीं हुआ है। हालांकि, परेशानी की बात ये है कि धीरे-धीरे समय निकलता जा रहा है लेकिन अभी तक लैंडर विक्रम से संपर्क स्थापित नहीं हो सका है। इस बीच, इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद के पूर्व निदेशक और आईआईटी खड़गपुर के एडजंक्ट प्रोफेसर तपन मिश्रा ने लैंडर विक्रम की चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग ना होने के पीछे कारणों को चरणबद्ध तरीके से समझाने की कोशिश की है।

थ्रस्टर्स का सही समय पर एकसाथ स्टार्ट ना हो पाना
तपन मिश्रा ने समझाया है कि कैसे लैंडिंग में गड़बड़ी आई होगी। विक्रम लैंडर चांद की सतह से 30 किमी की दूरी पर 1.66 किमी प्रति सेकंड की रफ्तार से चक्कर लगा रहा था। जब उसे लैंड करना था तो तब लैंडर को सीधे रहना था और उसकी गति 2 मीटर प्रति सेकंड होनी चाहिए थी। विक्रम लैंडर में पांच बड़े थ्रस्टर्स हैं जो लैंडिंग में मदद करने के लिए थे। इसके अलावा लैंडर विक्रम पर 8 थ्रस्टर्स और भी हैं। थ्रस्टर्स छोटे रॉकेट की तरह होते हैं जो किसी वस्तु को आगे या पीछे करने में मदद करते हैं। 5 बड़े थ्रस्टर्स विक्रम के नीचे लगे थे, चार थ्रस्टर्स चार कोनों में और एक बीच में। ये विक्रम को ऊपर-नीचे ले जाने में मदद करने के लिए थे। 8 छोटे थ्रस्टर्स विक्रम की दिशा निर्धारण में मदद करते। तपन मिश्रा का कहना है कि हो सकता है चांद की सतह पर 400 मीटर ऊंचाई पर लैंडिंग के समय सभी बड़े थ्रस्टर्स में एक साथ ईंधन ना पहुंचा हो। इससे ये हुआ होगा कि सारे थ्रस्टर्स एकसाथ स्टार्ट ना हुए हों। इस कारण लैंडर तेजी से घूमने लगा होगा और संतुलन खो दिया होगा।

सही मात्रा में ईंधन का इंजन तक ना पहुंच पाना
इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद के पूर्व निदेशक का कहना है कि विक्रम लैंडर का बड़ा हिस्सा ईंधन की टंकी है। लैंडर की तेज गति, ब्रेकिंग की वजह से इंजन के नॉजल में ईंधन सही से नहीं पहुंचा होगा। इसकी वजह से लैंडिंग के समय थ्रस्टर्स को पूरा ईंधन ना मिलने से भी लैंडिंग में दिक्कत आ सकती है। 30 किमी की दूरी से 400 मीटर की दूरी तक आने में विक्रम लैंडर की गति 60 मीटर प्रति सेकंड हो गई थी। लैंडर की दिशा भी हॉरिजोंटल से वर्टिकल हो चुकी थी। इस पूरे समय कोनों पर मौजूद चार थ्रस्टर्स काम कर रहे थे जबकि बीच वाला थ्रस्टर्स बंद था। नीचे के चार थ्रस्टर्स में से दो बंद कर अगल-बगल लगे दो छोटे थ्रस्टर्स को ऑन किया गया ताकि नीचे आने के साथ विक्रम हेलीकॉप्टर की तरह मंडरा सके और लैंडिंग के लिए सही जगह खोज सके। लेकिन यहीं कहीं पर थ्रस्टर ने विक्रम का साथ नहीं दिया होगा।

चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति
लैंडिंग से 100 मीटर की दूरी पर विक्रम लैंडर हेलीकॉप्टर की तरह मंडराता, चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को बर्दाश्त करने के लिए अगल-बगल के छोटे थ्रस्टर्स ऑन रहते, लैंडर का कैमरा लैंडिंग वाली जगह खोजता और फिर लैंड करता। कैमरे से ली गई तस्वीर ऑनबोर्ड कंम्प्यूटर में स्टोर की गई तस्वीर से मैच करती। इसके बाद लैंडर मंडराना बंद कर धीरे-धीरे चार बड़े थ्रस्टर्स को बंद कर बीच वाले 5वें थ्रस्टर की मदद से सॉफ्ट लैंड करने में कामयाब हो जाता। इस वक्त लैंडर में लगा रडार अल्टीमीटर लैंडर की ऊंचाई का खयाल रखता। चूंकि लैंडिंग ऑटोमैटिक थी, यहीं पर गुरुत्वाकर्षण को विक्रम लैंडर भांप नहीं पाया होगा क्योंकि वहां गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में बदलाव आता रहता है।












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