बिहार पर बड़ा दांव: कौन जीतेगा और किसकी होगी हार?
पटना(मुकुंद सिंह )। बिहार विधानसभा के चुनाव का कार्यक्रम घोषित होने के बाद आरंभिक चुनाव सर्वेक्षणों से नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन के लिए आशाजनक संकेत उभरे। वोट प्रतिशत और सीट दोनों के अनुमान में उन्हें आगे बताया गया।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि सर्वे एजेंसियों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में विभिन्न पार्टियों को मिले मत प्रतिशत को आधार मानते हुए अपने अनुमान लगाएतब नीतीश-लालू-कांग्रेस का साझा वोट प्रतिशत भाजपा से खासा ऊंचा था।
नीतीश-लालू vs नरेन्द्र मोदी
दरअसल, उसी कारण दो दशक की सियासी दुश्मनी भुला कर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने हाथ मिलाया। अगले चुनाव में यही जाहिर होना है कि क्या वोटों के गणित और सामाजिक समीकरणों के आधार पर बने गठबंधन सचमुच कारगर होते हैं। ऐसा हुआ, तो फिर महागठबंधन का रास्ता साफ है। लेकिन पुराना अनुभव यह है कि हर चुनाव नया चुनाव होता है। वह नई परिस्थितियों और नए समीकरणों के बीच लड़ा जाता है।
मोदी लहर का होगा असर?
मई 2014 में देश का राजनीतिक संदर्भ बिंदु बदल गया। बिहार के चुनाव में साफ यह होना है कि नरेंद्र मोदी लहर से तब हुआ वह बदलाव कितना टिकाऊ है। इसीलिए 12, 16, 28 अक्टूबर और एक तथा पांच नवंबर को विधानसभा की 243 सीटों पर बिहार के 6.68 करोड़ मतदाता न सिर्फ अपने लिए नई सरकार चुनने के लिए वोट डालेंगे, बल्कि उनका फैसला देश के राजनीतिक वातावरण को मापने का पैमाना भी बनेगा। महागठबंधन जीता, तो उससे भाजपा विरोधी तमाम ताकतों को संजीवनी मिलेगी।
केजरीवाल की जीत ने रचा था इतिहास
पिछले फरवरी में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की जीत ने राजनीतिक चर्चा का रुख जिस तरफ मोड़ा, उसे उस दिशा में और गति मिलेगी। लेकिन भाजपा गठबंधन जीता, तो सिद्ध होगा कि मोदी लहर फिलहाल टिकाऊ राजनीतिक परिघटना है, जिसका तोड़ उनके विरोधियों के पास नहीं है। दोनों ही स्थितियों में बिहार के परिणाम के प्रभाव अगले साल पश्चिम बंगाल और असम से लेकर केरल और उसके बाद पंजाब से उत्तर प्रदेश तक में महसूस किए जाएंगे।
बिहार का चुनाव देश में नया चैप्टर लिखेंगे
फिलहाल, दोनों खेमों के सामने खास चुनौतियां हैं। महागठबंधन के सामने मोदी विरोधी वोटों का बंटवारा रोकने तथा अपने वोट एक दूसरे को ट्रांसफर करने की कठिन चुनौती है, तो भाजपा के सामने भी अपने सहयोगी दलों में सीटों के संतोषजनक बंटवारे तथा उनमें एकजुटता बनाए रखने की समस्या है।
हर पार्टी की शाख दांव पर
गठबंधनों के भीतर तालमेल और समान उद्देश्य भावना कांटे की इस टक्कर में संभवतः बड़ा निर्णायक पहलू साबित होंगे। निर्णय क्या हुआ, यह 8 नवंबर को जाहिर होगा, जब वोटिंग मशीनें खुलेंगी।













Click it and Unblock the Notifications