जब मदर टेरेसा से मिले केजरीवाल, उनके अनुभव उन्हीं की जुबानी
नई दिल्ली। परमार्थ के कार्यों से 20वीं सदी में मानवीय जगत और ईसाई समुदाय में काफी ऊंचा मुकाम हासिल करने वाली मदर टेरेसा को 4 सितंबर को संत की उपाधि दी जाएगी।

मदर टेरेसा को संत की उपाधि
वेटिकन सिटी में आयोजित इस खास कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी वहां पहुंचा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वेटिकन सिटी पहुंचे हैं।
अरविंद केजरीवाल मदर टेरेसा को बहुत मानते थे। उन्होंने मदर टेरेसा को याद करते हुए एक लेख आउटलुक पत्रिका में लिखा था। पेश है उसी लेख के कुछ अंश।
जब मदर टेरेसा से मिले अरविंद केजरीवाल
यह नवंबर 1992 था। मैं उस समय टाटा स्टील में काम कर रहा था, इससे एक साल पहले मैंने सिविल सेवा परीक्षा में हिस्सा लिया था और मुझे भारतीय रेवेन्यू सेवा के चुन लिया गया था।
मैं अपना रैंक सुधारने के इरादे से एक बार फिर परीक्षा की तैयारी कर रहा था। नवंबर में ही मैंने अपनी मुख्य परीक्षा को भी पूरा कर लिया। मेरे पास आईआरएस में जाने का विकल्प मौजूद था, लेकिन मेरा मन कुछ और करने का था।
मैंने सामाजिक कार्य करना चाहता था। इसलिए मैं टाटा स्टील मैनेजमेंट में चला गया और उनसे अपील की कि मुझे सोशल वेलफेयर विभाग में स्थानांतरित कर दिया जाए। उन्होंने मेरी अपील को अस्वीकार कर दिया, उन्होंने मुझसे कहा कि हमने आपको इंजीनियर के तौर पर नियुक्त किया है और चाहते हैं कि आप इंजीनियरिंग ही करें।
टाटा स्टील से केजरीवाल ने दिया इस्तीफा
इसके बाद मैंने अपनी इच्छा के लिए टाटा स्टील से इस्तीफा दे दिया और मदर टेरेसा से मिलने कोलकाता चला गया। ये सुबह का समय था और वहां लंबी कतारें लगी हुई थी। वह सभी लोगों से कुछ सेकेंड के लिए मिल रही थी।
जैसे ही मेरा नंबर आया उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और पूछा तुम क्या चाहते हो? मैंने मदर से कहा कि मां, मैं आपके साथ काम करना चाहता हूं।
उन्होंने मुझसे कलिघाट आश्रम जाने की बात कही। ये मिशनरीज ऑफ चैरिटी के अहम केंद्रों में से एक था। उन्होंने मुझसे वहां जाकर काम करने के लिए कहा।
उस समय कोलकाता ऐसा स्थान था जहां दोनों तरह के लोग मिल जाते थे, जिसमें कुछ तो बहुत गरीब थे, वहीं कुछ बहुत अमीर। फिलहाल वहां अभी के हालात मुझे नहीं पता हैं।
कोलकाता में मदर टेरेसा से मिले केजरीवाल
उन दिनों अगर फुटपाथ पर आप पैदल चलिए तो भिखारियों की बड़ी संख्या आपको नजर आ जाती थी। उनमें से कुछ की हालत बेहद खराब थी।
मुझे काम दिया गया कि मैं शहर में घूमकर गरीब, असहाय, बेबस लोगों को कलिघाट आश्रम ले जाऊं और उनकी सेवा करूं, मैंने ऐसा ही किया।
इन लोगों की हालत बेहद खराब थी। कई लोग शारीरिक रुप से अक्षम थे मैंने उनकी सेवा की। उनके कपड़े साफ किए, उनके लिए खाना बनाया और खिलाने में भी मदद की।
कलिघाट आश्रम में किया काम
मदर टेरेसा ने हमसे कहा कि इन लोगों को कभी जीवन की गरिमा का अनुभव नहीं हुआ है। उनके मुताबिक भगवान की इससे अच्छी पूजा नहीं हो सकती कि हम अपने सेवा से उन्हें मरने से पहले एक बार जीवन की गरिमा का अहसास करा सकें।
उन लोगों में कई कि हालत बेहद खराब थी। एक वालंटियर ने तो एक बार एक मृत शख्स के सिर को अपनी गोद में रखा और उसे प्यार से सहलाया। जिससे उसे मानवीय प्यार का अहसास हो सके। मुझे इस खास पल का गवाह बनने का अनुभव मिला।
जब मैंने मदर टेरेसा से किया सवाल
एक बार मैंने मदर से पूछा कि आप जरूरतमंद लोगों को सेवा मुहैया कराती हैं, आखिर आप उन्हें ठीक होने के बाद आत्मनिर्भर बनाने पर विचार क्यों नहीं करती हैं?
