'मुझे उसके साथ होना चाहिए था', एयर इंडिया क्रैश के बाद सदमे में ये 27 साल का लड़का, हालात जान डॉक्टर भी हैरान
Air India Crash: लंदन जा रही एयर इंडिया की फ्लाइट AI 171 के अहमदाबाद में हादसे के 11 दिन बीत जाने के बाद भी पीड़ित परिवार गहरे सदमे और दुख से जूझ रहे हैं। काउंसलर्स का कहना है कि कई परिवारों की प्रतिक्रियाएं इतनी असामान्य और असहाय हैं कि अब मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।
सबसे मार्मिक कहानी एक 27 वर्षीय युवक की है, जिसने अपनी पत्नी को खो दिया। 2024 में शादी के बंधन में बंधे इस कपल ने अभी जिंदगी शुरू ही की थी। युवक पहले ही लंदन चला गया था ताकि वहां नया घर बसा सके। उसकी पत्नी बाद में आने वाली थी। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। विमान हादसे की खबर मिलने के बाद वह खुद को बार-बार यही कहता रहा, "मुझे उसके साथ होना चाहिए था।"

'न ही वह रो पाया, न ही उसके आंसू निकले'
उसकी पत्नी ने आखिरी बातचीत में उसे कहा था कि वह देर न करे और लंदन के गैटविक एयरपोर्ट पर उसे इंतजार न करवाए। लेकिन जब उसे हादसे की खबर मिली, तो वह पहला फ्लाइट लेकर अहमदाबाद पहुंचा। तीन दिन तक वह अस्पताल परिसर में जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करता रहा और अपनी पत्नी के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए घर ले गया। लेकिन इन तमाम दिनों में वह एक बार भी रो नहीं सका। अहमदाबाद के सिविल अस्पताल की एक काउंसलर ने बताया कि "न ही वह रो पाया, न ही उसके आंसू निकले।''
7 वर्षीय बच्ची DNA सैंपल देने आई लेकिन नहीं पता है उसको सच्चाई
अस्पताल प्रबंधन ने पीड़ित परिवारों की मानसिक स्थिति को संभालने के लिए 10 अनुभवी मनोचिकित्सकों को नियुक्त किया है। इन्हीं में से एक, उर्विका पारिख ने एक 7 वर्षीय बच्ची की कहानी साझा की, जो डीएनए सैंपल देने अस्पताल आई थी, ताकि उसके परिजन की पहचान हो सके। "परिवार बच्ची को सच नहीं बता पा रहा था। वह मासूम थी, लेकिन सच्चाई बहुत भयानक थी।"
कई परिवारों ने अपने एक से अधिक सदस्यों को खो दिया है। कुछ लोग इतने टूट चुके हैं कि अपने घर तक लौट नहीं पा रहे। एक बुजुर्ग जिनके चार परिजन इस हादसे में चले गए, वह अपने घर की खामोशी को सह नहीं पाए और फिलहाल रिश्तेदार के यहां रह रहे हैं।
परिख ने बताया कि शोक के सात चरण होते हैं -झटका और इनकार, दर्द और अपराधबोध, गुस्सा और मोलभाव, अवसाद, थोड़ी राहत, पुनर्निर्माण, और स्वीकार्यता। लेकिन यह यात्रा हर किसी के लिए अलग और मुश्किल होती है।
काउंसलर, डॉ. दिशा बोलीं- बच्चे की मौत को नहीं सह पा रहे हैं माता-पिता
एक अन्य काउंसलर, डॉ. दिशा वसावड़ा का कहना है, ''बच्चे की मौत को सह पाना, माता-पिता की मौत से भी कठिन होता है। कई बार सदमे को समझने और स्वीकारने में हफ्तों लग जाते हैं।"
उन्होंने कहा कि काउंसलिंग टीम लगातार इन परिवारों के संपर्क में बनी रहेगी। कई परिजन शुरू में संयमित दिखे, लेकिन जब शव ताबूतों में उनके सामने आए, तब उनका सब्र टूट गया। शुरुआत के दिन तो बस औपचारिकताओं में निकल जाते हैं, लेकिन असली पीड़ा तब शुरू होती है जब सच्चाई सामने आती है।
मनोचिकित्सकों ने इस त्रासदी की तुलना कोविड काल की मौतों से की, जब परिजन अपने प्रियजनों को आखिरी बार देख भी नहीं पाए थे। ऐसा अधूरापन, एक अनकहा दर्द बनकर लंबे समय तक मन में बना रहता है।












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