चीन, पाकिस्तान और नेपाल के साथ सीमा विवाद मोदी की अग्निपरीक्षा

भारत-चीन
NICOLAS ASFOURI
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पाकिस्तान, चीन और नेपाल के साथ अक्सर भारत का सीमा विवाद सामने आता रहता है लेकिन इस समय भारत का तीनों पड़ोसियों से एक साथ सीमा पर उलझना बड़ी चुनौती बन गया है.

ताज़ा मामला चीन का है, जहाँ विवाद बातचीत से होते-होते झड़प तक पहुँच गया है.

भारतीय सेना के मुताबिक भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में सोमवार रात को दोनों देशों की सेना में ज़ोरदार संघर्ष हुआ था. इसमें भारत के 20 सैनिक मारे गए हैं. भारत का दावा है कि चीन को नुक़सान हुआ है.

लेकिन चीन ने अभी तक इस बारे में कोई भी आधिकारिक बयान नहीं दिया है.

इस घटना के बाद से दोनों देशों के बीच तनाव और ज़्यादा बढ़ गया है. अक्साई चिन में दोनों देशों के बीच लंबे समय से टकराव की स्थिति बनी हुई थी.

चीन का आरोप है कि भारत अक्साई चिन स्थित गलवान घाटी में रक्षा संबंधी गैर-क़ानूनी निर्माण कर रहा है जबकि ये एक विवादित इलाक़ा है. इसके बाद से दोनों देश सीमा पर सैनिकों की संख्या बढ़ाने लगे.

नेपाली सैनिक
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नेपाली सैनिक

नेपाल और पाकिस्तान से टकराव

हालिया महीनों में भारत की ओर से नेपाल सीमा के पास सड़क निर्माण के काम की वजह से तनाव बढ़ा है. यहाँ कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख को लेकर दोनों के बीच टकराव है.

नेपाल का कहना है कि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद भारत की ओर से जारी किए गए नए नक़्शे में विवादित जगहों को भारत के हिस्से में दिखाया गया है.

इसके बाद नेपाल ने इन तीनों इलाक़ों को अपने हिस्से में दिखाते हुए देश का नया नक्शा प्रकाशित किया. इस नक्शे को नेपाली संसद के निचले सदन ने मंज़ूरी दे दी है.

भारत और पाकिस्तान में भी कश्मीर को लेकर तनाव हमेशा ही रहा है. पिछले साल कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़े हैं.

गिलगित-बलतिस्तान में चुनाव कराने को लेकर पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भारत ने इस पर आपत्ति जताई थी.

इसके बाद भारत ने न्यूज़ चैनल्स पर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर (पीओके) के मौसम का हाल बताना शुरू कर दिया था. इसके जवाब में पाकिस्तानी रेडियो पर भारत प्रशासित कश्मीर के मौसम का हाल बताया जाने लगा था.

इस तरह तीनों पड़ोसियों के साथ भारत सीमा विवाद को लेकर जूझ रहा है. भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि नेपाल के साथ 'रोटी-बेटी का रिश्ता' है और मसला बताचीत से हल होगा. इसके बाद भी नेपाल के रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया है.

वहीं, सीएए और एनआरसी के मसले पर बांग्लादेश से भी भारत के संबंधों में खटास आ गई थी. नागरिकता क़ानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमिन और गृह मंत्री असद उज़्ज़मान ख़ान ने अपना भारत दौरा रद्द कर दिया था.

कोरोना वयारस से लड़ाई और गिरती अर्थव्यवस्था के बीच सीमा पर पड़ोसियों से तनाव भारत के लिए एक गंभीर स्थिति बन गई है. ये स्थितियां कैसे बनीं और इससे निपट पाना भारत के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होगा?

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

तीनों पड़ोसियों से एकसाथ संघर्ष क्यों?

अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सिंह के मुताबिक ये भारत की विदेश नीति की परीक्षा का समय है. तीनों देशों से विवाद तो लंबे समय से था लेकिन इस समय स्थितियाँ ऐसी बनीं कि इसमें तेज़ी आ गई.

