BBC SPECIAL: यूपी का मुसलमान इतना परेशान क्यों है?

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद क्या मुसलमानों की मुश्किलें बढ़ी हैं? बीबीसी हिंदी की ख़ास सिरीज़ की पहली कड़ी.

संभल-रामपुर हाईवे पर पलौला नाम के एक गाँव में चारपाई पर बैठे कुछ गांव वाले बारी-बारी से लंबी साँसे लेकर हुक़्क़ा गुड़गुड़ा रहे हैं.

चर्चा नोटबंदी से लेकर मीटबंदी पर हो रही है और मौजूदा हालात से समझौता करने की सलाह दी जा रही है.

चर्चा में शामिल तौसिफुर रहमान विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत, योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने और "अवैध" बूचड़खानों के खिलाफ मुहिम को हिन्दू राष्ट्र से जोड़ते हैं.

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वो कहते हैं, "इस में कोई शक नहीं कि ये हिन्दू राष्ट्र होने वाला है. लोग इसकी काफी कोशिश कर रहे हैं."

वहां बैठे लोग रहमान से सर हिला कर सहमति जताते हैं. राज्य में जगह-जगह आम मुसलमानों की राय इससे मिलती जुलती थी. अगर एक साधारण मुसलमान ये सोच रहा है कि भारत हिन्दू राष्ट्र होने वाला है तो मुस्लिम नेता कहते हैं कि ये तो पहले से ही एक हिन्दू राष्ट्र है.

उत्तर प्रदेश के मुस्लमान
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उत्तर प्रदेश के मुस्लमान

संभल से समाजवादी पार्टी के छठी बार विधायक बने और पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे इक़बाल महमूद कहते हैं कि भारत हिन्दू राष्ट्र तो आज़ादी के पहले दिन से है.

"हिन्दू राष्ट्र में रखा क्या है? हिंदुस्तान के अंदर हिन्दू मेजोरिटी में हैं. इनकी सरकारें बनती आयीं हैं पहले दिन से और आगे भी उन्हीं की सरकार होगी. मुसलमान या दूसरी माइनॉरिटी ने कभी दावा नहीं किया कि हम प्रधानमंत्री बनेंगे. हिन्दू राष्ट्र है हिन्दू ही बनेंगे."

दरअसल हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा की ज़बरदस्त जीत और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य के मुस्लिम समाज में खलबली सी मच गयी है. डर का माहौल बन गया है.

बीजेपी की ज़बरदस्त कामयाबी से उन्हें एक बड़ा सियासी झटका लगा है और इसे वो उतनी ही बड़ी घटना मानते हैं जितनी बड़ी बाबरी मस्जिद के 1992 में गिराये जाने को मानते हैं.

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अवैध कहे जाने वाले बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई और राम मंदिर बनाने के लिए नए सिरे से बयानबाज़ी के कारण मुसलमानों में डर बढ़ रहा है. राज्य का मुसलमान खुद को अकेला और असुरक्षित महसूस करने लगा है.

उत्तर प्रदेश के मुस्लमान
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उत्तर प्रदेश के मुस्लमान

उसे लग रहा है कि अब उसके अधिकार छीन लिए जाएंगे और वो दूसर दर्जे का नागरिक बन कर रह जाएगा.

रामपुर के विधायक आज़म खान एक ज़माने से चुनाव जीतते आ रहे हैं और पिछली सरकार में एक अहम मंत्री थे. वो कहते हैं, "मुसलमानों के पास पाकिस्तान जाने का विकल्प था वो नहीं गए. अब उनसे कहा जाता है कि तुम्हारे यहाँ रहने का क्या औचित्य है."

नाम बताने से डर रहा है मुसलमान

आज़म खान कहते हैं कि मुसलमान तो अपना नाम बताने से डरने लगा है. "क़ायदे से भारत एक हिन्दू राष्ट्र है ही. जिनकी अक्सरियत उन्हीं का राष्ट्र". उनके अनुसार ये कोई नई बात नहीं है.

