अदानी पर आरोपः क्या कर सकते हैं आरबीआई या सेबी?

गौतम अडानी
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कुछ दिन पहले तक भारत के सबसे अमीर कारोबारी रहे गौतम अदानी के वित्तीय साम्राज्य में इन दिनों उथल-पुथल मची है.

अदानी समूह की कंपनियों का मार्केट कैप लगभग 220 अरब डॉलर था, लेकिन 25 जनवरी को अमेरिकी रिसर्च कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च की एक सनसनीखेज रिपोर्ट सामने आने के बाद से अदानी समूह के शेयर लगातार गिर रहे हैं.

अदानी समूह ने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को खारिज किया है और इसे कंपनी को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश बताया है.

413 पन्नों के अपने जवाब में अदानी समूह ने कहा है कि झूठ से भरी ये रिपोर्ट भारत पर हमला है.

अदानी समूह ने ये भी कहा है कि वह हमेशा से ही भारतीय क़ानूनों का पालन करता रहा है और उसने कुछ भी ग़लत नहीं किया है.

बाज़ार में उथल-पुथल के मद्देनज़र अदानी समूह ने अपना 2.5 अरब डॉलर का एफ़पीओ पूरी तरह बिकने के बावजूद वापस ले लिया है.

इसे भी कंपनी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है.

अदानी ने अब बॉन्ड की बिक्री रोकी

द मिंट और इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ अदानी समूह ने अपनी पहली बॉन्ड बिक्री के ज़रिए 10 अरब रुपए जुटाने की योजना को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

दुनिया के तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति रहे गौतम अदानी भी अब शीर्ष 20 अमीरों की सूची से बाहर हो गए हैं.

वहीं समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत के कार्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने अदानी समूह के वित्तीय लेन-देन और अन्य नियामकों के सामने प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ों की प्रारंभिक जाँच शुरू की है. रॉयटर्स ने ये जानकारी सूत्रों के हवाले से दी है.

भारत के केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने भी बैंकों के अदानी समूह को दिए क़र्ज़ के बारे में जानकारी मांगी है.

भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई ने अदानी समूह की कंपनियों को 27 हज़ार करोड़ रुपए का क़र्ज़ दिया है.

एसबीआई ने ये भी बताया है कि ये लोन अदानी के शेयरों के बदले में नहीं दिया गया है और लोन सुरक्षित है.

हमलावर हुआ विपक्ष

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भारत में विपक्ष भी अदानी समूह को घेर रहा है. शुक्रवार को संसद में विपक्षी दलों ने एकजुट होकर ये मुद्दा उठाया और अदानी समूह के वित्तीय लेनदेन की जाँच के लिए जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) गठित करने की मांग की.

इंफ्रास्ट्रक्चर, एयरपोर्ट, बंदरगाह, गैस और क्लीन इनर्जी से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं तक के क्षेत्र में काम कर रहे अदानी समूह का कारोबार अब सवालों के घेरे में है.

विपक्ष भारत में पंजीकृत कंपनियों की निगरानी करने वाली नियामक संस्था सेबी (सिक्यूरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया) पर भी सवाल उठा रहा है.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद जौहर सरकार ने कहा है कि अदानी समूह पर उठे सवालों के बाद सेबी की चेयरपर्सन को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

उन्होंने कहा कि इस बात की जाँच होनी चाहिए कि अदानी समूह पर की गई शिकायतों की जाँच क्यों नहीं की गई.

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वहीं टीएमसी के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा है कि अदानी समूह पर लगे आरोपों ने भारत के सत्ताधारी दल को मुश्किल में डाल दिया है.

इसी बीच भारत की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि अदानी समूह के आर्थिक संकट का भारत की प्रतिष्ठा पर कोई असर नहीं हुआ है.

निर्मला सीतारमण ने कहा कि बुधवार को अदानी समूह के 20 हज़ार करोड़ रुपए का एफ़पीओ वापस लेने का भारत के मैक्रोइकॉनॉमिक फंडामेंटल और प्रतिष्ठा पर कोई असर नहीं हुआ है.

निर्मला सीतारमण ने ये भी कहा है कि भारत के नियामक सरकार के दबाव से मुक्त हैं और बाज़ार को स्थिर और नियमित रखने के लिए जो भी ज़रूरी होगा वो करेंगे.

क्या कर सकते हैं सेबी और आरबीआई?

आरबीआई बैंकिंग ऑपरेशन को रेगुलेट कर सकता है. आरबीआई कर्ज़ के लेन-देन को रेगुलेट कर सकता है.

आरबीआई ने बैंकों से अदानी समूह को दिए क़र्ज़ के बारे में जानकारी मांगी है.

वित्तीय मामलों के जानकार मनोज कुमार कहते हैं, "आरबीआई क़र्ज़ की सिक्यूरिटी और दस्तावेज़ों की भी जाँच कर सकता है. आरबीआई ये जाँच कर सकता है कि कहीं क़र्ज़ देते वक़्त को कोई असामान्य फ़ायदा तो नहीं पहुँचाया गया है."

सिक्यूरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया यानी सेबी की भूमिका कैपिटल मार्केट की निगरानी है.