सुशांत सिंह कहते हैं, "पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा पर जो स्थिति है वो पिछले 30-31 सालों से चल रही है. 2015-16 तक कुछ हद तक स्थिति सामान्य हुई थी लेकिन उसके बाद संबंध ख़राब ही हुए हैं. सीमा पर लगातार गोलीबारी होती रहती है और दोनों देशों ने लंबे समय से अच्छे रिश्ते नहीं देखे हैं. उनकी घरेलू राजनीति में भी आपसी विवाद मुद्दा बना जाते हैं."

उनका कहना है कि चीन के साथ भारत के विवाद हल्के और छोटे रहे हैं. लेकिन, इस बार जो विवाद है वो बहुत व्यापक है. करीब 200-300 किमी. के दायरे में फैला हुआ है. चीन जहाँ पर बैठा हुआ है, वहाँ पर पहले नहीं था. भारत उसे अपनी ज़मीन बताता है. भारत नहीं चाहेगा कि चीन के साथ तनाव बढ़े लेकिन सैनिकों के मरने से भारत के लिए भी चुप रहना मुश्किल होगा. ऐसे में दोनों देशों के बीच बातचीत प्रभावित होना स्वाभाविक है.

वहीं, नेपाल की बात करें तो दोनों देशों के बहुत मधुर संबंध रहे हैं. लेकिन, पिछले कुछ सालों में इनके बीच तनाव देखा गया है.

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एसडी मुनि कहते हैं कि भारत और नेपाल के रिश्तों में खटास 2015 से ही आ गई थी जब भारत ने ब्लॉकेड किया था. लेकिन, बात यहाँ तक पहुँचने के और भी कारण हैं. नेपाल के इस रुख़ के पीछे चीन का प्रोत्साहन एक वजह हो सकती है. नेपाल का अक्सर चीन की तरफ झुकाव रहता है.

चीन दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और इसके लिए वो अपने आर्थिक संसाधनों और कूटनीति की मदद लेता है. 2015 से भारत और नेपाल के बीच काफ़ी मनमुटाव रहा है. इसका फ़ायदा चीन ने उठाया है.

एसडी मुनि बताते हैं, "चीन की नेपाल पर नज़र बहुत पुरानी है. चीन के पहले कम्युनिस्ट नेता और संस्थापक माओत्से तुंग ने कहा था कि तिब्बत हमारी हथेली और लद्दाख, नेपाल, भूटान, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश पाँच उंगलियां हैं. हथेली तो हमने ले ली है और अब पाँच उंगलियों को भी आज़ाद कराना है. आज के समय में क्षेत्रीय विस्तार करना मुश्किल है इसलिए चीन इन क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाकर विस्तार करना चाहता है."

"वहीं, नेपाल में एक नया राष्ट्रवाद पैदा हुआ है जिसमें एक बड़ा अंश भारत विरोधी है. नेपाल के राजनीतिक कारण भी हैं और बाहर माहौल भी ऐसा है. चीन का प्रभाव, नेपाली प्रधानमंत्री केपी ओली का चीन की तरफ झुकाव और एक भारत विरोधी लहर, ऐसे कई कारण रहे जिससे विवाद बढ़ गया है."

पाकिस्तान के साथ झगड़ा पुराना

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता आसिफ़ फ़ारुक़ी पाकिस्तान के साथ भारत के झगड़े को फिलहाल उतना बड़ा नहीं मानते जितना अभी चीन के साथ हो गया है. हालाँकि, पाकिस्तान को इससे कूटनीतिक फ़ायदा हो सकता है.

वह कहते हैं, "पाकिस्तान के साथ जो मसला है वो पिछले 70 सालों से चल रहा है. उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. उनके बीच बात इतनी ज़्यादा बात आगे नहीं बढ़ी है जितनी चीन और भारत के बीच है."

"पाकिस्तान कूटनीतिक स्तर पर इसका इस्तेमाल कर सकता है. जैसे कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बना है. पाकिस्तान कह सकता है कि जो देश अपने पड़ोसियों पर आक्रामक है और अच्छे संबंध रखता, वो संयुक्त राष्ट्र में इतने बड़े पद का हकदार नहीं है. पाकिस्तान के मामले में इतना ही हो सकता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं होगा."

लेकिन, एकसाथ तीन मोर्चों पर पैदा हुई इस समस्या को सुशांत सिंह सरकार की विदेश नीति की विफलता का सूचक और एक चुनौती भी मानते हैं.

