ब्लॉग: रफ़ाल पर मोदी-अंबानी और दोतरफ़ा नौटंकी में उलझे पांच सवाल

मोदी
Getty Images
मोदी

एक शब्द है जवाबदेही, जिसे गुजरात का होने की वजह से मोदी अक्सर 'जवाबदारी' कहते हैं. इसी का एक पर्यायवाची शब्द उत्तरदायित्व भी है.

आसान भाषा में इसका मतलब यह होता है कि जवाब देने का काम किसका है?

रफ़ाल सौदा और उसमें अनिल अंबानी की नई-नवेली कंपनी की भूमिका को लेकर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं जिनकी सीधी 'जवाबदारी' नरेंद्र मोदी की है. न सिर्फ़ इसलिए कि वे प्रधानमंत्री हैं और इस सौदे पर उन्होंने दस्तख़त किए हैं. यही नहीं, इस डील को अंजाम तक पहुंचाने में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर या कैबिनेट की भूमिका के कोई सुराग नहीं हैं.

यही वजह है कि सवाल पीएम मोदी से पूछे जा रहे हैं, लेकिन जवाब उनकी टीम के सदस्य दे रहे हैं, सवालों की शक्ल में या फिर फिकरे कसकर.

पीएम ने मध्य प्रदेश में राहुल गांधी के आरोपों को विदेशी साज़िश करार दिया, लेकिन जवाब तो दूर, रफ़ाल शब्द उनके मुंह से नहीं निकला. यह फिकरा ज़रूर निकला, "जितना कीचड़ उछालेंगे उतना कमल खिलेगा."

यह कहने का कोई आधार या सबूत नहीं है कि कोई घोटाला हुआ है या किसी ने रिश्वत ली है, लेकिन यह पूरा मामला राजीव गांधी के कार्यकाल के बोफ़ोर्स घोटाले की तरह परत-दर-परत खुल रहा है.

बोफ़ोर्स मामले में भी यह साबित नहीं हो सका कि वह घोटाला था या राहुल गांधी के पिता ने रिश्वत ली थी.

'चोर' और 'ख़ानदानी चोर' के हो-हल्ले के बीच, न तो सही सवाल सुनाई दे रहे हैं, न ही कोई जवाब मिल रहा है.

बोफोर्स और रफ़ाल

राजीव गांधी मोदी
Getty Images
राजीव गांधी मोदी

सवाल भारत के राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा, प्रधानमंत्री के दफ़्तर की गरिमा और पारदर्शिता से जुड़े हैं. मामले की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट के दो मंत्रियों और एक नामी वकील ने इसे 'घोर आपराधिक अनियमितता' बताते हुए, कई सवाल सवाल पूछे हैं.

ऐसे ही सवाल 1980 के दशक में राजीव गांधी से पूछे जा रहे थे, तब उनकी जो प्रतिक्रिया थी, वह बीजेपी के आज के रवैए से बहुत अलग नहीं है.

जैसे व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्ट होने के आरोप नरेंद्र मोदी पर नहीं लगे हैं, एक ज़माने में राजीव गांधी को 'मिस्टर क्लीन' कहा जाता था. सबसे पहली प्रतिक्रिया तो यही थी कि गंगा जैसी पवित्र छवि वाले नेता पर ऐसे आरोप लगाने की हिम्मत कैसे हुई?

जिन लोगों की उम्र 45 से ऊपर है, उन्हें शायद याद होगा कि राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव में बोफ़ोर्स सौदे पर सवाल उठाने वालों को 'विदेशी ताक़तों का मोहरा' कहा था. ये भी कहा गया था कि भारत तोप ख़रीदकर ताक़तवर न हो जाए इसलिए विपक्ष के 'देश विरोधी' लोग मनगढ़ंत आरोप लगा रहे हैं.

आज भी ऐसे ही सुर सुनाई दे रहे हैं. बीजेपी ने संयुक्त संसदीय जांच समिति के गठन से इनकार कर दिया है, ठीक ऐसा ही राजीव गांधी ने भी किया था, हालांकि बाद में उन्हें विपक्ष की इस मांग को मानना पड़ा था.