मनोज कुमार कहते हैं, "सेबी लिस्टेड कंपनी की डेब्ट सिक्यूरिटी और इक्विटी की निगरानी करता है. सेबी कंपनी के वित्तीय स्टेटमेंट में घोषित वित्तीय लेनदेन की जाँच कर सकता है. यानी सेबी कंपनी के दस्तावेज़ों की जाँच कर सकता है और अगर उसे ज़रूरत महसूस होती है, तो वो गहन जाँच के लिए फ़ारेंसिक इंवेस्टिगेटर नियुक्त कर सकता है. अगर निवेशकों की कोई शिकायत मिलती है और उसमें कुछ ठोस होता है तो सेबी उसकी भी जाँच कर सकता है."

सेबी ने भेजा ईमेल

यस बैंक
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सीएनबीसी के मुताबिक़, सेबी ने बीते शुक्रवार उन भारतीय बैंकों को ईमेल किया है जो विदेशी निवेशकों के भारत में निवेश करने के लिए पंजीकरण कराने की सुविधाएं देते हैं.

सेबी ने अपने ईमेल में बैंकों से कहा है कि उनकी डेज़िगनेटेड डिपॉज़टरी इकाइयां 30 सितंबर से पहले-पहले अपने विदेशी निवेशकों से संपर्क करें.

https://twitter.com/CNBCTV18News/status/1622444275136077826

डीडीपी से आशय बैंकों की उन इकाइयों से है जो भारत में विदेशी निवेशकों को भारत में धन निवेश करने में मदद करती हैं. इनका काम विदेशी निवेशकों का पंजीकरण आदि करना होता है.

सेबी ने बैंकों से कहा है कि वे अपनी इन इकाइयों से कहें कि वे विदेशी निवेशकों से संपर्क करके निवेशित धन के स्वामियों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराएं.

सेबी ने कहा है कि अगर उसके इस आदेश का 30 सितंबर तक पालन नहीं किया जाता है तो ये विदेशी निवेशक अपने पंजीकरण रद्द हो जाएगा. इसके बाद ऐसे विदेशी निवेशकों को 30 मार्च, 2024 तक अपने हिस्सेदारियों को बेचना होगा.

मनी कंट्रोल ने सेबी की ओर से उठाए गए इस कदम को लेकर कहा है कि ये कदम उठाने का समय बेहद अहम है. क्योंकि अमेरिकी फ़ॉरेंसिक फ़ाइनेंशियल कंपनी हिंडनबर्ग ने अदानी समूह पर आरोप लगाया है कि उसने अपनी लिस्टेड कंपनियों में निवेश करने वालों की असल पहचान छिपाई है.

विपक्ष ने की मांग

विपक्षी नेता
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विपक्ष ने मांग की है कि सेबी अदानी समूह के वित्तीय दस्तावेज़ों की जाँच करे.

हालाँकि अभी तक सेबी की तरफ़ से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि वह ऐसी कोई जाँच कर रहा है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ शनिवार को सेबी ने कहा, "वह बाज़ार के व्यवस्थित और कुशल कामकाज के लिए प्रतिबद्ध है और कुछ ख़ास शेयरों में अत्याधिक उतार-चढ़ाव के चलते निगरानी के क़दम उठाए गए हैं."

हालाँकि सेबी ने अदानी समूह का नाम नहीं लिया है.

मनोज कुमार कहते हैं, "सेबी ज़रूरत पड़ने पर समूह के सीएफ़ओ (मुख्य वित्त अधिकारी) और अन्य अधिकारियों के बयान भी दर्ज किए कर सकता है. ज़रूरत पड़ने पर सेबी लेन-देन बंद करने का या कुछ इकाइयों को प्रतिबंधित करने का आदेश भी दे सकता है. लेकिन ये सब जाँच पर निर्भर करता है. सेबी के पास जाँच करने के अधिकार हैं, लेकिन वो जाँच तब ही करेगा, जब उसे कुछ ग़लत नज़र आएगा."

सेबी के अभी तक दख़ल ना देने के सवाल पर वित्तीय मामलों के जानकार शरद कोहली कहते हैं, "सेबी मार्केट रेग्यूलेटर है. सेबी की ज़िम्मेदारी है कि जो कंपनी पंजीकृत हो रही हैं वो सही हैं, दस्तावेज़ों में कोई झोल नहीं है. स्टॉक मार्केट में अगर कहीं रिगिंग या धांधलेबाज़ी हो रही है और कुछ ऐसा नज़र आ रहा है जिनमें सेबी के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है तब सेबी दखल देता है. सेबी इसके अलावा दख़ल नहीं देता है."

हालाँकि नियामक किसी भी शेयर में अपर या लोवर सर्किट लगाकर उसे एक तय सीमा से नीचे गिरने या ऊपर चढ़ने से रोक सकते हैं.

