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दिल्ली फतह के बाद फिर दिल्ली छोड़ने की तैयारी में केजरीवाल...बिहार में करेंगे दो-दो हाथ!

बेंगलुरू। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में एक बार फिर आम आदमी पार्टी (AAP)54.34 फीसदी वोट पाकर सत्ता में वापसी करने में सफल रही है। वोट फीसदी के लिहाज से देखा जाए तो आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन पिछले विधानसभा के प्रदर्शन के आसपास है, जो कि वर्ष 2015 विधानसभा चुनाव में 53.57 फीसदी थी।

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    अब बड़ा सवाल यह है कि लगातार दो बार दिल्ली में रिकॉर्ड जीत दर्ज कर चुके आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल दिल्ली में टिकेंगे या पिछली बार की तरह एक बार केजरीवाल दिल्ली को मनीष सिसोदिया के हवाले छोड़कर पूरे भारत में पार्टी के विस्तार में जुट जाएंगे। कम से कम खबर दिल्ली की जनता के लिए अच्छी नहीं है।

    क्योंकि दिल्ली फतह के बाद एक बाऱ फिर केजरीवाल दिल्ली छोड़कर आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में दो-दो हाथ करने का मूड बना रहे हैं। हालांकि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अगर ऐसा एक बार फिर होता है तो कांग्रेस और दिल्ली की जनता दोनों से केजरीवाल को और मौका नहीं मिलेगा।

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    यह सवाल इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में केजरीवाल ने साढ़े चार साल साम्राज्य विस्तार में लगाए और थक हारकर तब दिल्ली लौटे थे जब लोकसभा चुनाव 2019 में दिल्ली में भी पार्टी की लुटिया डूब गई। बीजेपी ने 2019 लोकसभा चुनाव में दिल्ली के सभी सातों लोकसभा सीटों पर रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी और अगर उसी समय दिल्ली के विधानसभा चुनाव हो जाते तो दिल्ली से केजरीवाल को डेरा भी उठना तय था।

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    यह इसलिए क्योंकि केजरीवाल के वोट शेयर में वृद्धि की वजह है कांग्रेस। कांग्रेस लोकसभा चुनाव 2019 में जोरदार तरीके से लड़ी थी, भले ही कांग्रेस दिल्ली में सीट जीतने में नाकामयाब रही, लेकिन ज्यादातर सीटों पर बीजेपी के बाद दूसरे नंबर पर रही। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट फीसदी जहां 22 फीसदी था, वहीं आम आदमी पार्टी 18 फीसदी पर सिमट गई थी।

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    यह बात केजरीवाल अभी अच्छी तरह जानते हैं कि अगर दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस जोर लगाकर चुनाव में उतरती तो आम आदमी पार्टी का पत्ता वर्ष 2015 ही नहीं, 2020 विधानसभा चुनाव में भी साफ हो सकता था। इसकी बानगी लोकसभा चुनाव ही नहीं, दिल्ली नगर निगम चुनाव और दिल्ली में हुए उप चुनाव में भी मिलते है।

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    दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस जोरदार तरीके लड़ी थी, जिससे निगम चुनाव (एसीडी और एनडीएमसी) में उसके वोट शेयर 22 फीसदी पहुंच गए और निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी पूरी तरह से साफ हो गई। कमोबेश यही हाल दिल्ली में हुई उप चुनाव में भी केजरीवाल एंड पार्टी के साथ हुआ और सरकार में रहते हुए भी केजरीवाल की स्थिति दयनीय हो गई थी।

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    कहने का अर्थ है कि कांग्रेस जानबूझकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में चुनाव हार रही है ताकि बीजेपी को सत्ता से दूर रखा जा सके और ऐसा मालूम होता है कि यह बात केजरीवाल एंड पार्टी भी अच्छी तरह से जानते हैं, क्योंकि कांग्रेस जब भी दिल्ली में जोरदार तरीके से लड़ी है उसको दिल्ली में 22-24 फीसदी वोट मिला है।

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    यह दिल्ली नगर निगम, दिल्ली उप चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों में देखा जा सकता है, जहां कांग्रेस के वोट शेयर 22 फीसदी रहे। कांग्रेस के वोट शेयर बढ़ते ही केजरीवाल एंड पार्टी का दम फूलने लगता है। विधानसभा चुनाव 2015 में कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए न बराबर मेहनत की और नतीजा केजरीवाल 70 में से 67 सीट जीतने में कामयाब हुए थे।