राजीव गांधी
Getty Images
राजीव गांधी

हवा में तैरते पांच बड़े सवाल

भारतीय वायु सेना की ज़रूरतों को देखते हुए, फ़्रांसीसी कंपनी डासो एविएशन से 126 विमान ख़रीदे जाने थे. 2012 से मनमोहन सिंह की सरकार से फ़्रांसीसी कंपनी की बातचीत चल रही थी, 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा. 2015 में डासो के प्रमुख एरिक ट्रेपिए ने कहा था कि "95 प्रतिशत बातें तय हो गई हैं और जल्दी ही काम शुरू होगा."

सवाल नंबर एक

प्रधानमंत्री मोदी ने 10 अप्रैल 2015 को अपनी फ़्रांस यात्रा के दौरान 17 समझौतों पर दस्तख़त किए, जिनमें एक समझौता रफ़ाल विमान की ख़रीद का भी था. फ्रांसीसी कंपनी से ख़रीदे जाने वाले विमानों की संख्या 126 से घटकर अचानक 36 हो गई. सरकार ने अभी तक देश की संसद या मीडिया को नहीं बताया है कि इतना बड़ा बदलाव, कब, क्यों और कैसे हुआ?

सवाल नंबर दो

पहले न सिर्फ़ 126 फ़ाइटर जेट ख़रीदे जाने थे बल्कि उनमें से 108 विमान भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र करार के तहत, बेंगलुरू में सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (एचएएल) में बनाए जाने वाले थे लेकिन वह इरादा छोड़ दिया गया. सरकारी क्षेत्र की कंपनी एचएएल के पास लड़ाकू विमान बनाने का अच्छा-ख़ासा अनुभव है, टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र के तहत वहाँ पहले भी सैकड़ों जगुआर और सुखोई विमान बनाए गए हैं.

'मेक इन इंडिया' में रक्षा क्षेत्र पर ज़ोर देने की बात कही गई थी और यह उस दिशा में बहुत बड़ा कदम हो सकता था. लंबी प्रक्रिया को पूरा करके, वायु सेना की ज़रूरतों का आकलन करने के बाद ही तय किया गया था कि 126 विमानों की ज़रूरत होगी. क्या भारत की जनता को बताया नहीं जाना चाहिए कि वायु सेना की लड़ाकू विमानों की ज़रूरत कम कैसे हो गई और एचएएल को यह मौका क्यों नहीं दिया गया?

भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण
Getty Images
भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण

सवाल नंबर तीन

यह एक नया सौदा था क्योंकि विमानों की क़ीमत, संख्या और शर्तें बदल गईं थी. अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण का आरोप है कि नरेंद्र मोदी ने नियमों का पालन नहीं किया.

सवाल ये है कि अगर यह नया ऑर्डर था तो नियमों के मुताबिक टेंडर क्यों जारी नहीं किए गए? यह भी पूछा जा रहा है कि इस फ़ैसले में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी की क्या भूमिका थी? अगर नहीं थी, तो क्यों नहीं थी?

तथ्य यह है कि डासो एविएशन के साथ सौदे की घोषणा होने के क़रीब एक साल बाद कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी ने इसे अपनी औपचारिक मंज़ूरी दी.

सवाल नंबर चार

विमान की क़ीमत को लेकर सरकार संसद में जानकारी देने से कतराती रही है. सरकार ने विमान की कीमत बताने से यह कहते हुए इनकार किया कि यह सुरक्षा और गोपनीयता का मामला है. आरोप लगाने वाले बीजेपी से जुड़े रहे दोनों पूर्व कैबिनेट मंत्रियों का कहना है कि नियमों के मुताबिक, गोपनीयता सिर्फ़ विमान की तकनीकी जानकारी के बारे में बरती जाती है, कीमत के बारे में नहीं.

अरुण शौरी का कहना है कि लोकसभा में एक सवाल के जवाब में, रक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुभाष भामरे ने 36 विमानों वाला सौदा होने से पहले बताया था कि एक विमान की कीमत 670 करोड़ रुपए के करीब होगी. अरुण शौरी पूछ रहे हैं कि हर विमान का दाम लगभग एक हज़ार करोड़ रुपए बढ़ गया है, अब एक विमान की कीमत 1600 करोड़ रुपए के क़रीब है.

