Positive News: कोरोना को मात दे चुके लोगों का रक्त बन सकता है मरीजों के इलाज के लिए हथियार!
Blood of those who defeated covid-19 can form Helpful in the treatment of positive patientscovid 19 को मात दे चुके लोगों का रक्त बन सकता है गंभीर मरीजों के इजाल के लिए हथियार!
बेंगलुरु। कोरोना वायरस विश्व भर के देशों को अपनी चपेट में ले चुका हैं। भारत में अब तक 1637 कोरोना पॉजिटिव के मरीज पाए गए हैं जिसमें से 38 लोगों की मृत्यु हो चुकी है वहीं 133 लोग कोरोना से पूर्ण रुप से स्वस्थ हो चुके हैं। कोरोना से बचाव के लिए न ही अभी कोई टीका बन पाया और न ही दवा इसलिए भारत ही नहीं अन्य देशों के डाक्टर सुझाव और अनुभव के आधार पर ट्रीटमेंट कर रहे हैं। इसी बीच एक राहत भरी खबर ये हैं कि अब वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कोरोना वायरस के संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों का ब्लड इस महामारी से लड़ने में बड़ा हथियार बन सकता हैं। आइए जानते हैं कि कैसे कोरोनावायरस के संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों का ब्लड इस महामारी से लड़ने में कैसे मदद करेगा?
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कोरोना के गंभीर मरीजों का इस पद्धति से किया जा रहा इलाज
बता दें कोरोना वायरस से लड़ रहे मरीज के खून में मौजूद प्लाज्मा में ऐसी एंटी बॉडी विकसित हो सकती हैं जो इस वायरस के खिलाफ जंग में एक हथियार बन रही हैं। इसी के आधार पर वैज्ञानिकों ने प्लाज्मा थेरेपी परीक्षण मरीजों पर शुरू किए हैं। न्यूयॉर्क के डॉक्टर इसकी टेस्टिंग कोरोना के कारण गंभीर स्थिति में पहुंच चुके मरीजों पर करना शुरु कर चुके हैं।

भारत में भी अनुमति मिलने पर शुरु हो जाएगा इस पद्धित से इलाज
बता दें प्लाज्मा थेरेपी के तहत कोविड-19 की चपेट में आने के बाद ठीक हो चुके मरीजों के रक्त से प्लाज्मा निकालकर बीमार रोगियों को ठीक करने के लिए दिया जा रहा है। अमेरिका और इंग्लैंड में इसे लेकर ट्रायल शुरू हो चुके हैं, वहीं चाइना जहां से ये वायरस फैला है वो भी दावा कर रहा है कि उसने इस प्लाज्मा थैरेपी से मरीजों को ठीक किया है। भारत में इसे लेकर अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है। डॉक्टरों का मानना है कि जो भी कोरोना पॉजिटिव अब पूरी तरह ठीक हो चुके हैं, उनका ब्लड एंटीबॉडीज का बड़ा जरिया हो सकता है। ब्लड के प्लाज्मा में एंटीबॉडीज होती हैं। दशकों से इसी प्लाज्मा की एंटीबॉडीज के जरिए संक्रमित बीमारियों को इलाज होता रहा है। इबोला और इनफ्लूएंजा जैसी बीमारी भी इसी प्लाज्मा के जरिए ठीक हुई है।

चाइना में इस थेरेपी से मरीजों की हालत में हुआ था सुधार
मालूम हो कि फरवरी में चीन के 20 ऐसे नागरिकों ने अपने प्लाज्मा दान किए जो कोरोना पॉजिटिव थे और पूर्ण रुप से ठीक हो चुके थे। वुहान में उनके इन प्लाज्मा का उपयोग कई मरीजों पर किया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम मिले इससे उपचार में मदद भी मिली। जिन्होंने 20 लोगो ने प्लाज्मा दिया वो ऐसे डॉक्टर व नर्से थीं जो कोरोना मरीजों के इलाज के समय इस वायरस की चपेट में आई थीं। उन्होंने ठीक होने के 10 दिनों बाद प्लाज्मा दान किया और जिसे कोविड 19 के सीरियर मरीजों में प्लाज्मा थैरेपी अप्लाई की गई। इसके महज 12 से 24 घंटें के अंदर ही मरीजों में सुधार आने लगा था। इस थेरेपी से ठीक हुए लोगों ने इस ट्रीटमेंट के लिए प्लाज्मा दान किया।

