August Kranti Day: 'क्वीट इंडिया' का नारा देने वाला वो गुमनाम नायक, जिसकी आवाज ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया
August Kranti Day: 9 अगस्त 1942 को जब पूरा देश "भारत छोड़ो" की गूंज में डूबा हुआ था, तब एक नाम मौन लेकिन मज़बूती से हर दिल में दर्ज हो चुका था - यूसुफ मेहर अली। वही क्रांतिकारी, जिसने न केवल आजादी की लड़ाई को दिशा दी बल्कि अपने बुलंद नारों से देश को एकजुट कर दिया।
देश की आजादी की लड़ाई में अगर दो नारे इतिहास के पन्नों में अमर हो गए, तो वो थे - 'साइमन गो बैक' (1928) और 'भारत छोड़ो' (1942)। और दिलचस्प बात ये है कि इन दोनों नारों का जन्म यूसुफ मेहर अली की कलम से हुआ।

महज 25 साल की उम्र में जब साइमन कमीशन भारत पहुंचा और उसके विरोध में यूसुफ ने "साइमन गो बैक" का नारा दिया, तब कोई नहीं जानता था कि यही युवा आगे चलकर भारत छोड़ो आंदोलन का सूत्रधार बनेगा।
एक क्रांतिकारी का जन्म
3 सितंबर 1903, मुंबई के एक समृद्ध व्यापारी परिवार में जन्मे यूसुफ मेहर अली के पिता उन्हें बिजनेस में देखना चाहते थे। लेकिन यूसुफ के खून में बह रही थी क्रांति की चिंगारी। नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के भाषणों ने उनमें वो जोश भरा कि वे सीधे स्वतंत्रता संग्राम की आग में कूद पड़े। 10वीं क्लास तक आते-आते उन्होंने खुद को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ढालना शुरू कर दिया था। गरीबों और मजदूरों के अधिकारों के लिए उन्होंने आवाज उठाई और समाजवादी विचारधारा की ओर झुकाव बढ़ता गया।
1925 में उन्होंने यूथ यंग इंडिया सोसायटी बनाई। इसका उद्देश्य था - युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए तैयार करना। यहीं से यूसुफ का करिश्माई नेतृत्व उभरकर सामने आया। फिर आया बॉम्बे यूथ लीग, और इसके तहत ट्रेड यूनियनों को सशक्त किया। कारखानों की हड़तालों और मजदूर आंदोलनों ने यूसुफ को जन-जन का नेता बना दिया।
August Kranti Day: यूसुफ की कलम से निकला "भारत छोड़ो" का नारा
1942 में जब कांग्रेस स्वतंत्रता संग्राम को निर्णायक रूप देने की तैयारी कर रही थी, तब एक सटीक नारे की तलाश हो रही थी। जी. गोपालस्वामी ने अपनी किताब "Gandhi and Bombay" में लिखा है कि गांधीजी के सामने कई नारे रखे गए - किसी ने कहा "गेट आउट", किसी ने "विदड्रॉ" और "रिट्रीट" की बात की। लेकिन गांधी को कोई नारा नहीं जंचा।
तभी यूसुफ मेहर अली ने उन्हें एक धनुष भेंट किया, जिस पर लिखा था - "Quit India"। गांधी ने मुस्कुराते हुए कहा, "आमीन!" और इसी के साथ इस नारे ने पूरे भारत में स्वतंत्रता की ललकार गूंजा दी। यही अगस्त क्रांति का मुख्य सूत्र बन गया।
कुली के भेष में 'साइमन गो बैक' की शुरुआत
1928, मुंबई का बंदरगाह। साइमन कमीशन जैसे ही भारत की भूमि पर उतरा, सामने खड़े थे कुछ कुली। लेकिन ये कोई आम कुली नहीं थे, ये थे यूसुफ मेहर अली और उनके साथी। जैसे ही अंग्रेज सामने आए, उन्होंने काली तख्तियां उठाईं और आंखों में आंख डालकर कहा - "साइमन गो बैक!"
अंग्रेजी पुलिस ने उन पर लाठियां बरसाईं। खून बहा, गिरफ्तारी हुई। लेकिन तब तक ये नारा पूरे देश में गूंज चुका था। युवाओं का यह मूलमंत्र बन गया। यह पहला मौका था जब देश की जनता ने किसी विदेशी आयोग को खुली चुनौती दी थी।
यूसुफ मेहर अली कुल 8 बार जेल गए
1934 में जब वे जेल से छूटे, तब उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। उनका साथ मिला आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं का। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया - न्यूयॉर्क विश्व युवा कांग्रेस और मेक्सिको सांस्कृतिक सम्मेलन जैसे आयोजनों में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी सुनाई।
जेल से लौटने के बाद उन्होंने "Leaders of India" नाम से किताबों की एक श्रृंखला निकाली, जो बाद में कई भाषाओं में अनूदित हुई। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन पर भी एक पुस्तक लिखी, जिसके कारण उन्हें फिर से जेल जाना पड़ा।
1942 में बॉम्बे के मेयर का चुनाव लड़ा - जेल में रहते हुए, और जीते भी। गांधी, पटेल जैसे नेताओं का उन्हें समर्थन मिला। भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के दिन भी यूसुफ गिरफ्तारी के बावजूद अपने साथियों को सशक्त बनाने में जुटे रहे। राम मनोहर लोहिया, अरुणा आसफ़ अली जैसे नेता उनके नेतृत्व में आगे आए।
एक नाम, जो आज भी गूंजता है
2 जुलाई 1950 को दिल का दौरा पड़ने से यूसुफ का निधन हो गया। मात्र 47 साल की उम्र में उन्होंने जो किया, वह भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उनकी अंतिम यात्रा में पूरा बॉम्बे ठहर गया था - स्कूल, कॉलेज, फैक्ट्रियां, ट्रामें, बसें - सब कुछ रुका हुआ था। यह उस शख्स के लिए श्रद्धांजलि थी, जिसने देश के लिए जीया और आखिर तक लड़ता रहा। यूसुफ मेहर अली एक ऐसा नाम हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे तेजस्वी और विचारशील नेताओं में गिने जाते हैं।
आज अगर हम "भारत छोड़ो" और "साइमन गो बैक" जैसे नारों को गर्व से याद करते हैं, तो वो यूसुफ मेहर अली जैसे नायकों की वजह से है, जिनकी बुलंद आवाज़ों ने भारत को जगाया। अगस्त क्रांति के अवसर पर यूसुफ मेहर अली को याद करना, हमारे इतिहास की उस आत्मा को सलाम करना है, जिसने भारत को आज़ादी की ओर अग्रसर किया।
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