क्या सरकार की ज़िम्मेदारी देश को यह बताना नहीं है कि ख़ज़ाने से लगभग 36 हज़ार करोड़ रुपए ज़्यादा क्यों ख़र्च हो रहे हैं? सरकार के मंत्रियों ने बचाव में कहा है कि विमान में बहुत सारे साज़ो-सामान और हथियार अलग से लगाए गए हैं इसलिए क़ीमत बढ़ी है.

संसद में दी गई जानकारी के आधार पर लोग आरोप लगा रहे हैं कि जो पिछला सौदा हुआ था उसमें सभी अतिरिक्त साज़ो-सामान और हथियारों की भी क़ीमत में शामिल थी. सरकार को बताना चाहिए कि क़ीमत का सच क्या है?

नरेंद्र मोदी और फ़्रांस्वा ओलांद
EPA
नरेंद्र मोदी और फ़्रांस्वा ओलांद

सवाल नंबर पांच

जिस दिन नरेंद्र मोदी ने पेरिस में विमान ख़रीद के समझौते पर हस्ताक्षर किए, वह तारीख़ थी 10 अप्रैल 2015. 25 मार्च 2015 को रिलायंस ने रक्षा क्षेत्र की एक कंपनी बनाई जिसे सिर्फ़ 15 दिन बाद लगभग 30 हज़ार करोड़ का ठेका मिल गया.

एक ऐसी कंपनी जिसने रक्षा उपकरण बनाने के क्षेत्र में कोई काम नहीं किया है, दिल्ली मेट्रो हो या टेलीकॉम का बिज़नेस, कंपनी के ट्रैक रिकॉर्ड पर लगातार सवाल उठते रहे हैं, अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनी का ज़िक्र भारी क़र्ज़ की वजह से भी होता रहा है. ऐसे में फ्रांसीसी कंपनी अपनी मर्ज़ी से ऐसा पार्टनर क्यों चुनेगी यह एक पहेली है.

सौदे के समय फ्रांस के राष्ट्रपति रहे फ्रांस्वा ओलांद ने एक इंटरव्यू में कहा कि 'रिलायंस के नाम की पेशकश भारत की ओर से हुई थी, उनके सामने कोई और विकल्प नहीं था'. सफ़ाई में सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि यह 'राहुल-ओलांद की जुगलबंदी' है, एक 'साज़िश' है.

मोदी सरकार के मंत्रियों का कहना है कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, लेकिन क्या उसे 'क्रोनी कैपिटलिज़्म' के गंभीर आरोप पर खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करनी चाहिए?

नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी
AFP
नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी

राजनीति से परे हैं कुछ बातें

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने कहा है कि यह 'परसेप्शन' की लड़ाई है जिसमें कांग्रेस झूठ बोल रही है यानी जितने सवाल पूछे जा रहे हैं उनका जवाब देने की कोई ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ ये परसेप्शन बनाने की ज़रूरत है कि सरकार पाक-साफ़ है या कांग्रेस ज़्यादा गंदी है.

राहुल गांधी ने कहा है कि "मोदी ने देश के युवाओं और वायु सेना से तीस हज़ार करोड़ रुपए छीनकर अनिल अंबानी को दे दिए हैं." यह ऐसा आरोप है जिसे अब तक मौजूद जानकारी से साबित करना मुमकिन नहीं है लेकिन वे भी परसेप्शन की लड़ाई जीतने में लगे हुए हैं.

भारत में शायद ही कोई बड़ा रक्षा सौदा हुआ हो और उसमें घोटाले, दलाली और रिश्वतख़ोरी के आरोप न लगे हों लेकिन किसी भी मामले में आरोप साबित नहीं होते, सवालों के जवाब नहीं मिलते.

रफ़ाल मामले में भी क्या ऐसा ही होगा? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के जागरूक नागरिकों को टीवी पर 'तू चोर', 'तेरा बाप चोर' वाला ड्रामा देखकर संतोष करना होगा या परसेप्शन की लड़ाई में कुछ तथ्य और तर्क भी सामने आएँगे?

क्या पता, देखते जाइए!

ये भी पढ़ेंः

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+