सीबीआई पर सुप्रीम कोर्ट के सवालों में ही छुपा है उसका जवाब
बंगलुरू। देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई का सियासी दुरुपयोग करने का आरोप लगता रहा है, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत ने इस बार सीबीआई को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के मुताबिक हाई प्रोफाइल मामलों में दोषियों को सजा दिलाने में अक्सर सुस्त और नाकाम रहती है। सुप्रीम कोर्ट की उक्त टिप्पणी के बाद एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि सत्ता में बैठी सरकारें सियासी फायदों के लिए सीबीआई का दुरुपयोग करती है।

निःसंदेह सुप्रीम कोर्ट के सवालों से एक बार फिर सीबीआई की छवि पिंजरे में कैद तोते जैसी हो गई है। यह पहला मौका नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के खिलाफ सख्त टिप्पणी की है। इससे पहले वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कोयला खदान आवंटन घोटाले की जांच रिपोर्ट के मूल तत्व में बदलाव को लेकर सरकार और केन्द्रीय जांच ब्यूरो की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि जांच एजेन्सी तो 'पिंजरे में बंद तोते' जैसी हो गई है।
आपको अगर याद हो तो उस समय सीबीआई निदेशक थे रंजीत सिन्हा? बाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा ने भी सहमति जताते हुए कहा कि जो भी कोर्ट ने सीबीआई के बारे में जो कहा है, वह बिल्कुल सही है. हालांकि बाद में सरकार का बचाव करते हुए कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि सरकार ने कुछ भी गलत नहीं किया है और कोलगेट की जांच में किसी भी तरह की दखलअंदाजी नहीं हुई है।

सीबीआई निदेशक के बयान के बाद सत्तासीन कांग्रेस नीत यूपीए 2 सरकार की खूब फजीहत हुई थी और विपक्ष में बैठी बीजेपी नेता बलबीर पुंज ने कहा कि सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा ने बिल्कुल सही कहा है। यह बिल्कुल सत्य है कि जांच एजेंसी सीबीआई अब कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन बन गई है और यह बात बीजेपी पहले से कहती आ रही है, जिसे सीबीआई निदेशक अंततः स्वीकार कर लिया।
दरअसल, कोयला घोटाले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति आरएम लोढा, न्यायमूर्ति मदन लोकूर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार और सीबीआई को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि सरकारी अधिकारियों के सुझाव पर रिपोर्ट का मूल तत्व ही बदल दिया गया है, जिसके चलते जांच की पूरी दिशा ही बदल गई थी। तब मामले की जांच कर रहे उप महानिरीक्षक रविकांत मिश्रा को तत्काल वापस लेने के लिए सीबीआई और सरकार को कदम उठाने का निर्देश दिया था, जिसके बाद रविकांत मिश्रा का गुप्तचर ब्यूरो में भेज दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर जवाब देते हुए सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने कहा कि पेचीदा मामलों में जब भी निष्पक्ष जांच की मांग होती है, तब आज भी लोग सीबीआई जांच की मांग करते हैं. उन्होंने कहा कि एजेंसी को सरकार, न्यायपालिका और लोगों का विश्वास हासिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी में यह भी जोड़ते हुए कहा था कि सीबीआई की जांच प्रक्रिया को किसी राजनीतिक दबाव से दूर रखने के लिए इसे महालेखा परीक्षक (CAG) के समान वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे सीबीआई सरकार के 'प्रशासनिक नियंत्रण' से पूरी तरह 'अलग' हो सकेगी। वर्ष 2018 में सीबीआई इतिहास में पहली बार दिखा जब दो शीर्ष अधिकारियों ने एकदूसरे पर रिश्वत लेने का आरोप जड़ा। इससे सीबीआई की प्रतिष्ठा पर धूल में मिलने से बच गई।
दरअसल, सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा ने कि गोश्त निर्यातक मोइन कुरैशी के खिलाफ एक मामले को रफा-दफा करने के लिए तीन करोड़ रुपए की रिश्वत लेने के कथित आरोप में सीबीआई अधिकारी राकेश अस्थाना के खिलाफ मामला दर्ज किया. इसके बाद राकेश अस्थाना ने एक दर्जन से अधिक मामलों में अपने बॉस आलोक कुमार वर्मा के खिलाफ रिश्वत लेने के आरोप लगा दिए।
मामले ने इतना तूल पकड़ लिया था कि केंद्र सरकार के हस्तक्षेप करना पड़ा। सरकार को दोनों अधिकारियों को होकर अवकाश पर भेजना पड़ा और सीबीआई के संयुक्त निदेशक एम. नागेश्वर राव को एजेंसी का अंतरिम निदेशक बनाया गया. हालांकि इसके बाद अपने खिलाफ लगे आरोपों और सरकार द्वारा अधिकार वापस लेने और छुट्टी पर भेजने के फैसले के खिलाफ आलोक वर्मा सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। सीबीआई के 1941 में अस्तित्व में आने के बाद पहली बार इस तरह घटना सामने आई थी।
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