दून स्कूल के तीन CM, अगर स्कूल का याराना न होता तो राजनीति में नहीं आते कैप्टन अमरिंदर
नई दिल्ली, 22 सितंबर: दून स्कूल की भारतीय राजनीति में धूम रही है। इस स्कूल ने भारत को एक प्रधानमंत्री और तीन मुख्यमंत्री दिये हैं। दून स्कूल में पढ़ने वाले राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री बने थे। इसी तरह इस स्कूल ने तीन मुख्यमंत्री दिये हैं जिनके नाम हैं नवीन पटनायक, कैप्टन अमरिंदर सिंह और कमलनाथ। नवीन पटनायक अभी भी मुख्यमंत्री हैं। लेकिन कमलनाथ और कैप्टन अमरिंदर सिंह को विपरित परिस्थियों में मुख्यमंत्री पद को छोड़ना पड़ा था। दून स्कूल के जमाने से ही कैप्टन अमरिंदर की राजीव गांधी से दोस्ती थी। संजय गांधी ने भी दून स्कूल से पढ़ाई की थी। उनकी कमलनाथ से दोस्ती थी।

दून स्कूल में पढ़े, सेना में अधिकारी बने
कैप्टन अमरिंदर सिंह के पिता यादविंदर सिंह पटियाला के अंतिम महाराजा थे। दून स्कूल में तब राजा-महाराजा, बड़े नेताओं और उद्योगपतियों के बच्चे ही पढ़ते थे। कैप्टन अमरिंदर सिंह, राजीव गांधी और अरुण सिंह (राजीव गांधी के कैबिनेट में मंत्री थे) दून स्कूल के 1959 बैच के छात्र थे। तीनों में पक्की दोस्ती थी। राजीव गांधी प्रधानमंत्री के पुत्र थे लेकिन उनकी राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी। वे पायलट बनना चाहते थे। अमरिंदर सिंह महाराजा पटियाला के पुत्र थे लेकिन सेना में जाने का सपना देख रहे थे। अमरिंदर सिंह ने नेशनल डिफेंस एकेडमी और इंडियन मिलिट्री कॉलेज देहरादून से पढ़ाई की सेना में अफसर बन गये। 1963 से 1966 तक वे सेना में रहे। 1965 की भारत पाकिस्तान लड़ाई में भी वे शामिल हुए। सेना में वे कैप्टन रैंक के अधिकारी थे इसलिए उनके नाम के साथ आज भी कैप्टन अमरिंदर सिंह लिखा जाता है। राजीव गांधी भी दून स्कूल से पढ़ाई समाप्त करने के बाद पायलट बन चुके थे। राह अलग- अलग होने के बाद भी अमरिंदर सिंह और राजीव गांधी में दोस्ती बरकरार रही।

राजीव गांधी से याराना
1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में वापसी के लिए चुनाव लड़ रही थीं। पिछली गलतियों से सबक सीख कर वे इस चुनाव में फूंक-फूंक कर कदम उठा रही थीं। वे योग्य और सुलझे उम्मीदवारों की तलाश में थीं। राजीव गांधी राजनीति में नहीं थे लेकिन वे अपनी मां के लिए चिंतित थे। उन्होंने अमरिंदर सिंह से बात की और उन्हें कांग्रेस से चुनाव लड़ने के लिए मना लिया। 1980 में अमरिंदर सिंह लोकसभा के लिए चुन लिये गये। इस तरह राजीव गांधी के कहने पर वे राजनीति में दाखिल हो गये। अमरिंदर सिंह का राजीव गांधी के घर आना-जाना था। प्रियंका और राहुल गांधी उन्हें अंकल कहते थे। अमरिंदर सिंह ने एक बार बताया था कि राजीव गांधी उनके जिगरी दोस्त थे लेकिन उम्र में उनसे एक साल छोटे थे। अमरिंदर सिंह के साथ सोनिया गांधी का मैत्री भाव पहले की तरह बना रहा लेकिन उनको लेकर राहुल गांधी को कुछ समस्याएं थीं। चर्चित लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह ने अमरिंदर सिंह की जीवनी लिखी है जिसका नाम है- कैप्टन अमरिंदर सिंह : द पीपल्स महाराजा। इस किताब में खुशवंत सिंह ने राजीव गांधी और अमरिंदर सिंह के बारे में बहुत कुछ लिखा है।

