बाबरी मस्जिद विध्वंस: सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई अदालत की राय बिल्कुल अलग कैसे हो गई?
भारतीय सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों वाली संवैधानिक खंडपीठ ने नवम्बर माह में अपने फ़ैसले में साफ़ तौर पर कहा था कि बाबरी मस्जिद को गिराया जाना एक "ग़ैर क़ानूनी" कृत्य था.
सुप्रीम कोर्ट खंडपीठ का नेतृत्व ख़ुद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश कर रहे थे. लेकिन क्या कारण रहा कि सीबीआई की विशेष अदालत को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में अभियुक्त बनाए गए लोगों क ख़िलाफ़ साक्ष्य नहीं नज़र आए और सभी को बरी कर दिया गया?
इस बारे में क़ानूनविदों और वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि जो फ़ैसला सीबीआई की विशेष अदालत ने दिया और जो पिछले साल सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक खंडपीठ ने दिया, दोनों में काफ़ी विरोधाभास है.
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि जो लोग सीबीआई के निचली अदालत में बतौर गवाह पेश हुए और उन्होंने अपना पक्ष अदालत के सामने रखा लेकिन आश्चर्य है कि अदालत ने उनकी गवाही का कोई संज्ञान ही नहीं लिया.
850 गवाहों के बयान, फिर भी कुछ साबित नहीं हुआ
बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत में कुल 850 गवाहों के बयान दर्ज हुए थे.
जिलानी का कहना है कि अदालत ने फ़ैसला सुनाने से पहले न तो 6 दिसंबर 1992 की घटना से सम्बंधित अखबारों और पत्रिकाओं में छपी रिपोर्टों को ही संज्ञान में लिया, न तस्वीरों को और न ही विडियो को, जबकि ये सब कुछ अब 'पब्लिक डोमेन' यानी सार्वजनिक है.
उस समय अभियुक्तों की भूमिका बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने में क्या थी ये भी सार्वजनिक ही है.
वो कहते हैं, "वो वीडियो भी इंटरनेट पर अब मौजूद हैं जिनमें भारतीय जाता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद् और दूसरे हिंदू संगठन के नेता कारसेवकों को मस्जिद तोड़ने के लिए उकसाते हुए साफ़ दिख रहे हैं. उसमें कुछ नेताओं को माइक से घोषणा करते हुए साफ़ देखा जा सकता है जिनमें वो कह रहे हैं-एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो."
जिलानी ने इसपर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि सार्वजनिक तौर पर मौजूद सबूतों को कोई अदालत कैसे अनदेखा कर सकती है?

भड़काऊ नारे, हथियारों से लैस कारसेवक
उनका तर्क है कि जिनकी गवाही अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज हैं वो उस वक़्त अयोध्या में तैनात वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं. इसके अलावा जो उस वक़्त ये पूरा माजरा रिपोर्ट कर रहे थे वो पत्रकार भी गवाह हैं.
वो कहते हैं, "इन गवाहों ने जो बयान दिए, उन पर अदालत ने भरोसा नहीं किया. फ़ैसला बताता है कि अदालत ने गवाहों की बात को तरजीह नहीं दी. तो क्या ये सभी गवाह झूठ बोल रहे थे? अगर ऐसा है तो फिर अदालत न इन सब पर क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की?"
हैदराबाद स्थित नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी संवाददाता दीप्ति बाथिनी से बातचीत में सीबीआई की विशेष अदालत के फ़ैसले को "निराशाजनक" बताया और कहा कि ये भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक धक्का है.
उन्होंने कहा, "बीजेपी और शिवसेना के नेताओं के उस व़क्त के भाषण उपलब्ध हैं. तब जो धर्म संसद आयोजित हो रही थीं, उनमें दिए नारे देखे जा सकते हैं. जो कार सेवक उस दिन आए थे,वो कुल्हाड़ी, फावड़ों और रस्सियों से लैस थे. इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि ये षड्यंत्र था."
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'अचानक नहीं टूटी बाबरी'
प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं कि इतने बड़े अपराध के लिए किसी को दोषी न पाया जाना देश की क़ानून व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है.
उन्होंने कहा, "इससे यही लगता है कि सीबीआई अपना काम ठीक से नहीं कर पाई क्योंकि इतने ऑडियो, वीडियो साक्ष्य और 350 से ज़्यादा प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के बावजूद ठोस सबूत ना मिल पाने की बात समझ नहीं आती."
देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई गृह मंत्रालय (भारत सरकार) के तहत आती है. प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के मुताबिक़ जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष का अलग-अलग और स्वायत्त होना ज़रूरी है.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने 6 दिसंबर 1992 की घटना और उस दौरान पैदा हुए माहौल पर किताब भी लिखी है.
बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में उनका कहना था कि वर्ष 1989 में ही विश्व हिंदू परिषद ने अदालत के समक्ष स्पष्ट कर दिया था कि वो वहाँ मौजूद मस्जिद के ढांचे को तोड़कर मंदिर का निर्माण करना चाहता है. विश्व हिंदू परिषद का इरादा साफ़ था.
मुखोपाध्याय कहते हैं कि ये सिर्फ़ एक दिन की बात या सिर्फ़ एक घटना नहीं थी जो अचानक 6 दिसंबर 1992 को घटित हुई.
वो कहते हैं, "इसकी तैयारी काफी लंबे समय से चल रही थी और ये पूरी तरह से नियोजित थी. इसके सत्यापन के लिए बहुत सारे सुबूत अख़बारों की करतनों और पत्रिकाओं की रिपोर्टों में मौजूद हैं. सब कुछ 'डॉक्युमेंटेड' है और सार्वजनिक भी है. इतने बरसों तक जो हिंदू संगठनों ने अभियान चलाया था उसका असली मक़सद ही था कि बाबरी मस्जिद के मौजूदा ढाँचे को तोड़कर वहाँ मंदिर बनाया जाए."
उनका कहना था कि लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा का भी यही मकसद था.
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सभी अभियुक्त कैसे बरी हो गए?
सीबीआई की विशेष अदालत ने अपने फ़ैसले में साफ़ किया कि जो आरोपपत्र अभियोजन पक्ष की तरफ़ से दायर किया गया उसमें कहीं से भी ये बात साबित नहीं होती है कि नामज़द अभियुक्तों ने लोगों को उकसाया या दंगे जैसे हालात पैदा किए.
विशेष अदालत ने ये भी पाया कि 6 दिसंबर 1992 को दोपहर में कारसेवक अचानक बेकाबू हो गए और वो नाकेबंदी तो तोड़ते हुए बाबरी मस्जिद पर चढ़ गए थे, जबकि विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल उन्हें ऐसा करने से मना कर रहे थे.
अदालत का ये भी मानना है कि कारसेवकों के बीच कुछ आपराधिक तत्व थे जिन्होंने इस कार्य को अंज़ाम दिया क्योंकि अगर वो राम भक्त होते तो अशोक सिंघल की बात सुनते जो बार-बार कह रहे थे कि उस विवादित जगह पर मूर्तियाँ भी हैं.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "क़ानून में षड्यंत्र एक ऐसी चीज़ होती है जिसे साबित करना आसान नहीं होता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि यह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर होता है. वहाँ अंजू गुप्ता जो आईपीएस हैं, उनकी और कई अन्य लोगों की गवाही थी जिनकी सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है.''
''दूसरा, अगर कहीं भीड़ इकट्ठी होती है और कोई ग़ैर-क़ानूनी काम करती है तो आईपीसी के सेक्शन 149 के मुताबिक़, भीड़ के लोग एक-दूसरे के कार्यों के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. यह तो स्थापित तथ्य है कि बाबरी मस्जिद थी और गिराई गई. ऐसे में क़ानून के हिसाब से उन लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है."
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विरोधाभास से भरे फ़ैसले
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सेवा निवृत जस्टिस एमएस लिब्राहन के नेतृत्व में एक जांच आयोग का गठन किया था जिसने 17 वर्षों के बाद साल 2009 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी.
आयोग ने कुल 100 गवाहों के बयान दर्ज किए और अपनी रिपोर्ट में लाल कृष्ण आडवाणी, कलराज मिश्रा, मुरली मनोहर जोशी सहित 68 लोगों की दंगा फैलाने और बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने में अहम भूमिका की बात कही.
जस्टिस एमएस लिब्राहन ने बीबीसी संवाददाता अरविंद छाबड़ा से कहा कि आयोग की जांच में आपराधिक षड्यंत्र और बाबरी मस्जिद के ढांचे को तोड़े जाने में जिन लोगों की अहम भूमिका थी उनके ख़िलाफ़ सुबूत भी रखे गए थे.
जस्टिस लिब्राहन कहना है कि आयोग की रिपोर्ट और सीबीआई की विशेष अदालत के फैसले में भी काफ़ी विरोधाभास है.
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