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नज़रिया: विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पर हमला कर रहे हैं सरकार में बैठे लोग

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    नज़रिया: विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पर हमला कर रहे हैं सरकार में बैठे लोग

    17 अगस्त, 2018 को आरबीआई के अंशकालिक निदेशक एस गुरुमूर्ति ने ट्वीट किया था, "सुप्रीम कोर्ट के जजों को देखना चाहिए कि केस (भारी बारिश के कारण केरल में आई बाढ़) और जो सबरीमाला में हुआ, उसके बीच कोई संबंध है या नहीं. अगर कोई संबंध होने का लाखों में एक चांस भी है तो लोगों को अयप्पन के ख़िलाफ़ फ़ैसला पसंद नहीं आएगा."

    https://twitter.com/sgurumurthy/status/1030494470377156608

    सोशल मीडिया पर अपने इस ट्वीट का विरोध होने के बाद उन्होंने अपने ट्वीट का बचाव करते हुए फिर से अपनी बात दोहराई थी.

    दुर्भाग्य से उनका ट्वीट समाज के एक ऐसे वर्ग का एक और उदाहरण है जो धर्म और धर्म ग्रंथों की ताकत को विज्ञान और संविधान में दी गई अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी से ऊपर मानता है.

    भारतीय संविधान के मुताबिक़ 'वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मानवता और सवाल व सुधार की भावना का विकास करना' हर नागरिक का दायित्व है. लेकिन, देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने बयानों और कामों के जरिए इस सिद्धांत का उल्लंघन कर रहे हैं. ऐसा करना न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि देश के लिए नुक़सानदेह भी है.

    वैज्ञानिक प्रवृत्ति रखना प्रयोगशाला में विज्ञान संबंधी प्रयोग करने जैसा नहीं है. हालांकि, प्रयोगशाला में होने वाले प्रयोग भी बहुत महत्वपूर्ण हैं और इन पर ही ध्यान सीमित करने से अच्छा शोध हो सकता है लेकिन विज्ञान और समाज में वैज्ञानिक पद्धति के सार को नहीं समझा जा सकता.

    'वैज्ञानिक प्रवृति' की अवधारणा के दो अहम पहलू हैं-

    1. समाज कल्याण के संपूर्ण विकास में विज्ञान का महत्व

    2. आधुनिक सामाजिक मूल्यों के विकास के लिए सामाजिक प्रक्रिया के तौर पर विज्ञान का अभ्यास

    विज्ञान और जीवन में सुधार

    इस बात पर बहुत कम संदेह है कि वैज्ञानिक और तकनीकी विकास में लोगों के जीवन में सुधार की असाधारण क्षमता है. जैसे कि जीवन प्रत्याशा बढ़ाना और हमारी अपनी ही भौतिक दुनिया को समझने में मदद के लिए ब्रह्मांड से जुड़े सवालों के जवाब देना ताकि उनका मानव जाति के फायदे के लिए अधिकतम इस्तेमाल किया जा सके. विज्ञान ने समाज के विकास के लिए भरपूर संभावनाओं के दरवाज़े खोल दिए हैं.

    मानव जाति को मुश्किलों भरी और अंधेरी ज़िंदगी से निकालने में विज्ञान की ज़बरदस्त क्षमता को नकारा नहीं जा सकता है. वहीं, एक समाज के लिए तकनीक और मशीनरी के विकास के साथ अपनी उत्पादक क्षमताओं को बढ़ाने और स्थिरता बनाए रखने के लिए आधुनिक कानूनों और मूल्यों के साथ चलना जरूरी है.

    एक तकनीकी रूप से विकसित समाज पुराने सामाजिक संबंधों में लोगों को बांधने वाले पुरातन कानूनों के साथ नहीं चल सकता. ऐसे में जो समाज अभी पूरी तरह से नहीं बदला है उसकी उत्पादक क्षमताओं के विकास पर लगातार ख़तरा बना रहता है.

    कई दार्शनिक मतभेदों और दृष्टिकोणों के बावजूद वैज्ञानिक पद्धति सामाजिक परिवर्तन को बल देती है. उदाहरण के लिए धार्मिक ग्रंथों में समर्थित लैंगिक और जातीय भेदभाव को बदलते समाज में विरोध का सामना करना पड़ता है और सवाल उठाना सामाजिक विवेक का महत्वपूर्ण पहलू बन जाता है. इसलिए वैज्ञानिक प्रवृत्ति की अवधारणा मानवता, समानता, अधिकार और न्याय की आधुनिक अवधारणाओं से जुड़ी हुई है.

    क्या किया जाना चाहिए

    वैज्ञानिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देना किसी भी देश का प्रमुख दायित्व है. इसके लिए विभिन्न मोर्चों पर काम करने की जरूरत है. इसमें सबसे पहले सरकारी फ़ंड से प्राथमिक और उच्च शिक्षा का विस्तार करना है जिससे न कि सिर्फ़ अमीरों को बल्कि समाज के सभी वर्गों को गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल सके.

    इसमें विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षिण पर ध्यान केंद्रित करना भी शामिल है जिससे प्राकृतिक, भौतिक और सामाजिक दुनिया की आलोचनात्मक समझ को बढ़ावा मिल सके.

    देश में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए जिनसे लोगों में सवाल उठाने की क्षमता और अलोचनात्मक विवेक पैदा हो सके.

    इसमें लोगों को यौन स्वास्थ्य की शिक्षा देने वाले, जाति और धर्म से बाहर शादी को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं. साथ ही ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दें जो समानता और भाईचारे के आधुनिक मूल्यों को बढ़ावा देते हों और आधुनिक, लोकतांत्रिक और समावेशी सांस्कृतिक माहौल के विकास को संभव बनाते हों.

    लेकिन, दुख की बात ये है कि मौजूदा स्थितियां इशारा करती हैं कि हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं.

    उच्च शिक्षा के लिए फ़ंड घटाने, पंचगव्य जैसे छद्म-वैज्ञानिक कार्यों पर फ़ंड लगाने और सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की बयानबाज़ी विज्ञान और वैज्ञानिक प्रवृत्ति पर हमला करने से कम नहीं है.

    हो सकता है कि ये थोड़े समय के लिए संकुचित हितों का पोषण कर दें लेकिन लंबे समय में इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं.

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    BBC Hindi
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    English summary
    Attitudes people sitting in the government are attacking science and scientific thinking

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