Bihar Bhumihar: अमीर मानी जाने वाली जाति निकली सबसे गरीब, जातिगत सर्वे का सच या सियासी चालाकी?
बिहार में जातिगत जनगणना पर आधारित नीतीश कुमार सरकार ने मंगलावर को जो सामाजिक-आर्थिक आंकड़े विधानसभा में पेश किए हैं, उसको लेकर पहले दिन से कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। अब इसकी एक सबसे बड़ी खामी यह बताई जा रही है कि जिस जाति की गिनती बिहार में अबतक अमीरों में होती थी, नीतीश सरकार की रिपोर्ट ने उसे सबसे गरीब बता दिया है।
सवर्णों की यह जाति है-भूमिहार। जातिगत जनगणना के हिसाब से राज्य की कुल आबादी में भूमिहारों की जनसंख्या 2.86% है। लेकिन, मंगलवार को जो विस्तृत रिपोर्ट विधानसभा में पेश की गई है, उसके मुताबिक सामान्य जातियों के गरीबों में भूमिहारों की संख्या सबसे ज्यादा है।

बिहार में एक-तिहाई से ज्यादा परिवार गरीब
नीतीश सरकार ने 200 रुपए रोजाना या 6,000 रुपए महीने से कम कमाने वाले परिवारों को 'गरीब' माना है। इसके मुताबिक राज्य की एक-तिहाई (कुल जनसंख्या का)से भी ज्यादा आबादी यानि 34.13% (94,42,786 परिवार) गरीब है।
प्रत्येक गरीब परिवारों को 2 लाख रुपए देने का वादा
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह भी घोषणा की है कि राज्य सरकार प्रत्येक गरीब परिवारों को किश्तों में 2 लाख रुपए देगी, ताकि वह कोई काम कर सकें और अपनी आमदनी बढ़ा सकें। 2024 में लोकसभा चुनाव है और 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव होने हैं। उस हिसाब से ये आंकड़े देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल प्रदेश की गठबंधन सरकार के चुनावी इरादे की भनक दे हैं।
बिहार में भूमिहार सबसे गरीब
बिहार के सामाजिक-आर्थिक आंकड़े के मुताबिक 27.58% प्रतिशत भूमिहार परिवार आर्थिक रूप से गरीब हैं, जो सवर्णों में सबसे ज्यादा है। इनके कुल परिवारों की संख्या 8 लाख, 38 हजार 447 है, जिनमें से 2 लाख, 31 हजार, 211 परिवारों को गरीबों की श्रेणी में रखा गया है। मतलब, एक-चौथाई से ज्यादा भूमिहार परिवार सरकार से 2 लाख रुपए पाने का होगा हकदार।
जबकि, सवर्णों या सामान्य जाति के कुल 43.28 लाख परिवारों में से सिर्फ 10.85 लाख परिवार मतलब 25.09% ही गरीब हैं। इनमें 25.32% ब्राह्मण और 24.89% राजपूज गरीब हैं। इस आंकड़े के हिसाब से सवर्णों में कायस्थ सबसे अमीर हैं, जिनके सिर्फ 13.83% परिवारों को ही गरीबों की श्रेणी में रखा गया है।
बिहार के जातिगत सर्वे पर उठाए गए हैं सवाल
बिहार सरकार की ओर से करवाए गए जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी सवाल उठा चुके हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और मौजूदा केंद्रीय मंत्री और एलजेपी (पशुपति पारस गुट) नेता पशुपति पारस व्यक्तिगत स्तर पर सर्वे की खामियां उजागर कर चुके हैं।
अब भूमिहारों के साथ क्यों चलना चाहते हैं तेजस्वी?
अब इन तथ्यों को बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह (भूमिहार) की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे राज्य के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के बयान से जोड़कर देखते हैं। बिहार के भूमिहार आज भी श्रीबाबू को अपने नायक की तरह देखते हैं। यहां पर तेजस्वी यादव ने कहा, 'दिमाग से नहीं, दिल से कह रहा हूं...मैं आपके साथ (भूमिहारों के साथ) चलना चाहता हूं.....पुरानी बातों को छोड़ दें...मैं मानता हूं की आपको हिस्सेदारी कम दी गई है....मैंने कदम बढ़ा लिया है....आप मेरे साथ चलिए...'
लालू यादव के बेटे का यह बयान उस भूमिहार जाति के लिए हैं, जिससे लालू-राबड़ी के 15 वर्षों के शासन के दौरान उनकी पार्टी का छत्तीस का आंकड़ा माना जाता रहा है। 90 की दशक में बिहार की राजनीति में 'भूराबाल साफ करो' के कुख्यात कहावत में 'भू' भूमिहारों के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था।
ज्यादा प्रतिनिधित्व चाहते हैं भूमिहार
दरअसल, भूमिहारों की राजनीति को समझने वाले मानते हैं कि उनका बीजेपी से थोड़ा मोहभंग हुआ है। वह भाजपा के साथ दिल से तो जुड़े हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि पार्टी उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व दे पा रही है। जबकि, भूमिहार जाति के नेताओं को लगता है कि राजपूतों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। बिहार के सवर्णों में ये दोनों जातियां एकमुश्त वोटिंग करके चुनाव को प्रभावित करने का दम रखती हैं।
भूमिहार हमेशा से नवादा, जहानाबाद, मुजफ्फरपुर, मुंगेर जैसी लोकसभा सीटों पर अपनी दावेदारी जताते रहे हैं। लेकिन, बीजेपी ने पिछले चुनाव में गठबंधन की बाध्यता में ये सीटें सहयोगी दलों को दे दिए थे। सिर्फ बेगूसराय सीट भूमिहार नेता गिरिराज सिंह के खाते में आई थी। नवादा में भूमिहार जाति के नेता सांसद बने, जो कि पारस की पार्टी के हैं। लेकिन, मुंगेर वाले राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह, जेडीयू के टिकट पर जीते थे और वह आज लालू परिवार के ज्यादा करीब बताए जाते हैं।
बोचहां उपचुनाव से लालू के करीब जाने लगे भूमिहार?
भाजपा ने राकेश सिन्हा और विवेक ठाकुर को राज्यसभा में रखकर भूमिहारों की उम्मीदें पूरी करने की कोशिश जरूर की है, लेकिन उन्हें अपनी हिस्सेदारी अभी भी अपर्याप्त लग रही है। कहा जाता है कि मुजफ्फरपुर की बोचहां (सुरक्षित) विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी को भूमिहारों ने ही ताल ठोककर हरवा दिया और आरजेडी का समर्थन कर दिया था।
जात-पात के लिए ऐतिहासिक तौर पर बदनाम बिहार की सच्चाई को नीतीश कुमार सरकार के जातिगत सर्वे ने औपचारिक तमगा भी पहना दिया है। इसने जिस तरह से एक-एक जाति को उनकी संख्या का गुब्बारा थमाया गया है, उससे अपनी क्षमता के हिसाब से सबकी मोल-भाव करने की शक्ति बढ़ गई है। राजनीतिक विश्लेषक माते हैं कि आने वाले चुनावों में बिहार की सवर्ण जातियां वोट बैंक बनकर किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं। भूमिहारों की 'गरीबी' के माध्यम से लगता है कि उसी की शुरुआत हो रही है!
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