Akshaya Tritiya 2022: इस शुभ दिन का ओडिशा में विशेष महत्त्व क्यों है ? जानिए

भुवनेश्वर, 3 मई: अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर पूरे देश में कोई बड़ा काम करना करने की धार्मिक मान्यता रही है। यह बड़ा काम कुछ भी सकारात्मक कार्य हो सकता है, जैसे कि शादी, सोना खरीदना या प्रॉपर्टी में निवेश करना। किसानों के लिए इसका अपना महत्त्व है और देश के कई क्षेत्रों में वे अपने कृषि उपकरणों का इस अवसर पर पूजा भी करते हैं और बोआई करके खेती की शुरुआत भी करते हैं। हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्हें विष्णु का छठा अवतार माना जाता है और वैष्णव मंदिरों में उनकी पूजा भी होती है।

अक्षय तृतीया और इससे जुड़ी धार्मिक परंपरा

अक्षय तृतीया और इससे जुड़ी धार्मिक परंपरा

अक्षय तृतीया ऐसा शुभ दिन है, जहां कुछ लोग इसे परशुराम जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं तो कई लोग विष्णु के वासुदेव अवतार के प्रति आस्था जताते हुए अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार अक्षय तृतीया को ही वेद व्यास ने गणेश जी को हिंदुओं के महाकाव्य महाभारत का पाठ सुनाना शुरू किया था। एक अन्य पौराणिक कथा ये भी है कि अक्षय तृतीया के दिन ही मां गंगा धरती पर अवतरित हुईं। लेकिन, ओडिशा में इस शुभ मुहूर्त का और भी महत्त्व है।

अक्षय तृतीया से ही आरंभ होता है रथों के निर्माण का कार्य

अक्षय तृतीया से ही आरंभ होता है रथों के निर्माण का कार्य

ओडिशा में अक्षय तृतीया के दिन से ही हिंदू पुरी के वार्षिक रथ यात्रा महोत्सव के लिए रथों के निर्माण का कार्य शुरू करते हैं। इसे 'गंधलेपन यात्रा' या चंदन यात्रा के नाम से भी जाना जाता है जो कि पुरी के भगवान जगन्नाथ मंदिर में मनाया जाने वाला सबसे लंबा त्योहार है। यह 42 दिनों तक चलता है, जो कि दो हिस्सों में मनाया जाता है- बाहर चंदन और भीतर चंदन। बाहर चंदन 21 दिनों तक चलता है, जो अक्षय तृतीया से ही शुरू होता है। जगन्नाथ मंदिर के मुख्य देवताओं की प्रतिनिधि प्रतिमाओं के साथ-साथ 'पंच पांडव' के रूप में जाने जाने वाले पांच शिवलिंगों को इस मंदिर के सिंघद्वार से नरेंद्र तीर्थ सरोवर तक एक अनुष्ठानिक यात्रा के रूप में ले जाया जाता है। विभिन्न अनुष्ठानों के बाद देवताओं को जगन्नाथ मंदिर के पास स्थित नरेंद्र सरोवर ले जाया जाता है और उन्हें भव्य तरीके से सजाए गए नावों पर रखा जाता है और शाम में उन्हें सरोवर की सैर कराई जाती है।

सोने की कुल्हाड़ी से शुरू होता है कार्य

सोने की कुल्हाड़ी से शुरू होता है कार्य

परंपरा के तहत मंदिर के सेवक रथ खला (रथ बनाने वाली जगह) में विशेष अनुष्ठान करते हैं और अंग्य माला (देवता के आदेश स्वरूप माला) लाकर उनसे आदेश लेते हैं और उन्हें लकड़ी के तीन टुकड़ों पर रख देते हैं। तीनों रथों को तैयार करने वाला मुख्य बढ़ई प्रतीकात्मक रूप से सोने की कुल्हाड़ी से लकड़ी के तीन कुंदों को छूता है, जिसके बाद वह लकड़ियों को आकार देना शुरू करता है। इन भव्य रथों को बनाने में लगभग 100 बढ़ई जुटेंगे, जिनमें भगवान जगन्नाथ के लिए 45 फीट ऊंचा नंदीघोष, 44 फीट ऊंचा तालध्वज बलभद्र जी और 43 फीट ऊंचा देबदलान सुभद्रा जी के लिए बनाया जाता है।

अक्षय तृतीया पर अन्य शुभ कार्य

अक्षय तृतीया पर अन्य शुभ कार्य

पूरे देश में अक्षय तृतीया पर उन प्रियजनों को स्मरण करने की भी परंपरा है, जो कि अब दुनिया में नहीं हैं। इस दिन देश के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएं अपने परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए मंगलकामना भी करती हैं। प्रार्थना के बाद ये महिलाएं अंकुरित अनाज, फल और मिठाई का वितरण भी करती हैं। इस अवसर पर उपवास रखना, कल्याण के कार्य करना और दूसरों की सहायता करना भी उन्हीं आस्था से जुड़ी परंपराओं में शामिल है।

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