अफगानिस्तान स्पेशल फोर्स का जवान दिल्ली में बेच रहा फ्रेंच फ्राइज, कहा-'ब्लैक लिस्ट में हूं, वह मार देंगे..'
अफगानिस्तान स्पेशल फोर्स का जवान दिल्ली में बेच रहा फ्रेंच फ्राइज, कहा- 'ब्लैक लिस्ट में हूं, वह मार देंगे...'
नई दिल्ली, 17 अगस्त: अफगानिस्तान 15 अगस्त के बाद लगभग सबकुछ बदल चुका है। रविवार (15 अगस्त) को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया है। अफगानियों के पास अब अपनी जान बचाने और सुरक्षित वहां से निकलने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। तालिबान से बचने के लिए लोग किसी भी तरह से अफगानिस्तान को छोड़ना चाहते हैं। 5 महीने पहले अफगानिस्तान स्पेशल फोर्स का जवान उमेद अपने देश को छोड़कर भारत भाग आए थे। उमेद अब दिल्ली में सड़क किनारे फ्रेंच फ्राइज बेचते हैं। उनका कहना है कि अगर वह अफगानिस्तान जाएंगे तो मार दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि वह तालिबान की ब्लैक लिस्ट में हैं।

लाजपत नगर में फ्रेंच फ्राइज बेच रहा है अफगान का जवान
नवभारत टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक उमेद दिल्ली के लाजपत नगर में फ्रेंच फ्राइज बेचते हैं और बड़ी मुश्किल से हर दिन का 300 रुपये कमा पाते हैं। उमेद ने कहा, उन्हें इस बात का बिल्कुल भी कोई आइडिया नहीं है कि उनके साथ अगले दिन या अगले पल क्या होने वाला है। उमेद ने कहा है कि भारत में रहना भी उनके लिए मुश्किल हो रहा है, वह अच्छा काम करना चाहते हैं, लेकिन कहां और कैसे करें, उन्हें नहीं पता है। उनका कहना है कि वह हिंदी बोलेन की कोशिश कर रहे हैं।
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'अफगानिस्तान लौट नहीं सकता, आगे का कुछ पता नहीं...'
उमेद ने कहा, मुझे अपने लोग, ''दोस्त और अपने देश अफगानिस्तान की बहुत याद आती है। लेकिन मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूं। जो दोस्त तालिबान के साथ लड़ाई में मारे गए, वो हमेशा याद आते हैं। मेरे माता-पिता तो बचपन में ही एक्सीडेंट में गुजर गए थे। मैं उस वक्त 2 या 3 साल को रहा हूंगा। मैं अपने देश अब लौट नहीं सकता है। भारत में कब तक और कैसे रहूंगा पता नहीं, फिलहाल रिफ्यूजी कार्ड पर हूं।''

'अफगानिस्तान गया तो तालिबान मार देंगे'
उमेद ने कहा, जब मैं अफगानिस्तान स्पेशल फोर्स में थे, देश के हर कोने-कोने में मेरी पोस्टिंग हुई होगी, तालिबान से लड़ता रहते थे हम, कईयों को तो हमने मार गिराए हैं, इसलिए आज मैं उनकी ब्लैक लिस्ट में हूं। हमारे मिशन के कई वीडियो तालिबान के पास हैं। मैं वहां जैसे ही जाऊंगा, मुझे पता है कि वो लोग मुझे फौरन मार देंगे। अगर मैं वहां से भागता नहीं तो, मेरे पास दो ही ऑप्शन ते या तो मर जाओ नहीं तो उनके फौज में चले जाओ।''

'अपनों को मरता देखना भी, मरना ही है...'
उमेद के पूरे शरीर पर कई जगह जख्म के निशान हैं। उमेद ने कहा, ''मुझे सिर्फ गोली नहीं लगी है, उसके अलावा कई बार चोटे लगी हैं, घायल हुआ हूं। लेकिन अपने दोस्तों को गोली खाता देख, उनको मरते देखा है मैंने। अपनों को मरता देखना भी मरना ही होता है। वहां के हालात खराब थे। सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही थी। तालिबान कब्जा करने की कोशिश में लगे हुए थे। मेरे पास वहां से भागकर भारत आने के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं था। इस दुनिया में राजनीति और आतंकवाद दोनों ही बहुत खतरनाक हैं।''

'भारत अच्छा है लेकिन एक अफगानी के लिए...'
उमेद के माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। पड़ोसियों ने उमेद को पालकर बड़ा किया है। उमेद ने बताया कि वह 18 साल की उम्र में फौज में शामिल हो गया था और बीते 10 साल उसके भागदौड़ और लड़ाई में चली गई है। उमेद का कहना है कि रिश्तेदारों में उसके एक चाचा हैं, लेकिन वह तालिबान के साथ हैं।
उमेद ने कहा, अफगानिस्तान में पैदा हुआ हूं, अपने देश की याद तो बहुच आती है लेकिन मजबूर हूं, वहां जा नहीं सकता। भारत अच्छा है लेकिन एक अफगानी के लिए यहां रहना मुश्किल भरा काम है। बार-बार पुलिस और एमसीडी के चक्कर लगाने पड़ते हैं। देश भी दूसरा है और यहां के निमय भी दूसरे हैं।












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