BJP President Caste: किस जाति के नेता सबसे ज्यादा बने हैं भाजपा अध्यक्ष? ब्राह्मण या OBC किसका पलड़ा रहा भारी
BJP President Caste List: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) खुद को एक ऐसी पार्टी के तौर पर पेश करती रही है, जिसने सामाजिक दायरा लगातार बढ़ाया है। ओबीसी, दलित और आदिवासी समाज तक उसकी राजनीतिक पहुंच आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। लेकिन जब बात पार्टी के सबसे ताकतवर संगठनात्मक पद यानी राष्ट्रीय अध्यक्ष की आती है, तो तस्वीर कुछ और ही दिखती है।
आंकड़े बताते हैं कि भाजपा की कमान ज्यादातर समय ऊंची जाति के नेताओं के हाथों में ही रही है। भाजपा ने 20 जनवरी 2026 को बिहार के कायस्थ (सवर्ण) जाति से आने वाले नितिन नबीन को भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है। नितिन नबीन भाजपा के 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

भाजपा की स्थापना 1980 में हुई थी। तब से अब तक पार्टी के 11 राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। कुल 11 में से 9 राष्ट्रीय अध्यक्ष जनरल या अपर कास्ट से रहे हैं। भाजपा के अधिकतर राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्राह्मण, राजपूत या वैश्य समुदाय से आए हैं। पार्टी के गठन से लेकर अब तक नेतृत्व की जिम्मेदारी ज्यादातर इन्हीं सामाजिक वर्गों के नेताओं को मिली। इसी वजह से कहा जाता है कि संगठन की सबसे बड़ी कुर्सी पर अपर कास्ट का वर्चस्व रहा है। पहले अध्यक्ष अटल बिहार वाजपेयी से लेकर जेपी नड्डा तक सब सवर्ण का बोलबाला है।
दलित समुदाय से सिर्फ एक BJP राष्ट्रीय अध्यक्ष
भाजपा के इतिहास में बंगारू लक्ष्मण ऐसे इकलौते नेता रहे, जो दलित समुदाय से राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। साल 2000 में जब उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई, तो इसे पार्टी में एक प्रतीकात्मक बदलाव के तौर पर देखा गया।
हालांकि इसके बाद फिर किसी दलित नेता को यह पद नहीं मिला। ओबीसी समुदाय से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर एम वेंकैया नायडू का नाम आता है। आंध्र प्रदेश के प्रभावशाली कम्मा समुदाय से आने वाले नायडू 2002 से 2004 तक पार्टी अध्यक्ष रहे। हालांकि इसके बाद फिर से संगठन की कमान अपर कास्ट नेताओं के हाथों में लौट आई।
BJP President Caste Report: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उनकी जाति
1. अटल बिहारी वाजपेयी (1980-1986), जाति-ब्राह्मण
अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष थे और वे 1980-1986 तक अध्यक्ष रहे। अटल बिहारी वाजपेयी कन्याकुब्ज ब्राह्मण परिवार से आते थे। उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। अटल जी राजनीति में आने से पहले पत्रकार और कवि के रूप में भी सक्रिय रहे। 1957 में पहली बार सांसद बने और चार दशक से ज्यादा संसदीय राजनीति में रहे। भाजपा अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने पार्टी की वैचारिक नींव मजबूत की। बाद में वे तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने और पोखरण परमाणु परीक्षण, स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी योजनाओं के लिए याद किए जाते हैं।

2. एल.के. आडवाणी (1980-1990, 1993-1998, 2004-2005) जाति- सिंधी
लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को कराची में हुआ था और वे सिंधी हिंदू लोहाना समुदाय से थे, जिसे सामाजिक रूप से ऊंची जाति में गिना जाता है। आडवाणी भाजपा के सबसे प्रभावशाली संगठनात्मक नेताओं में रहे। उन्होंने 1980 के दशक में पार्टी को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। राम रथ यात्रा के जरिए उन्होंने भाजपा की राजनीति को निर्णायक मोड़ दिया। वे अटल सरकार में गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री भी रहे। एल.के. आडवाणी सबसे लंबे समय तक भाजपा के अध्यक्ष रहे, पहले 1980-1990 फिर, 1993-1998 और फिर 2004-2005 तक।

3. मुरली मनोहर जोशी (1991-1993) जाति-ब्राह्मण
डॉ. मुरली मनोहर जोशी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं। उनका जन्म 5 जनवरी 1934 को हुआ था। वे शिक्षाविद रहे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़े-लिखे नेता हैं। भाजपा अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने पार्टी के वैचारिक एजेंडे को मजबूती दी। बाद में केंद्र सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बने और शिक्षा से जुड़े कई अहम फैसलों में उनकी भूमिका रही।