"मुसलमानों के मताधिकार को ख़त्म करने की बात बहुत ज़माने से चल रही है. मुसलमानों को दूसरे और तीसरे दर्जे का शहरी बनाने की बात बहुत ज़माने से चल रही है और ये आरएसएस का एजेंडा भी है. मुसलमान दूसरे और तीसरे दर्जे का शहरी तो दूर वो अपना नाम बताने से भी डरने लगा है."

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भारत के सब से घनी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत है, यानी राज्य में चार करोड़ मुस्लिम बसते हैं. विधानसभा की 403 सीटों के लिए हाल ही में हुए चुनाव में बीजेपी ने किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा.

उसके उम्मीदवारों ने मुस्लिम वोट खुले आम नहीं मांगे. इसके बावजूद पार्टी को रिकॉर्ड तोड़ जीत मिली. पिछले चुनाव में 65 मुस्लिम उम्मीदवार चुन कर आये थे. इस विधानसभा में इनकी संख्या घट कर 23 हो गई जिनमें से अधिकतर समाजवादी पार्टी के हैं.

मुसलमानों को लग रहा है कि सत्तारूढ़ पार्टी में सियासी भागेदारी नहीं होने के कारण विधानसभा में उनकी वकालत करने वाला कोई नहीं होगा.

शिव बहादुर सक्सेना बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता हैं. विधानसभा चुनाव में वो आज़म खान से हार कर दूसरे स्थान पर रहे. दो बार मंत्री रह चुके सक्सेना कहते हैं कि मुसलमान चिंतित है कि अब तक जो वो मनमानी करते थे वो अब नहीं चलेगी.

"रामपुर में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. यहाँ शहर में देखिये जाकर जहाँ 20 घर हिंदुओं के हैं वो चारों तरफ मुसलमानों के घरों से घिरे हैं. मुस्लमान उन्हें दबाते थे. उन हिंदुओं में लगा कि अब उनकी सरकार आ गई है."

वो आगे कहते हैं, "ये है भय इनको कि जिनपर वो हकूमत चलाते थे वो अब उनके सामने खड़े हो गए हैं."

क्या है मुसलमानों का डर?

लेकिन यूपी का मुसलमान बीजेपी से डरता है. रामपुर के एक बाजार में कुछ लोगों से पूछे जाने पर कि बीजेपी को वो किस नज़र से देखते हैं मोहम्मद इक़बाल नामी एक व्यक्ति ने ये कहा, "मुसलमान जब उनके क़रीब जाने की कोशिश करता है तो उनका बर्ताव ऐसा होने लगता है कि मुसलमान उनसे दूर होने लगता है जैसे कि गौ रक्षा या तीन तलाक़ का मुद्दा. इन सब मुद्दों से मुसलमानों में बदज़नी फैलती है. अगर ये बातें दूर कर दें तो मुसलमान उनके क़रीब आ सकता है."

लेकिन उनके साथी हामिद अली कहते हैं मुसलमान खुद बीजेपी में जाना नहीं चाहता है." अगर वो पार्टी में जाए और टिकेट मांगे तो क्यों उसे नहीं मिलेगा टिकेट? आप बीजेपी में जाएँ, टिकेट लें और चुनाव लड़ें. जब आप बीजेपी से खुद बचेंगे तो क्या होगा?"

हामिद अली मुसलमान नेताओं को इसका ज़िम्मेदार ठहराते हैं, "असल में हमारे नेता हमें बाँटना चाहते हैं. अगर मुसलमान बीजेपी का टिकेट ले ले तो वो एक हव्वा खड़ा कर देते हैं."

राज्य में दो बार मंत्री रहे शिवबहादुर सक्सेना कहते हैं कि उनकी पार्टी मुसलमानों को स्वीकार करने को तैयार बैठी है. "ये (मुसलमान ) एक क़दम हमारी तरफ आकर तो देखें, हम दो क़दम आगे बढ़कर गले नहीं गले लगाएं तो कहना. लेकिन यूपी के मुसलमानों को अपनी मानसिकता बदलनी पड़ेगी."

मानसिकता बदलने से उनका क्या मतलब है, ये सक्सेना ने नहीं बताया लेकिन कहा कि मुसलमानों को बीजेपी पर भरोसा करना चाहिए. "प्रधानमंत्री का नारा है सब का साथ सब का विकास. हम इसमें उन्हें भी शामिल करना चाहते हैं."