अमरिंदर सिंह और राहुल गांधी
खुशवंत सिंह के मुताबिक, 2015 में पंजाब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे प्रताप सिंह बाजवा। कैप्टन अमरिंदर सिंह बाजवा को हटा कर खुद अध्यक्ष बनना चाहते थे। उनका कहना था कि अगर कांग्रेस को 2017 में चुनाव जीतना है तो उन्हें पार्टी के चलाने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को धमकी दे दी कि अगर उन्हें काम करने की पूरी आजादी नहीं मिली तो वे पार्टी छोड़ देंगे। सोनिया गांधी को अमरिंदर सिंह पर पूरा भरोसा था और उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए राजी थीं। लेकिन राहुल गांधी ऐसा नहीं चाहते थे। बाजवा राहुल गांधी की पसंद थे। बाजवा, अमरिंदर सिंह की मुखालफत करते रहे। जब बात नहीं मानी गयी तो अमरिंदर सिंह ने खुद को कांग्रेस से अलग कर लिया। तब राहुल गांधी ने कैप्टन से मुलाकात की। राहुल गांधी ने पूछा, क्या आप पार्टी छोड़ने पर विचार कर रहे हैं ? तब अमरिंदर सिंह ने जवाब दिया, जो आपने सुना है, बिल्कुल सही सुना है। इसके बाद राहुल गांधी और अमरिंदर सिंह में बहुत तर्क हुआ। अमरिंदर सिंह ने कहा, अगर मैं कांग्रेस के लिए कारगर नहीं तो मेरा विकल्प आप खोज लीजिए। जब आपके पास मेरे लिए कोई योजना नहीं है तो मुझे खुद ही रास्ता बनाना होगा। तब राहुल गांधी ने कहा, यह फैसला न केवल पार्टी और बल्कि आपके लिए भी खराब होगा। तब अमरिंदर सिंह ने कहा, ऐसा होता है तो होने दीजिए। राहुल गांधी और अमरिंदर सिंह की इस मुलाकात के एक महीना बाद सोनिया गांधी के निर्देश पर पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। आखिरकार अमरिंदर सिंह की बात मानी गयी।

2017 में अपने दम पर दिलायी सत्ता
2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह विधानसभा चुनाव में फ्रीहैंड मिला था। प्रशांत किशोर जैसे चुनावी रणनीतिकार भी मिल गये। अमरिंदर सिंह ने चुनाव से पहले कांग्रेस की गुटबाजी पर एक हद कर अंकुश लगा दिया। कांग्रेस के जिन मजबूत नेताओं ने नाराजगी की वजह से पार्टी छोड़ दी थी उन्हें वापस बुला लिया गया। यहां तक कि उन्होंन पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को भी कांग्रेस से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। तब अमरिंदर सिंह को क्या मालूम था कि यही नवजोत सिद्धू एक दिन उनके रास्ते का रोड़ा बन जाएंगे। भाजपा छोड़ने के बाद सिद्धू ने शुरू में आम आदमी पार्टी में भी मौका तलाशा था। वे अपनी शर्तों पर 'आप' में आना चाहते थे। लेकिन बात नहीं बनी। तब उन्होंने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। कैप्टन अमरिंदर ने प्रशांत किशोर के सहयोग से योजना के मुताबिक चुनाव का संचालन किया। दो चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को फिर सत्ता नसीब हुई।

नवजोत सिंह सिद्धू बनाम कैप्टन अमरिंदर सिंह
सिद्धू ने राहुल गांधी के दिल्ली स्थित बंगले पर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। इसलिए यह माना जाता है कि सिद्धू राहुल के करीबी हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले ही सिद्धू कांग्रेस में आये थे। तब एक डील की बहुत चर्चा थी। चर्चा के मुताबिक कांग्रेस ने सिद्धू से वायदा किया था कि अगर पार्टी को चुनाव में जीत मिलती है तो उन्हें डिप्टी सीएम बनाया जाएगा। लेकिन जीत मिलने के बाद यह वायदा पूरा नहीं किया गया। 2017 की जीत के बाद अमरिंदर सिंह और शक्तिसाली नेता के रूप में स्थापित हो गये। सिद्धू उनकी ताकत से वाकिफ थे। इसलिए शुरू में चुप रहे। लेकिन धीरे-धीरे वे अमरिंदर सिंह के खिलाफ पत्ते चलते गये। चार साल में सिद्धू ने अमरिंदर सिंह को तो सत्ता से बेदखल कर दिया। लेकिन वे अपनी दिली तमन्ना पूरी नहीं कर सके। उनका सीएम बनने का सपना अधूरा ही रह गया। अमरिंदर-सिद्धू की लड़ाई में चरणजीत सिंह चन्नी की किस्मत खुल गयी।
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