4. कुशाभाऊ ठाकरे (1998-2000) जाति-कायस्थ प्रभु (CKP) समुदाय
कुशाभाऊ ठाकरे चंद्रसेनिया कायस्थ प्रभु (CKP) समुदाय से थे, जिसे अपर कास्ट श्रेणी में माना जाता है। उनका जन्म 15 अगस्त 1922 को मध्य प्रदेश के धार में हुआ था। वे RSS के पुराने प्रचारक रहे और संगठन निर्माण में उनकी बड़ी भूमिका रही। भाजपा अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पार्टी को सत्ता के लिए तैयार संगठन का रूप दिया।
5. बंगारू लक्ष्मण (2000-2001), जाति- दलित
बंगारू लक्ष्मण दलित (अनुसूचित जाति) समुदाय से थे और भाजपा इतिहास में अकेले ऐसे राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। उनका जन्म 17 मार्च 1939 को हैदराबाद में हुआ था। 2000 में उनका अध्यक्ष बनना भाजपा के लिए एक प्रतीकात्मक सामाजिक संदेश माना गया। वे ट्रेड यूनियन आंदोलन से जुड़े रहे और केंद्रीय मंत्री भी बने।
6. के. जना कृष्णमूर्ति (2001-2002) जाति- ब्राह्मण
के. जना कृष्णमूर्ति ब्राह्मण थे। उनका जन्म 24 मई 1928 को तमिलनाडु के मदुरई में हुआ। वे RSS से जुड़े रहे और दक्षिण भारत में भाजपा को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। वे तमिलनाडु से किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष बनने वाले गिने-चुने नेताओं में शामिल थे।
7. एम. वेंकैया नायडू (2002-2004) जाति- कम्मा
वेंकैया नायडू कम्मा समुदाय से आते हैं, जिसे आंध्र प्रदेश में ओबीसी श्रेणी में माना जाता है। उनका जन्म 1 जुलाई 1949 को आंध्र प्रदेश में हुआ। वे छात्र राजनीति से उठकर भाजपा अध्यक्ष बने। बाद में वे केंद्रीय मंत्री और फिर देश के उपराष्ट्रपति भी बने।

8. राजनाथ सिंह (2005-2009, 2013-2014) जाति- राजपूत (क्षत्रिय)
राजनाथ सिंह ठाकुर यानी राजपूत (क्षत्रिय) समुदाय से हैं। उनका जन्म 10 जुलाई 1951 को उत्तर प्रदेश में हुआ। वे भाजपा के संगठनात्मक अध्यक्षों में गिने जाते हैं और दो बार पार्टी की कमान संभाली। बाद में वे केंद्रीय गृह मंत्री और रक्षा मंत्री जैसे अहम पदों पर रहे।

9. नितिन गडकरी (2010-2013) जाति- ब्राह्मण
नितिन गडकरी ब्राह्मण परिवार से आते हैं और उनका जन्म 27 मई 1957 को नागपुर में हुआ। वे भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्षों में शामिल रहे। संगठन में रहते हुए उन्होंने पार्टी की फंडिंग और मैनेजमेंट को नया ढांचा दिया। बाद में वे केंद्र सरकार में सड़क परिवहन मंत्री बने।

10. अमित शाह (2014-2020) जाति- बनिया
अमित शाह वैश्य (बनिया) समुदाय से हैं। उनका जन्म 22 अक्टूबर 1964 को हुआ। उनके कार्यकाल में भाजपा ने 2014 और 2019 में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। संगठन विस्तार, बूथ मैनेजमेंट और चुनावी रणनीति में उन्हें मास्टरमाइंड माना जाता है। बाद में वे देश के गृह मंत्री बने।

11. जे. पी. नड्डा (2020-13 दिसंबर 2025) जाति- ब्राह्मण
जेपी नड्डा ब्राह्मण परिवार से हैं। उनका जन्म 2 दिसंबर 1960 को पटना में हुआ था और मूल रूप से वे हिमाचल प्रदेश से हैं। छात्र राजनीति से उठकर वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उनके कार्यकाल में पार्टी ने संगठनात्मक स्थिरता और सरकार के साथ तालमेल पर जोर दिया।
सामाजिक विस्तार बनाम संगठनात्मक सत्ता
यहां दिलचस्प विरोधाभास दिखता है। एक तरफ भाजपा ने चुनावी राजनीति में ओबीसी और दलित चेहरों को आगे बढ़ाया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ओबीसी पृष्ठभूमि से आते हैं। दूसरी तरफ पार्टी का संगठनात्मक शीर्ष पद अब भी मुख्य रूप से ऊंची जातियों के पास ही रहा।
क्या भाजपा में सामाजिक प्रतिनिधित्व अभी भी पूरी तरह संतुलित नहीं हो पाया है? क्या राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे पद पर जातिगत विविधता सिर्फ प्रतीक तक सीमित रही है? या फिर संगठन का पारंपरिक ढांचा आज भी निर्णयों को प्रभावित करता है?
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्षों की सूची साफ इशारा करती है कि पार्टी की असली संगठनात्मक कमान लंबे समय तक ऊंची जातियों के हाथों में रही है। दलित और ओबीसी नेतृत्व को जगह जरूर मिली, लेकिन वह अपवाद बनकर रह गया। आने वाले समय में क्या भाजपा इस संतुलन को बदलेगी, या फिर इतिहास खुद को दोहराता रहेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
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