नीतीश कुमार को गुस्सा क्यों आता है?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गुस्सा अब राजनीतिक सुर्खियां बटोरने लगा है। बिहार की सियासत के जानकार जेडीयू सुप्रीमो को उनके दिवंगत सियासी मित्र रामविलास पासवान की तरह ही 'राजनीति का मौसम वैज्ञानिक' मानते हैं।

उनके बारे में माना जाता है कि राजनीति की बयार किस ओर बहने वाली है, नीतीश इसका पूर्वानुमान लगाने में अब माहिर हो रहे हैं! हाल में संपन्न हुए कुछ राज्यों के विधासभा चुनावों के बाद नीतीश ने हिंदी को लेकर जो तेवर दिखाया है,उसे राजनीतिक चश्में से पढ़ा जा रहा है।

bihar cm nitish kumar

नीतीश के हिंदी प्रेम के पीछे की सियासत?
मंगलवार को दिल्ली में हुई इंडिया ब्लॉक की बैठक में उनके नाराज होने के किस्से समाचारों की हेडलाइन बन रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की मौजूदगी में डीएमके नेता टीआर बालू की ओर से अपने हिंदी के भाषण का अंग्रेजी अनुवाद मांगने पर नीतीश ने जो हिंदी प्रेम दिखाया है, वह सियासत के लिए सामान्य नहीं लग रहा!

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोगों को हिंदी आनी चाहिए, क्योंकि 'हिंदी एक राष्ट्रभाषा' है। वहां उन्होंने हिंदी को मुद्दा बनाकर अपने जो तेवर दिखाए हैं, उसके पीछे तीन संभावित वजहें हो सकती हैं:-

1) लोकसभा चुनावों में सम्मानजनक सीटें लेना
2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से बिहार की राजनीति में बहुत ज्यादा बदलाव आ चुका है। पूरा सियासी समीकरण बदल चुका है, जिसमें नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के लिए किसी भी सूरत में बेहतर स्थिति नजर नहीं आ रही है।

पिछला लोकसभा चुनाव जेडीयू ने बीजेपी के साथ मिलकर एनडीए में रहते हुए लड़ा था। 40 सीटों में से दोनों दल 17-17 पर लड़े थे और बाकी सीटें सहयोगी एलजेपी को दी गई थी। एनडीए सिर्फ एक सीट पर हारी थी और वह भी नीतीश की पार्टी की सीट थी।

लेकिन, 2020 के विधानसभा चुनावों में जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। भाजपा और राजद को उससे कहीं ज्यादा सीटें मिलीं। नीतीश कुमार 2020 में बीजेपी के एहसान से सीएम बने थे और 2022 में जबसे आरजेडी के साथ जुड़े हैं, तो भी लालू यादव के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री बने हुए हैं।

नीतीश को पूरा अंदाजा है कि महागठबंधन में रहते हुए उनके लिए जदयू के सारे 16 सीटिंग सांसदों के लिए सीटें ले पाना मुश्किल है। इसलिए, हो सकता है कि वह अभी से अपने तेवर दिखाने की कोशिश करने लगे हैं, ताकि लालू उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीटें देने को राजी हो जाएं।

2) पीएम उम्मीदवार नहीं बनाए जाने से नाराज!
मोदी सरकार और बीजेपी के खिलाफ 28 विपक्षी दलों का जो इंडिया ब्लॉक बना है, नीतीश खुद को उसका सूत्रधार मानते हैं। लेकिन, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम विपक्ष के पीएम उम्मीदवार के तौर पर उछाल दिया है, उससे भी नीतीश आहत हो सकते हैं और उनके गुस्से के पीछे यह भी एक वाजिब कारण हो सकता है।

वैसे तो नीतीश ऑन रिकॉर्ड यही कहते रहे हैं कि वह किसी पद की लालच में विपक्षी दलों को एकजुट नहीं कर रहे हैं। लेकिन, यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि उनकी पार्टी के नेता लगातार उनके लिए बैटिंग कर रहे हैं और कम से कम संयोजक बनाए जाने की मांग होती रही है।

3) बीजेपी के साथ वापसी की गुंजाइश बनाए रखना चाहते हैं!
अगर नीतीश कुमार को लोकसभा चुनावों के संभावित परिणामों का पूर्वानुमान लग चुका है तो शायद उनके मन में यह चल रहा हो कि इंडिया ब्लॉक की जीत नहीं दिख रही है! ऐसे में वह समय रहते ही अपना बचा-खुचा राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने की कोशिशों में जुटे हो सकते हैं!
यह भी हो सकता है कि वह भारतीय जनता पार्टी को संदेश देना चाहते हों कि अगर उन्होंने इंडिया ब्लॉक बनाने का काम किया है तो उसके नाव को डंवाडोल करने की भी ताकत रखते हैं!

सियासी 'ईमान' बदलने में माहिर हैं नीतीश कुमार!
पिछले तीन दशकों में नीतीश कुमार कम से कम 6 बार सियासी 'चोला' बदल चुके हैं। उन्होंने अपना राजनीतिक करियर एक तरह से लालू यादव के साथ ही शुरू किया था। लेकिन, 1994 में उनका साथ छोड़कर अलग पार्टी बना ली थी। दो साल बाद वे भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए का हिस्सा बन गए।

2013 में जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के पीएम उम्मीदवार का चेहरा बने तो उन्होंने बीजेपी को अपनी सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया। तब उनके पास बहुमत था। लेकिन, 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दौरान राजनीतिक मिट्टी पलीद हो गई तो लपक के वापस लालू के साथ चले गए।

2015 में बिहार विधासभा का चुनाव आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा, लेकिन 2017 में वापस भाजपा की छत्रछाया में शरणागत हो गए। लेकिन, 2020 के चुनावों में जब बीजेपी 110 सीटों पर लड़कर 74 सीटें जीत गई और जदयू 115 पर लड़कर भी 43 पर अटक गई तो नीतीश का राजनीतिक दम फूलना शुरू हो गया।

2022 में एक फिर से लालू यादव और कांग्रेस से हाथ मिला लिया। ऐसे में वह अपनी राजनीतिक पारी में अगर एक और बदलाव की सोच रहे हों तो यह असंभव भी नहीं है। हो सकता है कि उनकी यही सोच, उनके गुस्से के रूप में प्रकट हो रही हो!

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