बीजेपी से नाता जोड़ना है विकल्प?

बीजेपी के सत्ता पर आने के बाद मुसलमानों में अब चिंतन भी हो रहा है. एक आत्मनिरीक्षण का दौर शुरू हो चुका है. एक सर्वसम्मत विचार ये था कि अगर बीजेपी मुस्लिम-विरोधी है तो खुद को "मुसलमानों का मसीहा" कहने वाली पार्टियों ने समुदाय का कितना भला किया?

संभल के बुज़ुर्ग मुस्लिम नेता शफीकुर रहमान बर्क़ समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य थे और चार बार लोक सभा का चुनाव जीत चुके हैं. वो हाल में आल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लेमीन में शामिल हो गए.

उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी और दूसरी सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों को ग़ुलाम की तरह से इस्तेमाल किया है, "उन पार्टियों ने भी मुसलमानों को बंधुआ मज़दूर की तरह रखा और उनको बराबर का शरीक नहीं माना जिसकी वजह से मुसलमानों में ग़ुरबत, बेरोज़गारी और तालीम (शिक्षा) का मसला हल नहीं हो सका है."

बर्क़ 86 वर्ष के हैं और बिलकुल स्वस्थ. उनका कहना था कि आज के मुसलमानों का धार्मिक और नैतिक किरदार काफी कमज़ोर हो गया है. उनके अनुसार एक ज़माना था जब मुसलमान तीन खूबियों के लिए जाना जाता था - वफादारी, ईमानदारी और सच बोलने की आदत.

उनके अनुसार मुसलमान की इज़्ज़त उसी वक़्त बढ़ेगी जब वो इन खूबियों को फिर से अपनाएगा. दूसरी तरफ मुसलमान के बीच एकता बनाने की बात भी ज़ोर पकड़ रही है.

आजम खान
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आजम खान

इसपर नेता और आम जनता दोनों सहमत हैं. हर तरफ ये चर्चा हो रही है कि मुस्लिम समुदाय कई फ़िरक़ों और गिरोहों में बंट गया है जिसके कारण उनके वोट भी बंट जाते हैं.

कई लोगों ने कहा कि चुनावों में किसी पार्टी का वोट बैंक न बनें. आईटी उद्योग से जुड़े एक युवा तनवीर अली के अनुसार मुस्लिम समुदाय को एक क्षेत्र में एक मुस्लिम उम्मीदवार को ही वोट दे ताकि उसका वोट न बंटे.

मुसलमानों के लिए एकता के मायने

आज़म खान भी एकता के हामी हैं लेकिन वो इस एकता में उन मुसलमान को शामिल नहीं करना चाहते जिन्हें वो मुसलमान का ग़द्दार कहते हैं. इस लिस्ट में वो असदउद्दीन ओवैसी, दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुख़ारी और उलेमा कौंसिल के धार्मिक नेताओं को शामिल करते हैं.

लेकिन अधिकतर मुसलमान, जिनमे बर्क़ और महमूद जैस नेता शामिल हैं, कहते हैं कि मुस्लिम एकता काफी नहीं है. मुसलमानों को सेक्युलर ताक़तों के साथ पूरी तरह से जुड़ना पड़ेगा. लेकिन ये जितना कहना आसान है करना उतना मुश्किल.

हामिद अली के अनुसार फिलहाल ज़रुरत इस बात की है कि राज्य में शांति बनाये रखें. बीजेपी को उनकी सलाह ये थी: "जितने भी बीजेपी लीडर हैं वो अपनी ज़बान संभालें, मुहब्बत से पेश आएं, दिल तोड़ने वाली बात न करें. दिल तोडना अच्छा नहीं होता. प्यार-मुहब्बत से हमें रखें."

अली अपने समुदाय के नेताओं को भी एक सलाह देते हैं, "हमें बाटने की कोशिश न करें, माहौल न बिगाड़ें और बीजेपी से जुड़ने वालों का हव्वा न खड़ा करें."

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