3 राज्यों में जीतकर ज्यादा खुश न हो BJP! 2024 नहीं है आसान, इन प्रदेशों में मिलेगी चुनौती
विधानसभा चुनावों में 3/2 की धमाकेदार जीत से भारतीय जनता पार्टी बहुत उत्साहित है। स्वाभाविक भी है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में उसे इस चुनाव में उम्मीदों से भी ज्यादा सीटें मिली हैं। वहीं मिजोरम और तेलंगाना में वह कभी भी गंभीर दावेदार मानी गई थी।
लेकिन, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बड़ी जीत से पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए बहुत ज्यादा खुश नहीं हो सकती। इन तीनों राज्यों में लोकसभा की 65 सीटें हैं और 2014-2019 दोनों ही चुनावों में वैसे भी बीजेपी इनमें से ज्यादातर जीतती रही है।

दक्षिण भारत में अभी भी रेस से बाहर है बीजेपी
तथ्य यह है कि आज की तारीख में भी कर्नाटक को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत में कहीं भी गंभीर सियासी दावेदार नहीं मानी जाती है। तेलंगाना के चुनाव परिणाम ने इस हकीकत को एक बार फिर से साबित किया है।
लोकसभा में बीजेपी ने 350 सीटें जीतने का रखा है लक्ष्य
तो सवाल है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2024 के लिए जो 350 सीटें (एनडीए) जीतने का लक्ष्य तय किया है, उसका आधार क्या है।
क्योंकि, इंडिया ब्लॉक से सिर्फ दक्षिण भारतीय राज्यों में ही नहीं, बल्कि कुछ हिंदी भाषी राज्यों के साथ-साथ पश्चिम और पूर्वी भारत में भी उसे चुनौती मिलने की संभावना बन रही है।
350 सीटों पर जिताऊ उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार!
340 से 350 सीटों वाले लक्ष्य की बात हाल ही में महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री और डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस के करीबी गिरीश महाजन की ओर से भी दोहराई गई है। जानकारी के मुताबिक भाजपा ने इन सीटों के लिए जिताऊ उम्मीदवारों का एक खाका भी तैयार करके रख लिया है।
160 'कमजोर सीटों' पर भी किया काम
इनके अलावा पार्टी ने 160 'कमजोर सीटों' पर महीनों तक काम किया है। इनमें वे सीटें तो हैं हीं जहां बीजेपी जीत नहीं पाती।
उन सीटों को भी शामिल किया गया है, जहां बीजेपी जीती है, लेकिन फिर भी उसे यह अपने लिए असुरक्षित मानती है। उदाहरण के लिए यूपी की बागपत और हरियाणा की रोहतक को इसी में शामिल किया जा सकता है।
'कमजोर सीटों' पर जल्द घोषित हो सकते हैं उम्मीदवार
भाजपा ने हालिया विधानसभा चुनावों से एक नया प्रयोग शुरू किया है। जैसे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की कई सीटों पर पार्टी ने चुनाव तारीखों के ऐलान से काफी पहले ही उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी। उसे इसका फायदा मिला है, ये दिख रहा है।
इस बार पार्टी खुद के लिए कमजोर समझी जाने वाली इन 160 सीटों पर भी वही रणनीति अपना सकती है। यहां जनवरी-फरवरी में ही उम्मीदवार तय किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए यूपी की रायबरेली और मैनपुरी जैसी सीटें उसमें शामिल हैं।
भाजपा को इन राज्यों में मिलेगी असली चुनौती
लेकिन, तीन राज्यों में शानदार जीत और महीनों पहले से लोकसभा चुनावों की तैयारी से भी भाजपा की चुनौती खत्म होती नहीं दिख रही है।
पार्टी को 350 सीटें जीतने का लक्ष्य देश की करीब 408 लोकसभा सीटों में से ही हासिल करना होगा। क्योंकि, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, पंजाब, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में उसकी संभावनाएं बहुत ज्यादा नहीं हैं।
इन राज्यों में लोकसभा की कुल 135 सीटें हैं, जहां से दर्जन भर सीटें निकालना भी भारतीय जनता पार्टी की बहुत बड़ी सफलता मानी जाएगी।
भाजपा को जबर्दस्त स्ट्राइक रेट की आवश्यकता होगी
इसके अलावा पूर्वोत्तर भारत, जम्मू और कश्मीर के अलावा कुछ केंद्र शासित प्रदेशों की 18 से ज्यादा सीटें हैं, जहां बीजेपी के लिए आधा दर्जन से ज्यादा पर जीत भी एक बड़ी कामयाबी होगी। मतलब, 350 सीटों का टारगेट हिट करने के लिए बीजेपी का स्ट्राइक रेट जबर्दस्त होनी चाहिए।
लेकिन, इंडिया ब्लॉक की वजह से उसे इस बार खासकर बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में बहुत बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश में भी संघर्ष तगड़ा हो सकता है। बंगाल में तो 2019 में भी 42 सीटों में से 18 ही जीत पाई थी।
जबकि, 408 सीटों के हिसाब से भाजपा को लक्ष्य तक पहुंचने के लिए 85% से अधिक की स्ट्राइक रेट की जरूरत होगी। यह तभी मुमकिन लगता है, जब पार्टी गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और असम जैसे राज्यों अपनी स्ट्राइक रेट को 95% या उससे भी अधिक तक ले जा पाए।
इसके अलावा उम्मीद की किरण 160 'कमजोर' सीटों पर टिक सकती हैं, जिनपर काम करके कामयाब होने का स्वाद पार्टी पहले भी चख चुकी है।












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