    बीजेपी को नुकसान पहुंचाने के लिए के लिए दिल्ली में नहीं लड़ी कांग्रेस

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    वर्ष 2015 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 8 फीसदी वोट हासिल किया था और जीरो पर आउट हुई थी। कमोबेश यही ट्रेंड दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में भी देखने को मिला, जहां कांग्रेस ने न नेता तैयार किए थे और चुनावी कैंपेन में कोई दिलचस्पी ही दिखाई और दिल्ली चुनाव पूर्व दिल्ली सीएम दिवंगत शीला दीक्षित के नाम पर लड़ने का ऐलान किया। यह सब कांग्रेस ने बीजेपी को नुकसान पहुंचाने के लिए किया, जिसका नतीजा रहा कि इस चुनाव में कांग्रेस को वोट देने वालों की संख्या पिछली बार से कम हो गई और कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर 4.34 पहुंच गया, जिसका फायदा पूरी तरह से केजरीवाल भी नहीं उठा सके।

    कांग्रेस फाइट करती तो AAP के सीटों की संख्या घटकर 10 रह जाती

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    दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस के पक्ष से कम हुए 3.64 फीसदी वोट बीजेपी के खाते में गए, जिससे इस चुनाव में बीजेपी को वोट शेयर पिछले दो विधानसभा चुनावों से अधिक यानी 38.46 पहुंच गया जबकि पिछले दोनों विधानसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर क्रमशः वर्ष 2013 में 32 फीसदी और 2015 में 31 फीसदी था। फर्ज कीजिए अगर कांग्रेस जोरदार तरीके से चुनाव लड़ती और 22-24 फीसदी वोट शेयर हासिल कर लेती तो केजरीवाल के सीटों की संख्या घटकर 10 पर पहुंचना तय था। यह इसलिए क्योंकि कांग्रेस के महज 3.64 फीसदी वोट से बीजेपी की सीटों की संख्या 3 से बढ़कर 8 हो गई। अगर कांग्रेस 24 फीसदी वोट हासिल करती तो बीजेपी की सीटों में 8 गुनी वृद्धि तय थी। यानी बीजेपी के सीटों की संख्या 45-50 सीटों होती।

    केजरीवाल ने 70 वादों में से केवल 20 फीसदी वादे ही जमीन पर पूरे किए

    केजरीवाल ने 70 वादों में से केवल 20 फीसदी वादे ही जमीन पर पूरे किए

    आंकड़े कहते हैं कि केजरीवाल के नेतृत्व में वर्ष 2015 में बनी आम आदमी पार्टी की सरकार ने किए 70 वादों में से केवल 20 फीसदी वादे ही वास्तविक धरातल पर पूरे किए हैं। बात चाहे सीसीटीवी की हो, या फ्री वाई फाई की। हर जगह केजरीवाल की ओर से खानापूर्ति की गई है, क्योंकि केजरीवाल दिल्ली छोड़कर पूरे देश में चुनाव लड़ रहे थे और दिल्ली मनीष सिसोदिया के भरोसे छोड़ गए थे, लेकिन अगर इस बार भी केजरीवाल साम्राज्य विस्तार में जुटते हैं तो अगले चुनाव में इसका खामियाजा पूरी पार्टी का उठाना तय माना जा रहा है, क्योकि 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अगर बेहतर स्थिति में आती है तो 2025 में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में जोरशोर से चुनाव लड़ेगी और फिर मौजूदा ढर्रे वाली आम आदमी पार्टी की स्थिति काटो तो खून नहीं वाली हो जाएगी।

    जनादेश का सम्मान करते हुए दिल्ली में अपना डेरा जमाएं केजरीवाल

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    इसलिए जरूरी है कि अब केजरीवाल दिल्ली की जनता से मिले दोबारा जनादेश का सम्मान करते हुए दिल्ली में अपना डेरा जमाएं और अगर साम्राज्य विस्तार करना ही है तो मनीष सिसोदिया जैसे दूसरे पंक्ति के नेताओं को सरकार से निकालकर संगठन में लगाए। निः संदेह देश को एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है और केंद्र में जैसी हालत कांग्रेस की अभी दिख रही है, उस लिहाज से आम आदमी पार्टी एक बेहतर विकल्प हो सकती है, लेकिन उसके लिए आम आदमी पार्टी को धरातल पर काम करना होगा। आने वाले कुछ दिनों मे आम आदमी पार्टी के क्रिया कलापों से तय हो जाएगा कि केजरीवाल अपनी गलतियों से कुछ सीखते हैं या नहीं।