ऐसे किया जाता है इलाज
इस प्रक्रिया में सबसे पहले ‘हाइपर इम्यून'लोगों को पहचान की जाती है ये वो ही लोग होते हैं जो पहले इस वायरस की चपेट में आने के बाद ठीक हो चुके हैं, या फिर ऐसे व्यक्ति जिनका शरीर वायरस की चपेट में नहीं आ रहा। ठीक हो चुके लोगों के प्लाज्मा को कोन्वल्सेंट प्लाज्मा कहा जाता है। उनके श्वेत कणों से फ्रेक्शनेशन प्रक्रिया के जरिए प्लाज्मा अलग किए जाते हैं। वहीं संपूर्ण रक्त से इन प्लाज्मा को अलग करने के लिए अपेरेसिस मशीन का प्रयोग होता है। इसके बाद इस कोन्वल्सेंट प्लाज्मा को गंभीर रूप से कोरोना वायरस से संक्रमित बीमार के शरीर में ट्रांसफर किया जाता है। इससे बीमार का शरीर भी रक्त में वायरस से लड़ने वाली एंटीबॉडी बनाने लगता है। उसके लिए वायरस से लड़ना आसान हो जाता है और तबियत सुधरने लगती है।

एक व्यक्ति के प्लाज्मा से 3 मरीज ठीक हो सकते हैं
डाक्टरों के अनुसार एक ठीक हो चुके मरीज से इतना प्लाज्मा मिल जाएगा कि तीन अन्य मरीज ठीक हो सकें। इससे डोनर को कोई नुकसान नहीं होगा, कोरोना से लड़ने के लिए उसके शरीर में पर्याप्त एंटीबॉडीज बनती रहेंगी। डोनर के शरीर से सिर्फ 20% एंटीबॉडीज ली जाएगी जो 2-4 दिनों में ही उसके शरीर में फिर से बन जाएंगी।'

कोन्वल्सेंट प्लाज्मा से वेंटीलेशन पर पहुंचे मरीजों की जान बचाई गई
गौरतलब हैं कि चीन के वैज्ञानिकों और चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों द्वारा किए गए अध्यन में पाया गया कि कोन्वल्सेंट प्लाज्मा से वेंटीलेशन पर पहुंचे मरीजों की जान बचाई गई। हालांकि यह अध्ययन पांच मरीजों पर हुआ था। वहीं ब्रिट्रेन के ग्लासगो विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ता प्रो. डेविड टेपिन ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य अध्ययन संस्थान में कोन्वल्सेंट प्लाज्मा से क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति मांगी है और अमेरिका खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने पिछले हफ्ते कोविड-19 से ठीक हो चुके लोगों को प्लाज्मा दान करने की अपील की हैं1

भारत में भी इस थेरेपी का अपनाने पर किया जा रहा विचार
चाइना में इस प्लाज्मा थेरेपी से कोविड 19 के मरीजों में हुए सुधार को देखते हुए भारत में भी इस थेरेपी को अजमाएं जाने पर विचार शुरु हो चुका है। मालूम हो कि भारत में अपेरेसिस मशीन से रक्त से 500 मिलीलीटर प्लाज्मा निकालने की क्षमता है। प्रयोग के लिए औषधि महानियंत्रक से अनुमति लेनी होगी। इस दिशा में प्रयास शुरू करने के विकल्पों पर विचार ही किया जा रहा है।

प्लाज्मा थेरेपी इन महामारियों को हराने में भी बन चुकी है हथियार
बता दें ये पहला मौका नहीं है जब इस पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है। दशकों से इसका इस्तेमाल किया जाता रहा हैं। 1918-20 में पूर्व स्पेनिश फ्लू के इलाज के दौरान अमेरिका ने यही तकनीक अपनाई थी और अब कोरोना के मरीजों के इलाज में अपना रहा हैं। इसके अलावा 2005 में सीवियर एक्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रम कोरोना वायरस-1 (सार्स-सीओवी-1) यानी मौजूदा वायरस के पिछले स्वरूप से निपटने के लिए हांगकांग ने यही किया। 2009 में एच1एन1 के मरीजों को विश्वभर में प्लाज्मा से इलाज किया। 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला मरीजों के इलाज के कोन्वल्सेंट रक्त व प्लाज्मा के उपयोग का प्रोटोकॉल बनाया था।












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