इस पर उन्होंने कहा कि ये काम सरकार और दूसरे एनजीओ का है। उनका काम जरूरतमंदों की सेवा करना है। ये पूरा अनुभव मेरे लिए आध्यात्मिक था। मैं वहां कुछ महीने तक रहा।
इसके बाद मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। मैं खुश था कि मैं वहां रहा और बेहद खास काम में अपना सहयोग दिया। इस दौरान मैं कई बार मदर से मिला और सभी मुलाकातें आध्यात्मिक अनुभव जैसा रहा। वह एक महान आत्मा थी।
गरीबों और असहायों की सेवा का मिला मौका
मुझे अभी भी आश्रम में बिताए समय याद आते हैं। मैं सुबह की शिफ्ट में था। मैं सुबह 6 बजे पहुंच जाता था। मेरा पहला काम मरीजों के लिए खाना बनाना था। इसके बाद इसे उन तक पहुंचाना था।
इस दौरान उनके कपड़े धुलने और सफाई की जिम्मेदारी भी मेरी ही थी। फिर मैं दोपहर का खाना बनाता था। दोपहर दो बजे लंच की व्यवस्था होती थी।
वहां वॉलंटियर्स की बड़ी खेप आती-जाती थी। कुछ दो या तीन दिल के लिए आते थे तो कई एक हफ्ते के लिए। वहां किसी को कोई दक्षता की जरूरत वॉलंटियर बनने के लिए नहीं थी, बस आइये पर शामिल हो जाइए।
रामकृष्ण मिशन में भी किया था काम
मदर टेरेसा के साथ काम करने के बाद एकेडमी ज्वाइन करने से पहले मैं कुछ महीने रामकृष्ण मिशन में भी काम किया। रामकृष्ण मिशन में काम बिल्कुल अलग था।
यहां मैं गांवों में जाता और लोगो को अल्कोहल की बुराइयों से अवगत कराता था। उन दिनों मैं अपने एक दोस्त विक्रम भार्गव के साथ रहता था। वह टाटा स्टील में काम करता था। वह लखनऊ से था।
मैं आईआईटी खड़गपुर से था और विक्रम बीआईटी रांची से था। खड़गपुर के दिनों में मैंने नहीं सोचा था कि कभी मदर टेरेसा के पास जाऊंगा।
आईआईटी से निकलने के बाद आमतौर पर लोग विदेश जाते हैं। मेरे भी कई दोस्त विदेश चले गए। सिविल सर्विस चुने जाने के बाद मुझे लगा कि मुझे देश सेवा के लिए चुना गया है। देश सेवा का अवसर मुझे मिला है।
नागपुर में भी आश्रम में जाने का मिला मौका
जब मैं नागपुर में नेशनल एकेडमी ऑफ डायरेक्ट टैक्स की ट्रेनिंग के लिए पहुंचा, जहां आईआरएस ट्रेनियों को भेजा जाता है, वहां मुझे मदर टेरेसा का आश्रम एकेडमी के बिल्कुल पास ही मिल गया।
एकेडमी में ही मेरी सुनीता (पत्नी) से मुलाकात हुई। हम अकसर सप्ताह के आखिर में आश्रम जाते थे। नागपुर का आश्रम बिल्कुल अलग था। यहां कलिघाट आश्रम की तरह वॉलंटियर नहीं बल्कि नन्स होती थी जो सेवा कार्य करती थी।
इसलिए यहां हमारे लिए ज्यादा कुछ करने के लिए नहीं था। दिल्ली में एक आश्रम मजनूं का टीला के पास है। मुझे वहां एक या दो बार जाने का मौका मिल पाया। सिविल लाइन्स में भी एक आश्रम बच्चों के लिए है। मैं वहां कई बार जा चुका हूं।












Click it and Unblock the Notifications