    2013 में 49 दिनों में इस्तीफा देकर PM मोदी को टक्कर दे चुके हैं केजरीवाल

    2013 में 49 दिनों में इस्तीफा देकर PM मोदी को टक्कर दे चुके हैं केजरीवाल

    2013 में दिल्ली में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने वाले अरविंद केजरीवाल ने महज 49 दिनों में इस्तीफा देकर प्रधानमंत्री कैंडीडेट नरेंद्र मोदी को टक्कर देने के लिए वाराणसी से चुनाव लड़ने पहुंच गए थे, क्योंकि उनको मुगालता हो गया था कि दिल्ली का सीएम बनने के बाद अब प्रधानमंत्री बनने का तुक्का भी उनका फिट हो जाएगा। लोकसभा चुनाव 2014 में बड़े बेआबरू होकर केजरीवाल वाराणसी से हारकर लौटे तो तब भी उनके पांव जमीन पर नहीं आए। केजरीवाल एंड पार्टी कई छोटे-बड़े राज्यों में अपनी किस्मत आजमाई, इनमें गोवा, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश शामिल है, लेकिन पंजाब को छोड़कर हर जगह पार्टी को मुंह खानी पड़ी।

    लोकसभा चुनाव 2019 में आम आदमी पार्टी चारो खाने चित्त हो गई AAP

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    2015 विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत के मुख्यमंत्री केजरीवाल साढ़े चार साल बाद दिल्ली की ओर तब देखा जब लोकसभा चुनाव 2019 में आम आदमी पार्टी चारो खाने चित्त हो गई। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 60 फीसदी से अधिक वोट दिल्ली में हासिल हुए थे और केजरीवाल की पार्टी 18 फीसदी वोटों के साथ कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर पहुंच गई थी। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले और बाद में पूरे देश में चुनाव लड़कर और जमानत जब्त करवाकर दिल्ली लौटे केजरीवाल को आभास हो चुका है किअगर अब नहीं चेते तो दिल्ली भी हाथ से चली जाएगी।

    दिल्ली चुनाव से छ महीने पर केजरीवाल ने लिया वामन अवतार

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    यही वजह थी कि जून 2019 ने दिसंबर 2019 तक के अंतराल में केजरीवाल ने वर्ष 2015 में किए 70 वादों को पूरा करने की कोशिश में जुट गए। केजरीवाल महिलाओं के फ्री बस सेवा जैसे लोक लुभावन घोषणाओं के जरिए दिल्ली की जनता को बेवकूफ बनाने की कोशिश की। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोटिंग वर्ष 2015 विधानसभा चुनाव में दिल्ली में केजरीवाल द्वारा शुरू बोए मोहल्ला क्लीनिक, 200 यूनिट फ्री बिजली और 20000 लीटर फ्री पानी के बीजों से तैयार छायादार वृक्ष की वजह से हुई है। केजरीवाल की दोबारा रिकॉर्ड जीत में केवल कांग्रेस का लचर प्रदर्शन रहा वरना बीजेपी पिछली दोनों विधानसभाओं में सत्ता तक पहुंचने लायक सीट जीतने में कामयाब हो जाती।

    70 में 67 सीट देने वाली दिल्ली को केजरीवाल से सिर्फ सब्जबाग मिला

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    क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में आम आदमी पार्टी को रिकॉर्ड 70 में 67 सीट देकर सत्ता में पहुंचाने वाली दिल्ली को केजरीवाल से सब्जबाग के अलावा कुछ नहीं मिला है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पूरे साढ़े चार साल दिल्ली को लेकर गंभीर नहीं दिखे थे। केजरीवाल ने उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के हवाले दिल्ली को छोड़कर पूरे भारत में चुनाव जीतने निकले थे। यही कारण था कि दिल्ली में केजरीवाल किए 70 वादों की पोल खोलते हुए शाह ने केजरीवाल के मेनिफिस्टों में किए वादे का हश्र दिखाकर वोट मांग रहे थे।

    पुराने और नए वादों को पूरा करने के लिए दिल्ली में मेहनत करें केजरीवाल

    पुराने और नए वादों को पूरा करने के लिए दिल्ली में मेहनत करें केजरीवाल

    वर्ष 2015 केजरीवाल कांग्रेस की अनिच्छा और बीजेपी की निगेटिव कैंपेन के चलते सहानुभूति वोट पाकर जीतने में सफल हुई थी, लेकिन इस बार केजरीवाल को दिल्ली के 70 विधानसभा सीटों में से 62 सीटों पर आम आदमी पार्टी जीत दर्शाती है कि अगर कांग्रेस पूरा जोर लगाती तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की हालत एक जैसी होती और बीजेपी विजेता की तरह सामने आती। इसलिए केजरीवाल को चाहिए कि दिल्ली की जनता के जनादेश का सम्मान करते हुए दिल्ली में टिके और दिल्ली से किए पुराने और नए वादों को पूरा करने के लिए मेहनत करें। वरना कहते हैं न कि बकरी की अम्मा कब तक खैर मनाएगी। कहने का मतलब कांग्रेस हमेशा मददगार नहीं करेगी।

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