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पति या पत्नी ना चाहें तो भी साथ रहने को मजबूर कर सकती है अदालत?

विवाह
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पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध ना बन रहे हों या वो साथ ना रह रहे हों, तो ये मसला आपस में सुलझाने का है या अदालत के ज़रिए? अदालत का दख़ल क्या उनकी निजता का हनन है? और क्या इस मुद्दे पर मौजूदा क़ानूनी प्रावधान औरतों के लिए घरेलू हिंसा और शादी में बलात्कार का ख़तरा पैदा करते हैं?

गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के दो छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसे सवाल खड़ी करती एक याचिका दायर की है जिसपर अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उनकी राय पूछी है.

'हिन्दू मैरिज ऐक्ट 1955' के सेक्शन नौ और 'स्पेशल मैरिज ऐक्ट 1954' के सेक्शन 22 के मुताबिक कोई मर्द या औरत अदालत जाकर अपनी पत्नी या पति को विवाह के संबंध बनाए रखने के लिए विवश करने का ऑर्डर पारित करवा सकता है.

अब छात्रों ने याचिका में मांग की है कि, "विवाह के संबंध बहाल करनेवाले क़ानूनी प्रावधान असंवैधानिक हैं और उन्हें हटा देना चाहिए."

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रितानी शासन के वक्त से चले आ रहे निजी संबंधों से जुड़े दो क़ानूनों - धारा 377 के तहत आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंध को अपराध बताने और धारा 497 के तहत अडल्ट्री यानी व्याभिचार को अपराध बताने - को असंवैधानिक क़रार दिया था.

क्या कहता है मौजूदा क़ानून?

'हिन्दू मैरिज ऐक्ट 1955' और 'स्पेशल मैरिज ऐक्ट 1954' के तहत पति या पत्नी एक दूसरे के ख़िलाफ़ ज़िला अदालत में शिकायत कर, फिर से शारीरिक संबंध बनाने और साथ रहने का आदेश पारित करवा सकते हैं.

इसके लिए शिकायत करनेवाले पक्ष को ये साबित करना होगा कि शादी के बावजूद अलग रहने की कोई वाजिब वजह नहीं है.

अदालत के संबंधों की बहाली के आदेश को ना मानने की सूरत में सज़ा भी तय है.

शादी
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एक साल में आदेश ना माने जाने की सूरत में अदालत उस व्यक्ति की जायदाद शिकायतकर्ता के नाम कर सकती है, उसे 'सिविल जेल' में डाल सकती है या फिर इस बिनाह पर तलाक़ को मंज़ूरी दे सकती है.

भारतीय क़ानून में ये प्रावधान ब्रितानी शासन की देन हैं. ब्रिटेन ने ये प्रावधान तब बनाए थे जब पत्नी को अपने पति की 'संपत्ति' माना जाता था.

साल 1970 में ब्रिटेन ने 'मैट्रिमोनियल प्रोसीडिन्ग्स ऐक्ट 1970' के ज़रिए वैवाहिक संबंध बहाली का ये प्रावधान हटा दिया. पर भारत में ये अब भी लागू है.

कैसे इस्तेमाल किया जाता रहा है ये प्रावधान?

शादी को बनाए रखने के कथित उद्देश्य से बनाए गए इस प्रावधान की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि निजी जीवन में इसे लागू कैसे किया जाए.

अगर किसी शादी में रिश्ते इतने बुरे हो चुके हैं कि पति और पत्नी एक साथ रह ही नहीं पा रहे और उनके बीच शारीरिक संबंध भी नहीं बन रहे तो एक व्यक्ति के द्वारा हासिल किया गया क़ानूनी आदेश दूसरे को विवश कैसे कर सकता है.

दरअसल इस क़ानून का इस्तेमाल संबंध बहाली के लिए कम और अन्य मक़सद हासिल करने के लिए ज़्यादा किया जाता रहा है.

मसलन अगर पत्नी गुज़ारा भत्ते की मांग करे तो पति संबंध ना होने का हवाला दे सकता है और भत्ता देने की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए संबंध बहाली की मांग कर सकता है.

