Ram Mandir: जब पहली बार गूंजा 'मंदिर वहीं बनाएंगे' का नारा, जानें कैसे हुई 'राम नाम' की राजनीति में इंट्री
अयोध्या में 22 जनवरी को राम मंदिर का उद्घाटन होना है। इस दिन रामलला की उत्सव मूर्ति गर्भ गृह में स्थापित की जाएगी। ये मुद्दा शुरू से ही राजनीति का केंद्र रहा है। राम मंदिर और इस से जुड़ी लोगों की आस्था राजनीतिक पार्टीयां के काम आती रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं इस मुद्दे को सबसे पहले राजनीति के लिए कब इस्तेमाल किया गया?
आज बीजेपी पर धर्म और राम मंदिर के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है ऐसे में जाहिर तौर पर राम मंदिर से होने वाला राजनीतिक लाभ बीजेपी को मिल रहा है। लेकिन आज विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने ही कभी इस मुद्दे को राजनीतिक बनाया था।

एक उपचुनाव की लड़ाई में ही कांग्रेस ने राम मंदिर के मसले को राजनीति में लाया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये पहली बार था जब राम नाम की राजनीति में एंट्री हुई थी।
ये बात है आजादी मिलने के ठीक एक साल बाद की। संविधान लिखा जा रहा था। अयोध्या में रामजन्मभूमि का मुद्दा एक बार फिर से गरमाने लगा था। क्योंकि ब्रिटिश सरकार इस मामले पर कोई एक्शन नहीं ले पाई थी। 1949 आते-आते इस मुद्दे ने रफ्तार पकड़ ली और फिर सियासी रास्ते की ओर बढ़ गई।
1948 में उत्तर प्रदेश के 13 विधान सभा सीटों पर उप चुनाव होने थे। केंद्र और यूपी में कांग्रेस की सरकार थी। उपचुनाव होने का कारण था कांग्रेस के अंदर समाजवादी खेमे का टूटना। इसी वक्त कांग्रेस ने पहली बार राजनीति में राम नाम का सहारा लिया था।
कांग्रेस की ओर से चुनाव में खड़े हुए बाबा राघवदास ने ऐलान किया था कि वह राम जन्मभूमि को विरोधियों से मुक्त कराएंगे। उनकी बातों का वोटरों पर असर हुआ और वह उप चुनाव जीत गए। यहां से शुरू हुआ राम नाम का जादू आज भी चल रहा है।
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बाबा राघवदास के उपचुनाव जीतते ही रामभक्तों को उम्मीद हो गई अब श्रीराम मंदिर अयोध्या में बन जाएगा। हालांकि जीत के बाद कांग्रेस इस मुद्दे पर कंफ्यूज होने लगी। पीएम नेहरू कानून व्यवस्था को बनाए रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने मंदिर बनाने पर कोई फैसला नहीं लिया। बाबा राघवदास ने 1949 में यूपी सरकार को पत्र लिखकर वहां मंदिर निर्माण की इजाजत मांगी थी।
सिटी मजिस्ट्रेट ने सिफारिश की कि यह जमीन नजूल की है और मंदिर निर्माण की इजाजत दी जा सकती है। बाबा राघवदास ने हिंदू समाज को एकजुट किया और विवादित ढांचे के आस-पास सफाई कराई गई। पूजा पाठ शुरु हुआ। हालांकि विवाद से बचने के लिए प्रशासन ने वहां PAC लगाकर एक चौकी बना दी।
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इसके कुछ समय बाद ही 22-23 दिसबंर को ही अचानक विवादित ढांचे में रामलला की मूर्ति पाई गई। आरोप था किसी ने मूर्ति वहां रखी है। मामला कोर्ट में गया और कोर्ट ने विवादित ढांचे में ताला लगाने का आदेश देते हुए मूर्ति की देखभाल का आदेश दिया।
यही वो समय था जब पीएम नेहरु ने तत्कालीन सीएम जीबी पंत को एक टेलीग्राम किया और कहा कि मुझे उम्मीद है कि आप इसमें व्यक्तिगत रुचि लंगें। मैं इस घटना से विचलित हूं और वहां खतरनाक मिसाल कायम की जा रही है। इसके बाद यूपी सीएम ने इसपर डीएम को डांट लगाई और मूर्ति हटवाने का आदेश दिया। लेकिन तत्कालीन डीएम केके नायर ने मना कर दिया। दूसरी बार फिर से जब सीएम ने जबरन दबाव बनाया तो नायर ने पद से ही इस्तीफा दे दिया था।
सालों बाद विवादित ढांचा ढह गया और उसके करीब तीन दशक बाद आज उस जगह पर मंदिर का निर्माण हो रहा है। कांग्रेस से शुरू हुए राम मंदिर की राजनीति अब बीजेपी के पाले में आ गई है।
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