Ayodhya Ram Mandir: 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर-दक्षिण,पूरब-पश्चिम को साधेगी बीजेपी, जानिए कैसे?
Ayodhya Ram Mandir Udghatan Date: अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर निर्माण के अंतिम चरणों से गुजर रहा है। पूरा देश 22 जनवरी, 2024 को पवित्र राम जन्मभूमि पर भगवान राम लला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का गवाह बनने के इंतजार में है।
पूरी तरह से तैयार होने के बाद यह राम मंदिर भारत की 'विविधता में एकता' का अद्भुत प्रतीक बनकर सामने आने वाला है। अगर 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले इसके सियासी संदेश को पकड़ने की कोशिश करें तो इसकी भव्यता बहुत सारे राजनीतिक समीकरणों की सीमाओं से भी पार जा सकती है।

राम मंदिर निर्माण का श्रेय लेगी भाजपा
इसमें कोई दो राय नहीं कि पवित्र राम जन्मभूमि पर ही मंदिर निर्माण का श्रेय लेने में बीजेपी कोई कसर छोड़ रही है या छोड़ना चाहेगी। आखिर दशकों पुराना उसका संकल्प पूरा हो रहा है।
जिस विचारधारा की प्रतिबद्धता ने राम जन्मभूमि पर ही राम मंदिर बनने का संकल्प पूरा कराया है, भाजपा उसी विचारधारा की पैदाइश है और उसी पर आधारित राजनीति करती है।
'भगवान राम देश की विविधता में एकता का सामान्य सूत्र'
5 अगस्त, 2020 को राम मंदिर के भूमि पूजन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भगवान राम को 'देश की विविधता में एकता का सामान्य सूत्र' बताया था। यह मंदिर उसी थीम का जीता-जागता उदाहरण बनने को तैयार हो चुका है। यह पीएम मोदी के 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के विचार पर भी आधारित है।
राम मंदिर में दिखेगी उत्तर-दक्षिण,पूरब-पश्चिम भारत की छाप
मतलब, राम मंदिर बन तो उत्तर भारत में रहा है, लिहाजा पूरे उत्तर भारत की छाप उसपर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन, इसमें दक्षिण भारत की उत्कृष्टता भी इसके कण-कण में उकेरी जा रही है।
इसी तरह से गुजरात के प्रसिद्ध मंदिर-वास्तुकार सोमपुरा परिवार ने इसकी डिजाइन तैयार की है, जो उत्तर भारतीय नागर शैली को जीवंत कर रहा है।
वैसे, इस शैली में चारदीवारी या परिसर वाले प्रवेश द्वार नहीं होते। लेकिन, अयोध्या में 40 फीट चौड़े और दो स्तरीय परकोटा या दीवार का निर्माण हो रहा है, जो वास्तुकला की द्रविड़ शैली की पहचान है। यह परकोटा मुख्य मंदिर को चारों ओर से घेरेगा।
परकोटा के चारों कोने पर सूर्य, शंकर, भगत और गणपति का मंदिर भी बन रहा है। राम मंदिर प्रोजेक्ट से जुड़े चार में से एक इंजीनियर गिरीश सहस्त्र बुद्धे के मुताबिक 'ये द्रविड़ वास्तुकला का एक नमूना है, जिसे नागर शैली के भीतर भी शामिल किया गया है।'
पीएम मोदी की पहल पर हो रहे हैं काशी-तमिल संगम
अगर बीजेपी और खासकर पीएम मोदी के नजरिए से देखें तो राम मंदिर के निर्माण में जिस तरह से विभिन्न भारतीय वास्तुकला और कलाकारी का समायोजन किया जा रहा है, यह उनके उत्तर और दक्षिण भारतीय संस्कृतियों की समानता और उसके एकीकरण पर जोर देने से भी जुड़ा हुआ है।
दक्षिण भारतीय राज्यों में बीजेपी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पिछले वर्षों में काशी-तमिल संगम जैसे कार्यक्रम भी आयोजित हो चुके हैं, जिसे खुद प्रधानमंत्री मोदी संबोधित कर चुके हैं।
हैदराबाद की कंपनी बना रही है राम मंदिर के सारे द्वार
अयोध्या के राम मंदिर में दक्षिण भारत का प्रभाव कदम-कदम पर नजर आने वाला है। इसके लिए लकड़ी के जो भव्य द्वार बन रहे हैं, उसकी जिम्मेदारी हैदराबाद की एक नामी कंपनी ने संभाल रखी है।
पहले चरण में अनुराधा टिंबर नाम की करीब 100 साल पुरानी कंपनी 118 द्वार बना रही है, जिसमें कुछ पर सोने की प्लेटें भी चढ़ाई जा रही हैं।
हैदराबाद की यह कंपनी इससे पहले दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों तिरूपति, यदाद्रि और रामेश्वरम मंदिरों के लिए भी काम कर चुकी है। अयोध्या राम मंदिर के लिए यह कंपनी सबसे अच्छी गुणवत्ता वाली सागवान की लकड़ी से पारंपरिक तरीके से दरवाजों का निर्माण कर रही है, जो 1000 वर्ष से भी ज्यादा समय तक टिकाऊ रहने के लक्ष्य के साथ तैयार किया जा रहा है।
प्राचीन भारत की सामाजिक-समरसता की भी झलक दिखेगी
पीएम मोदी और उनकी सरकार सामाजिक सामंजस्य और समरसता की नीति को बढ़ाने की बात करती आ रही है। हाल के विधानसभा चुनावों में पार्टी को इसका लाभ भी मिला है। आदिवासी और दलित वोट बैंक जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की ओर शिफ्ट होने लगे हैं, वह अपने-आप में अप्रत्याशित है।
अयोध्या राम मंदिर के निर्माण में भी सनातन धर्म में अति-प्राचीन काल से मौजूद सामाजिक-समरसता को वास्तुकला के माध्यम से पेश करने का प्रयास किया जा रहा है।
रामायण में भगवान राम से जुड़े जितने संतों, ऋषि-मुनियों या देवियों का वर्णन आया है, जो किसी न किसी रूप में भगवान से जुड़े थे, सबके लिए विशेष ऋषि दरबार और खास मंदिरों का निर्माण किया जा रहा है। इस तरह के सात मंदिर बनाए जा रहे हैं।
इसमें ऋषि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, दक्षिण भारत के पूज्य संत अगस्त्य मुनि, केवट निषादराज, बुजुर्ग आदिवासी तपस्वी शबरी और देवी अहिल्या का नाम शामिल है।
भगवान राम के भव्य मंदिर का उद्घाटन अपनी जगह है और इसके माध्यम से 70-एकड़ के परिसर में जिस तरह से प्राचीन भारत-वर्ष को समेटने की कोशिश की जा रही है, उसके राजतनीतिक मायने भी उतने ही महत्वपूर्ण लग रहे है।
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