राजनीति की चिंगारी से सुलग उठा शिक्षा का मंदिर 'बीएचयू'
वाराणसी। पंडित मदन मोहन मालवीय की पवित्र भूमि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में मिलने वाली शिक्षा का डंका देश ही नहीं दुनिया भर में बजता रहा है, लेकिन इन दिनों शिक्षा का यह मंदिर सुलग उठा है और इसके केंद्र में है राजनीति। यह राजनीति छात्रों की ओर से है या विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से, नहीं मालूम लेकिन राजनीति के इस खेल में नुकसान सिर्फ और सिर्फ छात्रों का हो रहा है।

शिक्षा के इस मंदिर से निकले छात्र जहां विभिन्न अकादमिक क्षेत्रों में शिखर पर पहुंचे हैं, वहीं विश्वविद्यालय में राजनीति का पाठ पढ़कर कई छात्र राजनीति का शिखर भी छुए हैं। लेकिन छात्रों को राजनीति के शिखर पर पहुंचाने वाला छात्रों का संघ बीएचयू में वर्ष 1997 से ही निलंबित है। इसके स्थान पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र परिषद की व्यवस्था की है, जिसके पास छात्रों के अनुसार कोई अधिकार नहीं है। छात्र अधिकार चाहते हैं, छात्र संघ की बहाली चाहते हैं, ताकि विश्वविद्यालय प्रशासन की मनमानी से लड़ने का कोई मंच उनके पास हो।
लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन इसके खिलाफ है। बीएचयू में हुए बवाल की मूल जड़ यही है। नियम के अनुसार छात्र परिषद का अध्यक्ष विश्वविद्यालय का ही कोई प्रोफेसर होगा और छात्रों को उसका सदस्य बनाया जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के एक गुट को छात्र परिषद में शामिल होने का लालच दे रहा है, जिससे छात्रों का दूसरा गुट नाराज है।
विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि हिंसा से छात्रों का भला होने वाला नहीं है। इस उपद्रव के बाद तो अब विश्वविद्यालय 17 वर्षो बाद एक बार फिर अनिश्चितकालीन बंद की ओर बढ़ रहा है। वर्ष 1984 में बीएचयू में महामंत्री रह चुके सूबेदार सिंह ने आईएएनएस को बताया कि बीएचयू में छात्रों के साथ ज्यादती हो रही है।
सूबेदार ने कहा कि छात्र संघ न होने का ही परिणाम है कि आज बीएचयू में शिक्षा का स्तर काफी गिर गया है। आज भ्रष्टाचार चरम पर है। परिसर में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला कौन है। छात्र संघ इसीलिए होता है कि वह विश्वविद्यालय प्रशासन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे। सूबेदार बताते हैं कि वर्ष 1997 से ही बीएचयू में छात्र संघ भंग है।
तब विश्वविद्यालय में भड़की हिंसा में दो छात्रों की मौत हो गई थी। इस बवाल के बाद भेलूपुर के तत्कालीन सीओ जेपी सिंह और बीएचयू के चीफ प्रॉक्टर ओंकार सिंह के खिलाफ 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने भी अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। सूबेदार सिंह कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनियाभर में आज लोकतंत्र की दुहाई देते फिर रहे हैं लेकिन बीएचयू परिसर में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है।
आज एक बार फिर 1997 वाली परिस्थति पैदा हो गई है। वह हाल में भड़की हिंसा के पीछे विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही मानते हैं। बीएचयू छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके आनंद प्रधान ने आईएएनएस से कहा, "दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी चुनाव होता है, लेकिन बीएचयू को अपवाद बना दिया गया है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। प्रधान कहते हैं कि छात्र संघ चुनाव में अब धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल होने लगा है, लेकिन क्या डीयू और जेएनयू में ऐसा नहीं होता, लेकिन वहां भी तो चुनाव होता है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय को छात्रों के साथ बातचीत कर एक आदर्श स्थिति बनानी चाहिए। परिसर के भीतर इतना बड़ा बवाल कैसे हो रहा है, यह भी बड़ा सवाल है। कुलपति को खुद आगे आकर छात्रों और प्रोफेसरों से बात करनी चाहिए और समस्या का समाधान निकालना चाहिए।
विश्वविद्यालय के सूत्र बताते हैं कि 70 के दशक में यहां की छात्र राजनीति काफी साफ -सुथरी हुआ करती थी। उस समय विश्वविद्यालय में 'स्वच्छ' व 'स्वस्थ' राजनीति हुआ करती थी, लेकिन जैसे-जैसे छात्र राजनीति में 'धनबल' और 'बाहुबल' का रसूख बढ़ता गया, वैसे-वैसे बीएचयू छात्र संघ की फिजा भी बदलती चली गई।
वर्ष 1973-74 में बीएचयू की राजनीति में मुख्य भूमिका निभा चुके केदारनाथ सिंह वर्तमान में उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं। 70 के दशक में बीएचयू छात्र संघ के उपाध्यक्ष रह चुके सिंह ने आईएएनएस से कहा कि छात्र संघ का गठन छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन धनबल और बाहुबल ने इसको गंदा बना दिया है।
केदारनाथ ने बताया कि यह सही बात है कि बीएचयू में छात्र परिषद के पास उतने अधिकार नहीं हैं, जितने छात्र संघ के पास होते हैं लेकिन बदली हुई परिस्थति में विश्वविद्यालय प्रशासन को सामंजस्य बिठाने की जरूरत है। विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने नाम जाहिर न करने के आग्रह के साथ आशंका जताई कि विश्वविद्यालय प्रशासन में बैठे कुछ लोग मौजूदा घटना के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले लोग छात्र संघ नहीं चाहते, लिहाजा वे इस मुद्दे को उलझाए रखने की स्थितियां पैदा करते रहते हैं। मौजूदा घटना में उनका हाथ हो सकता है। (आईएएनएस)












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