जीतन राम मांझी क्यों नहीं बनना चाहते मंत्री, क्या है उनकी रणनीति?

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जीतन राम मांझी ने कहा है कि चूंकि वे मुख्यमंत्री रहे हैं, इसलिए नीतीश कैबिनेट में मंत्री नहीं बनेंगे। हालांकि कुछ मुख्यमंत्री बाद में मंत्री भी बने हैं लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे। जीतन राम मांझी आखिर ऐसा क्यों कह रहे हैं ? क्या नीतीश सरकार के गठन के पहले दबाव की राजनीति शुरू हो गयी है ? चूंकि इस बार एनडीए को बमुश्किल बहुमत का आंकड़ा मिला है। इसलिए चार विधायकों वाले जीतन राम मांझी की अहमियत बढ़ गयी है। चर्चा है कि जीतन राम मांझी अपने पुत्र को मंत्री बनाना चाहते हैं। मांझी के पुत्र संतोष कुमार सुमन एमएलसी हैं। इस बार मांझी के अलावा उनकी समधन ज्योति देवी भी बाराचट्टी से विधायक चुनी गयी हैं। जीतन राम मांझी ने गुरुवार को तीन अन्य विधायकों के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की। उनकी पार्टी से किसी एक नेता को मंत्री पद मिल सकता है।

जीतन राम मांझी क्यों नहीं बनना चाहते हैं मंत्री ?
क्या जीतन राम मांझी अब नीतीश कुमार के मातहत काम नहीं करना चाहते ? पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी क्या यह सोचते हैं कि अगर वे मंत्री बन गये तो उनका डिमोशन हो जाएगा ? या यह सोचते हैं कि अगर मंत्री पद लिया तो भविष्य में सीएम पद की दावेदारी कमजोर पड़ जाएगी ? क्या उनके मन में नीतीश कुमार को लेकर अब भी कोई खटका है ? जीतन राम मांझी के खुद मंत्री नहीं बनने के फैसले को दबाव की राजनीति से जोड़ कर देखा जा रहा है। ऐसा नहीं है कि बिहार में आज तक कोई मुख्यमंत्री, मंत्री नहीं बना है। कांग्रेस के नेता दारोगा प्रसाद राय 1970 में बिहार के मुख्यमंत्री थे। 1972 के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को बहुमत मिला तो इंदिरा गांधी ने मुख्यमंत्री पद के लिए सख्त नेता केदार पांडेय का चयन किया। जब केदार पांडेय मुख्यमंत्री बने तो दारोगा प्रसाद राय को उनकी कैबिनेट में कृषि मंत्री बनाया गया। मंत्री बने के बाद भी दारोगा प्रसाद राय की राजनीतिक हैसियत कम नहीं हुई थी। बिहार के अलावा कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भी पूर्व मुख्यमंत्री बाद में मंत्री बने थे। 2019 में जब कर्नाटक में येदयुरप्पा फिर मुख्यमंत्री बने थे तो उनकी कैबिनेट में पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार को मंत्री बनाया गया था। शेट्टार 2012-13 में कर्नाटक के मुख्य़मंत्री थे। इसी तरह 2005 में जब शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो पूर्व सीएम बाबूलाल गौर को भी मंत्री बनाया गया था। बाबूलाल गौर 2005 में सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद मंत्री बने थे। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण अभी भी उद्धव ठाकरे मंत्रिमंडल में मंत्री हैं।

विकेट लेने के लिए सजने लगी फील्डिंग
बहुमत का स्कोर बहुत कम है। इस लिए दोनों पक्ष विकेट की तलाश में हैं। विकेट लेने के लिए दोनों टीम फील्डिंग सजाने लगी है। कई राज्यों में झटका खा चुकी कांग्रेस अब बिहार में भी निशाने पर है। जीतन राम मांझी ने इसके लिए खुला ऑफर दे डाला है। मांझी ने कहा है कि कांग्रेस के विधायक नीतीश कुमार के साथ आएं क्यों कि दोनों की नीति एक जैसी है। मांझी के इस पैंतरे से कांग्रेस की चिंता बढ़ गयी है। महागठबंधन की हार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इससे कांग्रेस के विधायकों में नाखुशी है। पार्टी के नीति निर्धारकों को डर है कि अगर ये नाखुशी कहीं बढ़ गयी तो टीम को संभालना मुश्किल हो जाएगा। चुनाव में हार के बाद कांग्रेस में अंदरुनी लड़ाई भी शुरू हो गयी है। इससे कांग्रेस सतर्क हो गयी है। दूसरी तरफ महागठबंधन भी एनडीए में सेंध लगाने की कोशिश में है। एनडीए का आंकड़ा बहुमत से सिर्फ तीन अधिक हैं। 110 सीटों वाला महागठबंधन बहुत पीछे नहीं है। महागठबंधन के कई नेताओं का मानना है अगर भविष्य में सरकार बनने की कोई संभावना बनती है तो ओवैसी की पार्टी के पांच विधायक उनके साथ आ सकते हैं। ऐसे में राजद के लिए जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी अहम प्लेयर साबित हो सकते हैं। राजद की तरफ से मांझी और सहनी को अपने पाले में लाने के की कोशिशें तेज हो गयी हैं। मुकेश सहनी को डिप्टी सीम पद का प्रस्ताव दिया गया है। लेकिन टिकट बंटवारे के समय महागठबंधन में मुकेश सहनी के साथ जो हुआ वो वीआइपी के नेता भूले नहीं होंगे।

भाजपा नेताओं की भी मांझी पर नजर
चुनावी नतीजों के एलान के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने जीतन राम मांझी से मुलाकात की है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल बुधवार को जीतन राम मांझी के आवास पर गये और उनके साथ मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा की। इसके पहले भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और निवर्तमान स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने मांझी से मुलाकात की थी। जीतन राम मांझी को वैचारिक स्तर पर जदयू का करीबी माना जाता है। फिलहाल उनकी नीतीश कुमार के साथ अच्छी निभती दिख रही है। 125 के आंकड़े में जीतन राम मांझी एनडीए के अवलंब बन गये है । इसलिए भाजपा के नेता भी उनको खुश रखने की कोशिश में जुट गये हैं।












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