मनोज कुमार कहते हैं, "सीधे तौर पर सेबी कुछ नहीं कर सकता है. लेकिन स्टॉक एक्सचेंज के पास तरीक़े होते हैं. वो शेयर पर अपर या लोवर सर्किट लगा सकते हैं यानी एक तय प्रतिशत की गिरावट या चढ़ाव के बाद शेयर की ख़रीद-फ़रोख़्त नहीं हो सकती है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में जो कंपनियाँ पंजीकृत हैं. सर्किट फ़िल्टर लगाकर उतार चढ़ाव को कुछ नियमित किया जा सकता है. या शेयर की ट्रेडिंग रोककर उसे और परिवर्तनशील होने से रोका जा सकता है."

शरद कोहली कहते हैं, "शेयर बाज़ार एक स्वतंत्र बाज़ार है, जहाँ मांग और आपूर्ति क़ीमतें तय करती हैं. किसी शेयर के बढ़ने या गिरने पर मार्केट रेग्यूलेटर की कोई भूमिका नहीं रहती है."

क्या सरकार कुछ करेगी?

अदानी समूह भारत का सबसे बड़ा कारोबारी समूह है. भारत के ढाँचागत विकास में अदानी समूह की भूमिका है.

ऐसे में बहुत से लोग ये मान रहे हैं कि अदानी समूह के कमज़ोर होने का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी हो सकता है.

सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या सरकार इस परिस्थिति में कुछ कर सकती है.

बाज़ार पर अदानी समूह को हुए नुक़सान का असर बताते हुए शरद कोहली कहते हैं, "अदानी समूह को जो नुक़सान हुआ है वो सिर्फ़ अदानी समूह का नहीं है. इसमें निवेशकों का नुक़सान हैं. बड़े संस्थागत निवेशकों का भी घाटा है और एलआईसी जिसने लगभग अपना एक प्रतिशत निवेश अदानी समूह में किया है उसको भी नुक़सान है. इसके अलावा छोटे निवेशक और शेयर ट्रेडर भी हैं जिन्हें नुक़सान हुआ होगा. विदेशी संस्थागत निवेशकों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का भी इसमें निवेश है. बाज़ार में निवेश जोख़िम के अधीन होता है, निवेश में करने वाले सभी लोगों को पता होता है कि इसमें जोख़िम है."

मनोज कुमार कहते हैं, "अदानी समूह एक निजी कंपनी है. ऐसे में भारत सरकार उसे सीधे तौर पर बचाने के लिए बहुत कुछ नहीं कर सकती है. सरकार अगर किसी को नाकाम होने से बचाना चाहती हो, तो कुछ क़दम उठा सकती है लेकिन क़ानूनन ऐसे प्रावधान नहीं है कि सरकार किसी निजी समूह को बचाने के लिए आगे आए."

हिंडनबर्ग एक अमेरिकी कंपनी हैं. ऐसे में अदानी या भारतीय नियामकों के पास भारत में उस पर कार्रवाई करने के विकल्प नहीं है.

भरोसा क़ायम करने की चुनौती

अडानी का बिलबोर्ड
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अडानी का बिलबोर्ड

शरद कोहली कहते हैं, "हिंडनबर्ग एक अमेरिका स्थित वित्तीय रिसर्च एजेंसी है. हमारे क़ानून उन पर लागू नहीं होते हैं, उस कंपनी पर क़ानूनी कार्रवाई भी अमेरिका में जाकर ही होगी. हिंडनबर्ग पर नेगेटिव प्रोपागेंडा फैलाने का आरोप लगाया जा सकता है. लेकिन भारतीय नियामकों का हिंडनबर्ग पर कोई नियंत्रण नहीं है. भारतीय नियामक उस पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते हैं."

उथल-पुथल के बीच सवाल ये भी उठ रहा है कि बाज़ार कब तक ठीक हो सकता है.

विश्लेषकों का मानना है हिडनबर्ग की रिपोर्ट में जो भी दावे पेश किए गए हैं, उन्हें लेकर बाज़ार में निश्चिंतता आनी चाहिए. ये भरोसा पैदा होना चाहिए कि समूह की आर्थिक सेहत ठीक है. अडानी समूह की सबसे बड़ी चुनौती फिर से भरोसा पैदा करना ही है.

मनोज कुमार कहते हैं, "बाज़ार को ये भरोसा मिलना चाहिए कि हिडनबर्ग रिपोर्ट में जो दावा किए हैं, उनसे बैंकों के क़र्ज़ या डिबेंचर्स पर असर नहीं होगा. जब बाज़ार को ये भरोसा हो जाएगा कि कंपनी के पास पर्याप्त कैश फ्लो है और क़र्ज़ डिफाल्ट नहीं होंगे तो फिर से अडानी समूह की स्थिति ठीक हो जाएगी. बाज़ार भरोसे पर चलता है, अगर अडानी समूह में बाज़ार का भरोसा बना रहता है तो जल्द ही हालात ठीक हो सकते हैं. आठ लाख करोड़ का क्रैश हुआ है, ये एक दो दिन या सप्ताह में ठीक नहीं होगा, इसमें समय लगेगा."

मनोज कुमार कहते हैं, "अगर बहुत कुछ छिपा हुआ नहीं है, कुछ फ़र्ज़ीवाड़ा नहीं हुआ है तो फिर से भरोसा पैदा हो सकता है."

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