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दिल्ली मेट्रो के नाम एक यायावर की चिट्ठी, आशा है ये महंगा सफर सुरक्षित और सुहाना होगा

By राहुल सांकृत्यायन
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    प्रिय दिल्ली मेट्रो,

    मेरा तुम्हारा परिचय बहुत पुराना है। उतना ही जब मेरे बाबा जी, किसी काम से दिल्ली आते थे और तुम्हारे किस्से घर के सभी बच्चों को सुनाते थे। उतना ही पुराना जितना ब्लू लाइन बस का किस्सा है। बाबा जी, ब्लू लाइन के बस के किस्से भी सुनाते थे। भीड़, जेब कटना और तमाम सारी बातें। जब तुम्हारा जिक्र होता था, तो जहन में सबसे पहली बात ये आती थी कि आखिर वो कौन सी ट्रेन है जो ज्यादातर जमीन के अंदर सुरंग में ही चलती है। ऐसा नहीं है कि मैंने दिल्ली मेट्रो से पहले ट्रेनों के किस्से नहीं सुने थे,लेकिन तुम्हारा किस्सा खास था। तुमसे पहली मुलाकात साल 2013 की 31 मई को हुई थी, जब मैं दिल्ली की एक शादी में शामिल होने आया था। उस वक्त पहला सफर राजीव चौक से जंगपुरा का किया था। तब किराया कितना लगता था, इस बारे में जानकारी नहीं थी क्योंकि टिकट बाबा जी ने खरीदा था। 

    दिल्ली मेट्रो के नाम एक यायावर की चिट्ठी, आशा है ये महंगा सफर सुरक्षित और सुहाना होगा

    साल 2014 की पहली अगस्त को मैं स्थायी तौर पर दिल्ली में आ गया। उसके बाद तो मानों तुमसे रिश्ता ही जुड़ गया।पहले अधिकतर सफर येलो लाइन का होता था। नौकरी लगी तो जिंदगी ब्लू लाइन की होकर रह गई। जिस तरह इंद्रधनुष के सात रंग होते हैं, ठीक उसी तरह तुमने भी पूरी दिल्ली को अपने सात रंगों में बांध रखा है। रेड, येलो, ब्लू, वायलेट, ग्रे, ग्रीन और पिंक। अभी तुम्हारी कुछ लाइनें बन रही हैं और कुछ पूरी तरह से चल रही है। खैर, लोगों की जिंदगी में दूरी कम कर के रंग भरने का जो काम तुम्हारे रंग कर रहे हैं या भविष्य में करेंगे, वो सबको याद आएंगे। कोई कल को दिल्ली छोड़ कर चला भी गया तो उसे राजीव चौक, मंडी हाउस, समेत तमाम मेट्रो स्टेशन के किस्से याद होंगे, जहां कभी किसी का प्यार जवां हुआ होगा तो कभी किसी ने अपनी नौकरी की पहली मेट्रो पकड़ी होगी।

    मेरा जब तुमसे रिश्ता बना तो मैं स्मार्ट कार्ड वाला हो गया क्योंकि रोज-रोज टोकन की लाइन में लगना हम व्यस्त शहरियों की आदत में नहीं है। रिश्ता बनने के कई महीने बाद ये पता चला की स्मार्ट कार्ड धारक को कुल किराए में से 10 फीसदी की छूट दी जाती है। टोकन वालों को पूरा किराया देना होता है। तब समझ आया कि हां! स्मार्ट होने के भी अपने फायदे हैं। कार्ड में महीने के 1,000 रुपए भराता था और जब पढ़ाई वाले दिन थे तो 2-3 महीने उसी में गुजर जाते थे। नौकरी वाले दिन आए तो 1,000 रुपए महीने लगने लगे क्योंकि रोज आना जाना होता है। एक दिन यूं ही तुम्हारी चर्चा चलने लगी तो किसी ने अप्रैल की तपती दुपहरी में बताया कि दिल्ली मेट्रो का किराया बढ़ने वाला है। तन बदन में मानों एक सनसनी सी दौड़ गई कि अब कितना खर्च होगा?

    खैर, इसी साल मई में तुम्हारा किराया बढ़ा तो इस बात का संतोष था कि चलो 7-8 साल बाद किराया बढ़ा है, ठीक है। मेट्रो की भी अपनी जरूरतें हैं। लोगों की तनख्वाह देनी होती है। बढ़ती महंगाई का असर सिर्फ जिंदा मशीनों पर ही नहीं होता बल्कि मुर्दा मशीनों पर भी होता है ये उसी रोज पता चला। फिर मैं भी आदी हो गया। 13 रुपए की जगह कभी 16 तो कभी 18 रुपए मेरे कार्ड से कटने लगे। सफर अपनी तय दूरी से ज्यादा लंबा होता था, तो किराया 45 से 50 रुपए तक कटने लगा। ठीक है। इतने बड़े शहर में इतना लंबा सफर , आदमी कम ही करता, अगर रोज आना जाना ना हो तो।

    मई में बढ़े किराए का बोझ मन पूरी तरह से संभाल चुका था। मेरा पर्स भी। लेकिन फिर अचानक से सितंबर में बहस छिड़ गई कि मेट्रो का किराया बढ़ने वाला है। ये निहायत ही झटके भरी खबर थी मेरे लिए। लेकिन दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, जो भले अपना वोटबैंक बचाने के चक्कर में ही सही, 6 महीने के भीतर ही दोबारा किराया बढ़ाए जाने के खिलाफ खड़े थे। तो कुछ उम्मीद थी कि किराया नहीं बढ़ेगा। लेकिन होनी को कौन टाल पाया है? केजरीवाल भी नहीं टाल पाए। और आखिरकार आज से तुम्हारा किराया बढ़ ही गया। पता नहीं मेरी मेट्रो खुश है या नहीं लेकिन वो लोग जरूर दुखी हैं, जो पहले 5 से 12 किलोमीटर का 18 या 20 रुपए अदा करते थे। अब सीधा 30 रुपए अदा करेंगे, इसमें मैं भी शामिल हूं।

    मेरी प्यारी मेट्रो, जब तुम्हारा किराया बढ़ने की बात शुरू होने से खत्म हो जाने तक पहुंच गई तो पता चला कि तुम पर तो 50-50 की पार्टनरशिप है। आधा केंद्र सरकार की। बाकी आधा दिल्ली सरकार की। केजरीवाल ने विरोध कर वोट बैंक की आड़ में अपना धर्म पूरा किया। केंद्र सरकार ने किराया बढ़ाकर राष्ट्रहित की त्योरियां और चढ़ा दीं। अब तुम भी कुछ दिन मीडिया में बनी रहोगी। उम्मीद है कि इस किराए का उपयोग बीते दिनों रिलायंस से हारे हुए एक केस का हर्जाना भर कर ना करते हुए सरकार जनता के हित में लगाएगी। मेट्रो स्टेशनों पर सुविधाएं बढ़ेंगी। तुम्हारे फेरे भी बढ़ेंगे और उन मेट्रो कर्मचारियों का ध्यान भी रखा जाएगा, जो बीते दिनों काली पट्टी बांध कर काम कर रहे थे। इसी आशा में अब विदा लेता हूं।

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    अक्षरधाम से नोएडा सेक्टर 16 तक का यात्री

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    English summary
    an open letter to delhi metro, dmrc, on fare hike

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