कल्याणकारी योजनाएं लाने से पहले उसके वित्तीय प्रभाव को भी देखे सरकार, SC ने क्यों की ये टिप्पणी ? जानिए
नई दिल्ली, 7 अप्रैल: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई भी कल्याणकारी योजना या फिर कानून लाने से पहले सरकार को उसके वित्तीय प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए। कोर्ट ने 'वी द वुमेन ऑफ इंडिया' की ओर से घरेलू हिंसा कानून के सही तरीके से तामील कराने को लेकर दायर याचिका की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है। इस दौरान कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार कानून का भी जिक्र किया है और सरकारी व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणियां की हैं। मामले की अगली सुनवाई 26 अप्रैल को होगी, जिस दिन केंद्र सरकार को इस मामले में स्टैटस रिपोर्ट भी दाखिल करनी है।

कल्याणकारी योजनाओं के वित्तीय प्रभाव का आकलन जरूरी-सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कल्याणकारी योजनाओं और कानूनों के लागू किए जाने को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि ऐसा करने से पहले उसके वित्तीय असर का भी आकलन किया जाना चाहिए। जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस रविंद्र भट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच ने यह टिप्पणी ने घरेलू हिंसा कानून के अनिवार्य प्रावधानों के उचित तामील कराने को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान की है। यह याचिका महिलाओं के संरक्षण के लिए बने इस कानून के तहत प्रोटेक्शन ऑफिसरों की नियुक्ति को लेकर दायर की गई है।
'शिक्षा का अधिकार' कानून का भी जिक्र
इसी पर सुनवाई के दौरान बेंच ने केंद्र सरकार को लेकर यह टिप्पणी की है कि उसे ऐसा करते समय उसकी वजह से होने वाले वित्तीय असर को भी जरूर ध्यान में रखना चाहिए। इस मौके पर अदालत ने शिक्षा के अधिकार कानून का उदाहरण भी दिया है और इसे एक सटीक उदाहरण बताते हुए सवाल किया कि 'स्कूल कहां हैं, राज्यों को टीचर कहां से मिलेंगे।' कोर्ट ने कुछ शिक्षकों की कम सैलरी को लेकर भी टिप्पणी की है।
26 अप्रैल को अगली सुनवाई
इस बीच सरकार ने 25 फरवरी को अदालत की ओर से जारी निर्देशों के पालन के लिए कुछ और समय की मांग की। जिसपर कोर्ट ने सरकार को दो हफ्ते का वक्त देते हुए स्टैटस रिपोर्ट पेश करने के लिए कहते हुए अगली सुनवाई की तारीख 26 अप्रैल को पक्की कर दी है। 25 फरवरी को अदालत ने भारत सरकार से एक हलफनामा दायर करके घरेलू हिंसा कानून के तहत विभिन्न प्रावधानों, फंडिंग, वित्तीय सहायता और कंट्रोल मैकेनिज्न के बारे में विस्तृत जानकारी देने को कहा है। कोर्ट ने केंद्र से इस कानून के तहत शिकायतों, अदालतों की संख्या और प्रोटेक्शन ऑफिसरों की तुलनात्मक संख्या का भी ब्योरा देने को कहा है। अदालत ने यह व्यवस्था याचिकाकर्ता 'वी द वुमेन ऑफ इंडिया' का ओर से दायर याचिका की सुनवाई करते हुई दी है, जिसका मुकदमा शोभा गुप्ता नाम की वकील लड़ रही हैं।












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