वह कहते हैं कि पड़ोसी देशों में चीन का प्रभाव बढ़ना भी आपकी कमज़ोर विदेश नीति को दिखाता है. अब देखना होगा कि चरमराती अर्थव्यवस्था और कोरोना वायरस के ख़तरे के बीच सरकार ये मसले कैसे सुलझाती है.

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली

क्या भारत की नीति आक्रामक है?

पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक हो या डोकलाम में चीन के साथ गतिरोध, ये कहा जाता रहा है कि भारत आक्रामक विदेश नीति अपना रहा है.

सुशांत सिंह का मानना है, "नेपाल के साथ तो कह सकते हैं कि भारत की आक्रामक नीति रही है. नेपाल एक छोटा मुल्क है इसलिए भारत का प्रभाव वहाँ ज़्यादा है. ऐसे में नेपालियों के अंदर भी ग़ुस्सा है कि भारत खुद को बड़ा भाई और उन्हें छोटा भाई समझता है."

"लेकिन, चीन के साथ भारत ने ऐसी कोई आक्रामकता नहीं दिखाई है. ना ही उसे भड़काने की कोशिश है. चीन के साथ मौजूदा विवाद में स्पष्टता भी नहीं है. चीन की क्या आपत्तियाँ हैं और भारत क्या चाहता है ये साफतौर पर सामने नहीं आ रहा है."

चीन लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने पर आपत्ति जताता रहा है. वो कभी अक्साई चिन में गलवान घाटी के पास गैर-क़ानूनी सड़क निर्माण का आरोप लगाता है.

ये कहना भी मुश्किल है कि चीन सिर्फ़ गलवान घाटी की वजह से ही भारत का विरोध कर रहा है. चीन नाथु ला और सिक्किम जैसी जगहों पर भी मौजूद है जहाँ दोनों देश आमने-सामने भी आ चुके हैं.

पाकिस्तान की बात करें तो पिछले कुछ समय में ज़रूर सरकार तुरंत जवाबी कार्रवाई करती दिखी है. ऐसा रुख़ भारत सरकार का पहले नहीं रहा है.

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भारत और चीन के सैनिक
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भारत और चीन के सैनिक

अब आगे क्या होगा?

जानकारों मानते हैं कि चीन के साथ सीमा पर जो स्थिति बनी हुई है वो बहुत ज़्यादा गंभीर है. 1962 के बाद लद्दाख में दोनों सेनाओं की तरफ से कोई भी मौत नहीं हुई है.

उसके बाद अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में जो घटनाएं हुईं, उनमें भी 1975 के बाद दोनों तरफ के किसी भी सैनिक की मौत नहीं हुई.

अब लद्दाख में भारतीय जवानों की मौत होना एक बहुत ही गंभीर और तनावपूर्ण मसला है. इससे भारत और चीन के बीच हो रही बातचीत पर नकारात्मक असर पड़ेगा.

एसडी मुनि कहते हैं, "भारत को तीन देशों के लिए अलग-अलग तरह से बातचीत शुरू करनी होगी. नेपाल के मामले में भारत के पास जो प्रमाण हैं वो काफी पुख्ता और मज़बूत हैं. कई प्रमाणपत्रों से नेपाल का पक्ष कमज़ोर लगता है. ऐसे में भारत को नेपाल के साथ बात करनी चाहिए."

"वहीं, चीन के साथ बात करते हुए ज़मीनी स्तर पर मज़बूत रहना चाहिए. पाकिस्तान के साथ हमारा पुराना झगड़ा रहा है. तीनों के लिए अलग-अलग तरीक़ा अपनाना पड़ेगा."

सुशांत सिंह भी इन्हें राजनीतिक तौर पर निपटाने वाला मुद्दे मानते हैं. अभी चीन के साथ सैन्य स्तर पर बातचीत हो रही है लेकिन उससे ये मुद्दा हल नहीं होगा. ये राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर ही हल हो सकता है.

साथ ही वह कहते हैं, "भारत सरकार की पिछले छह सालों में जो विदेश नीति रही है, ये उसकी परीक्षा है. पीएम नरेंद्र मोदी दो-तीन बार चीन के राष्ट्रपित शी जिनपिंग से मुलाक़ात कर चुके हैं. अब ये देखना है कि भारत ने पिछले सालों में चीन में कूटनीतिक स्तर पर जो निवेश किया है उसका क्या नतीजा निकलता है."

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