नज़रिया: अगर कबीर होते तो क्या उनकी आलोचना सुन पाती भाजपा सरकार

संत कबीर पिछले 500 सालों से भारतीय जन-मानस में अपनी अद्वितीय जगह बनाए हुए हैं.

कारण ये है कि कबीर प्रेम के प्रस्थान से समाज के सामने, व्यक्ति के सामने और ख़ुद अपने सामने सवाल खड़े करते हैं.

उनका कहना है, 'पिंजर प्रेम प्रकास्या, अंतिर भया उजास, मुख कस्तूरी महमही, बानी फूटी बास.'

कबीर की प्रसिद्ध सामाजिक आलोचना का मूल तत्व यही है कि भगवान के सामने ही नहीं, रोज़मर्रा के सामाजिक व्यवहार में भी सभी को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए.

इस अर्थ में कबीर सचमुच आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना के बहुत निकट पड़ने वाले कवि हैं.

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कबीर के विचारों का महत्व

इसके साथ ही कबीर मनुष्य की आंतरिक समृद्धि, उसकी आध्यात्मिक यात्रा के भी कवि हैं. उनकी चेतना में सामाजिक और आध्यात्मिक परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं - 'भीतर बाहर सबद निरंतर…'

इसीलिए ये स्वागत योग्य है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कबीर के प्रति सम्मान प्रकट करें और कबीर अकादमी का शिलान्यास करें. साथ ही सरकार कबीर के विचारों को महत्व दे.

लेकिन क्या प्रधानमंत्री जी की मगहर (पूर्वी उत्तर प्रदेश) यात्रा के पीछे यही सोच है?

ये सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि क्या ये ज़रूरी है कि कबीर सरीखे सर्वमान्य संत की जयंती को भी राजनैतिक भाषणबाज़ी के अवसर में बदल दिया जाए?

ज़ाहिर है कि भाजपा के लिए कबीर की कविता और संवेदना से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी प्रतीकात्मकता और विभिन्न सामाजिक तबकों के बीच इस प्रतीकात्मकता के राजनैतिक उपयोग की संभावना.


भाजपा-विरोधियों का दुष्प्रचार

इस लिहाज़ से, कबीर जयंती के दिन मगहर से चुनाव अभियान की शुरुआत करना निश्चय ही राजनैतिक चतुराई का प्रमाण है. ये देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस चतुर पहल का कितना फ़ायदा उठा सकती है.

लेकिन बात केवल चुनाव की नहीं, देश के माहौल और मिज़ाज की है. और इस लिहाज से ये महत्वपूर्ण है कि मगहर में प्रधानमंत्री जी ने कहा, 'कुछ लोग देश में माहौल ख़राब होने का भ्रम फैला रहे हैं.'

सचमुच? क्या यह वाक़ई भाजपा-विरोधियों का दुष्प्रचार मात्र है? मोदीजी की बात प्रमाणिक लगती यदि उन्होंने भीड़ द्वारा की जा रही हत्याओं पर कड़ी कार्रवाई की होती.

वे ट्विटर पर उनको फ़ॉलो न कर रहे होते, जो और तो और देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बारे में अभद्र बातें कर रहे हैं. समाज में दिनोंदिन हिंसा को स्वीकृति प्राप्त हो रही है. पीएम और उनकी पार्टी के आलोचकों को देशद्रोही कहा जा रहा है.

कबीर भी देशद्रोही होते!

सरकार के नीतिगत निर्णयों की प्रामाणिकता संदेह के घेरे में है. याद करें, हम आज तक नहीं जानते कि नोटबंदी के बाद कितने के नोट रिजर्व बैंक में पहुँचे.

अपनी कमियों का सामना करने के नैतिक साहस के बजाय सरकार हर कमी का ठीकरा पचास साल पहले गुजर चुके प्रथम प्रधानमंत्री के सिर फोड़ रही है.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, समाचार के बजाय प्रचार बल्कि चिल्लाहट के माध्यम में बदल चुका है. सरकार और बड़े लोगों से जुड़ी ख़बरें गायब हो जाती हैं.

'बुद्धिजीवी' शब्द को तिरस्कार सूचक गाली में बदला जा चुका है. आर्थिक से लेकर विदेश नीति तक के हलके में सवाल दर सवाल हैं, और सवाल पूछने वाले देशद्रोही कहे जाने को अभिशप्त हैं.

कबीर किसी भी मान्यता या लोक-व्यवहार को विवेक की कसौटी पर कसते थे. इस कसौटी के कारण चाहे पंडित हों, चाहे मौलाना, कबीर की आलोचना से कोई नहीं बचा.

आज कबीर होते तो राजनेता, अफ़सर, प्रोफ़ेसर, बुद्धिजीवी, पत्रकार भी कबीर के विवेक के सवालों से नहीं बचते. और ऐसे में कुछ लोगों को कबीर भी देशद्रोही (एंटी-नेशनल) ही नज़र आते.


कबीर की सलाह

कबीर के समय में न तो टेलीविजन था और न ही व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी. यानि सच या झूठ, अच्छी या बुरी बात के फैलने की रफ़्तार जितनी आज है, उससे कई गुना कम थी.

ये भी हम सब जानते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते. लेकिन ये भूल जाते हैं कि झूठ के पैर नहीं पर होते हैं, जब तक सच जूतों के तस्मे बाँध रहा होता है, तब तक झूठ वर्ल्ड टुअर कर चुका होता है.

कबीर अपने ढंग से इस विडंबना को पहचानते थे - 'साधो, देखो जग बौराना, सांच कहूँ तो मारन धावै, झूठै जग पतियाना.'

इसलिए आज के ज़माने में और भी जरूरी है कि हर बात को विवेक की कसौटी पर कसा जाए. हर दावे को तथ्यों पर परखा जाए. और इस सारे क्रम में सारे विवाद में नफ़रत की राजनीति, हिंसा और आक्रामकता को लगातार ख़ारिज किया जाये.

प्रधानमंत्री जी के लिए हो न हो, आम लोगों के लिए कबीर की सलाह बहुत उपयोगी है - 'संतो, जागत नींद न कीजै.'

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