भारतीय क़ानून के तहत अदालत, पति को अपनी पत्नी, बच्चों और मां-बाप के रखरखाव के लिए मासिक गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दे सकती है.

अगर पत्नी बेहतर कमाती हो तो ऐसा ही आदेश उसे भी दिया जा सकता है.

इसके अलावा संबंध बहाली का प्रावधान तलाक़ लेने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता रहा है. अगर पति या पत्नी के पास तलाक़ लेने की कोई और वजह ना हो तो इस बिनाह पर तलाक़ की मांग की जाती है कि पति और पत्नी में शारीरिक संबंध नहीं बन रहे या वो साथ नहीं रह रहे हैं.

ये प्रावधान औरतों के लिए मददगार हैं या ख़तरनाक?

क़ानून में पति और पत्नी को बराबरी का दर्जा दिया गया है. यानी दोनों में से कोई भी वैवाहिक संबंध दोबारा बनाने की मांग कर सकता है.

लेकिन समाज में शादी की व्यवस्था में अब भी व्याप्त गैर-बराबरी के चलते कई केस दिखाते हैं कि इस प्रावधान का ज़्यादा इस्तेमाल पति की ओर से पत्नी पर हक़ जमाने या उसका हक़ छीनने के लिए किया गया है.

महिलावादी ऐक्टिविस्ट्स के मुताबिक परिवारों में औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा पर चुप्पी और शादी में बलात्कार को क़ानूनी मान्यता ना होने के वजह से, ऐसे प्रावधान औरतों को उन शादियों में रहने को मजबूर कर सकते हैं जहां उन्हें घरेलू और यौन हिंसा का सामना करना पड़े.

साल 2015 में महिला और बाल विकास मंत्रालय की ओर से बनाई गई 'हाई लेवल कमेटी ऑन द स्टेटस ऑफ़ वुमेन' की रिपोर्ट में भी इस प्रावधान के ग़लत इस्तेमाल की बात कही गई थी.

कमेटी ने अपनी सिफ़ारिश में कहा था कि, "जब भी महिला गुज़ारा भत्ते का दावा करे या हिंसा की शिकायत करे तब पति की ओर से वैवाहिक संबंधों की बहाली का मुक़दमा दायर कर दिया जाता है. इसके अलावा ये प्रावधान मानवाधिकारों के ख़िलाफ़ है और किसी व्यक्ति को दूसरे के साथ रहने के लिए विवश करना ग़लत है."

क्यों की जा रही है इसे हटाने की मांग?

साल 2018 में 'फ़ैमिली लॉ में सुधार' पर प्रकाशित कनसल्टेशन पेपर में लॉ कमीशन ने वैवाहिक संबंध बहाली के इन प्रावधानों को हटाने की सिफ़ारिश की थी.

'हाई लेवल कमेटी ऑन द स्टेटस ऑफ़ वुमेन' की रिपोर्ट से सहमति जताते हुए कमीशन ने कहा था, "आज़ाद भारत में ऐसे प्रावधानों की कोई ज़रूरत नहीं. क़ानून में पहले ही शारीरिक संबंध ना बनने पर तलाक़ लेने का प्रावधान है. मर्द और औरत दोनों अब आर्थिक रूप से सक्षम होने लगे हैं. मुश्किल से मिली इस आज़ादी पर ऐसी बंदिशें लगाना जायज़ नहीं है."

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में छात्रों ने इन दोनों रिपोर्ट का हवाला दिया है और प्रावधान हटाए जाने की मांग करते हुए कहा है कि इनका दुष्प्रभाव ये है कि, "ये दिखने में बराबरी वाला क़ानून है पर औरत को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ससुराल में रहने पर विवश करता है, उसे पति की जायदाद की नज़र से देखता है, पति और पत्नी की निजता का उल्लंघन है और शादी के ढांचे को व्यक्तिगत खुशहाली के ऊपर रखता है.

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