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3 राज्यों के चुनाव में खाता नहीं खोल सके वामदल, UP में 6 दल थे साथ

यूं तो देश मेंं कईयों की जुबां पर वामदलों का नाम रहता है लेकिन जब बात वोट देने की आती है तो लोग इनसे किनारा कस लेते हैं।

नई दिल्ली। एक समय था जब उत्तर प्रदेश समेत देश के तमाम इलाकों में वामदल दमदार माने जाते थे लेकिन हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में आए परिणाम के बाद वोट शेयर देख कर ऐसा लगता है कि अब ये सिर्फ गुजरे कल की कहानी रह गए हैं।

3 राज्यों के चुनाव में खात नहीं खोल सके वामदल, UP में 6 दल थे साथ

बात उत्तर प्रदेश में आए परिणामों की करें तो यहां सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (एमएल) और फॉरवर्ड ब्लॉक समेत छह वामदलों ने इस बार मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। 105 उम्मीदवारों की घोषणा भी की गई थी। इस गठबंधन ने प्रदेश इलाहाबाद, वाराणसी, बस्ती, जौनपुर, गोरखपुर, कानपुर समेत कई बड़े इलाकों मे अपने विधानसभा प्रत्याशी उतारे थे।

लेकिन परिणाम घोषित के बाद जो तस्वीरें सामने आई, उससे बिल्कुल नहीं लगा कि ये वही दल है जिसके कभी 81 विधायक यूपी में जीतते थे। इस चुनाव में भी वाम दल का एक भी प्रत्याशी नहीं जीता। पूरे यूपी में वामदलों के इस गठबंधन को कुल 0.2% फीसदी मत ही मिला। पूरे प्रदेश में करीब 105 वामदल के प्रत्याशियों को सिर्फ 1,38,763 मत ही मिले जो नोटा से भी कम है। प्रदेश में नोटा के हिस्से 7,57,643 मत आए।

इलाहाबाद के सोरांव से प्रत्याशी फूल चंद्र को जहां सिर्फ 932 मत मिले वहीं फतेहपुर से गया प्रसाद को 2, 013 वोट। वाराणसी के दक्षिणी सीट से प्रत्याशी अमान अख्तर को 407 वोट मिले तो बस्ती से के.के. तिवारी को 1,327 वोट। जानकार की मानें तो यूपी में वामदलों की हालत ऐसी इसलिए हो गई क्योंकि प्रदेश में कई फैक्ट्रियां बंद हो गईं। जिसके चलते ट्रेड यूनियन आंदोलन कमजोर पड़ा और फिर इनके पास कोई कारगर मुद्दा नहीं रहा।

साल 1969 में 81 सीट जीतने वाले वामदल जब तीसरी बड़ी ताकत बने थे तो ऐसा लगा था कि ये आगे और उभरेंगे लेकिन अगले चुनाव यानी साल 1974 के चुनाव में इन्हें सिर्फ 18 सीटें मिली। इसके बाद धीरे-धीरे हालत खराब हुई और अब हालत ये हैं कि बीते 3 चुनावों से उनका खाता तक नहीं खुला।

इस बार सभी प्रत्याशियों को 10-15 मत हासिल करने के का लक्ष्य दिया था। इन संगठनों का दावा था कि बीते सालों में जमीनी स्तर पर काम हुआ और बूथ स्तर पर जनता के लिए भी काम किया गया। कुछ ऐसा ही मणिपुर में हुआ। यहां खैर वामदलों के गठबंधन को 0.7 फीसदी यानी 12,251 वोट मिले और पंजाब में भी 0.2% यानी 34,074 वोट मिले।

जानकारों का मानना है कि वामदल खुद को जाति आधारित राजनीति के सांचे में नहीं ढाल पाए ऐसे में वो लोगों की नजरों और विधानसभाओं से दूर होते चले गए। यूपी में CPI-ML, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक, सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया,CPI और CPI M ने एक गठबंधन बना कर साथ लड़ रहे थे।

2012 के विधानसभा चुनाव में CPI 51 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसे कुल मत का 0.13% वोट मिला था। वहीं सीपीएम, जिसने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था उन्हें 0.09 फीसदी वोट मिले थे।

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