'हिंदी कई भाषाओं को निगल गई है', तमिलनाडु CM स्‍टालिन के आरोप पर अश्विनी वैष्‍णव ने दिया जबाव, जानें क्‍या कहा

Language Row: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की एक पोस्‍ट के बाद भाषा विवाद को लेकर देश भर की राजनीति गरमा गई है। स्‍टालिन के आरोप कि हिंदी कई भाषाओं को निगल गई है' इस पर केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्‍णव ने प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करते हुए पलटवार किया है।

वैष्णव ने तमिलनाडु सीएम स्टालिन के उत्तर प्रदेश और बिहार को "हिंदी हार्टलैंड" कहने और हिंदी को कई क्षेत्रीय भाषाओं पर हावी होने का आरोप का जवाब देते हुए कहा "स्‍टालिन समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश करने का आरोप लगाया और इसके साथ ही कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के रुख के बारे में पूछा है।

MK Stalin

बता दें केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति के तहत राज्‍यों में तीन भाषा को लागू किए जाने का तमिलनाडु की स्‍टालिन सरकार विरोध कर रही है और दो भाषा को लागू करेन पर अड़ी हुई है। इतना ही नहीं सीएम एमके स्टालिन ने एक पूर्व पोस्ट शेयर की जिसमें उन्‍होंने आरोप लगाया कि "हिंदी ने कई क्षेत्रीय भाषाओं को निगल लिया है। इसके कारण कई भाषाएं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। हिंदी के प्रभुत्व के कारण भोजपुरी, मैथिली और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का क्षरण हुआ है।"

केंद्रीय मंत्री वैष्‍णव ने किया पलटवार

सोशल मीडिया पर वैष्णव ने स्‍टालिन की पोस्‍ट को टैग करते हुए जवाब देते हुए लिखा "समाज को बांटने की ऐसी छिछली कोशिशों से खराब शासन व्यवस्था कभी छिप नहीं सकेगी। यह जानना दिलचस्प होगा कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी क्या कहते हैं, इस विषय पर उनका क्‍या कहना है। क्या वह एक हिंदी भाषी सीट के सांसद के रूप में सहमत हैं?

CM स्‍टालिन ने अपनी पोस्‍ट में क्‍या लिखा?

बता दें सीएम स्‍टानिल ने अपनी पोस्‍ट में लिखा हैं कि "अन्य राज्यों के मेरे प्यारे बहनों और भाइयों, क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदी ने कितनी भारतीय भाषाओं को निगल लिया है? भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही, मारवाड़ी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, हो, खरिया, खोरठा, कुरमाली, कुरुख, मुंडारी और कई अन्य अब अस्तित्व के लिए हांफ रहे हैं। एक अखंड हिंदी पहचान के लिए प्रयास ही प्राचीन मातृभाषाओं को नष्ट करता है। यूपी और बिहार कभी भी सिर्फ "हिंदी हार्टलैंड" नहीं थे। उनकी वास्तविक भाषाएं अब अतीत के अवशेष हैं।

स्टालिन ने भाषा नीति की आलोचना

गौरतलब है कि केंद्र सरकार की भाषा नीतियों, विशेष रूप से राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को लेकर आशंका है, जिसे कुछ लोग क्षेत्रीय भाषाओं की कीमत पर हिंदी और संस्कृत को थोपने के साधन के रूप में देख रहे हैं। स्टालिन ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को लिखे एक पत्र में हिंदी को थोपे जाने का आरोप लगाते हुए विरोध किया और उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रचार के पीछे संस्कृत छिपी हुई है। उन्होंने तर्क दिया कि हिंदी और संस्कृत के वर्चस्वपूर्ण प्रसार से कई उत्तर भारतीय भाषाएं हाशिए पर चली गई हैं।

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