सीएम बनने का सपना तो टूटा, क्या आदित्य ठाकरे अब डिप्टी सीएम भी बन पाएंगे ?

नई दिल्ली। एग्जिट पोल के संकेतों के मुताबिक भाजपा महाराष्ट्र में एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी बन रही है। शिवसेना के छोटे भाई की भूमिका में ही रहने की संभावना है। नम्बर गेम में शिव सेना के पिछड़ने से आदित्य ठाकरे के सीएम बनने की संभावनाओं पर पानी फिरता दिख रहा है। अब शिवसेना, भाजपा से मोलतोल की स्थिति में नहीं रहेगी। तब क्या आदित्य ठाकरे को डिप्टी सीएम बनाने का दांव खेला जाएगा ? भाजपा के महाराष्ट्र चुनाव प्रभारी और पार्टी के महासचिव भूपेन्द्र यादव ने जो बयान दिया उससे तो यही लगता है कि आदित्य ठाकरे की राह आसान नहीं होगी। उन्होंने कहा है कि यह सवाल समय से पहले पूछा जा रहा है। वैसे भी शिवसेना और भाजपा के बीच इस संबंध में कोई बात नहीं हुई है। भूपेन्द्र यादव ने कहा है, डिप्टी सीएम बनाना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इस संबंध में वही फैसला लेंगे। भूपेन्द्र यादव का यह बयान आदित्य ठाकरे के उप मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को धूमिल करने वाला है। हालांकि भूपेन्द्र यादव ने चुनाव की कड़वाहट को भुला कर शिवसेना को सबसे विश्वस्त और स्वभाविक सहयोगी बताया है।

गठबंधन में फिजिक्स-मैथेमेटिक्स

गठबंधन में फिजिक्स-मैथेमेटिक्स

भूपेन्द्र यादव भाजपा के नये क्राइसिस मैनेजर बन चुके हैं। प्रमोद महाजन, अरुण जेटली के बाद भाजपा ने एक नये तारणहार को गढ़ लिया है। भाजपा को जहां भी और जब भी किसी राजनीति चुनौती का सामना करना होता है, वह भूपेन्द्र यादव को सामने कर देती है। वे बिहार में भाजपा के प्रभारी हैं जहां नीतीश कुमार के साथ गठबंधन में सरकार चल रही है। भाजपा जानती थी कि महाराष्ट्र में चुनाव कठिन होने वाला है। उसने सोचविचार कर भूपेन्द्र यादव को महाराष्ट्र चुनाव का प्रभारी बनाया। उन्होंने मोदी-शाह की रणनीति को बखूबी अंजाम भी दिया। शिवसेना के साथ ने केवल टिकट बंटवारा के मसले को सुलझाया बल्कि उम्मीदवारों के चयन में भी अहम भूमिका निभायी। कुछ तल्खियों के बावजूद भूपेन्द्र यादव ने शिवसेना के लिए मीठे बोल बोले। उन्होंने कहा कि भाजपा और शिवसेना का मैथेमेटिक्स, केमेस्ट्री तो एक है ही, आइडियोलॉजी भी एक है। इस गठबंधन के मूल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। शिवसेना भी जानती है कि हम दोनों मिल कर ही बाहरी ताकतों से लड़ सकते हैं। आदित्य ठाकरे का चुनाव लड़ना हमारे गठबंधन के लिए और अच्छी बात है।

क्या गडकरी टिकट बंटवारे से अलग थे ?

क्या गडकरी टिकट बंटवारे से अलग थे ?

महाराष्ट्र के राजनीति हलके में चर्चा है कि केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी टिकट बंटवारे में अनदेखी से नाराज थे। इस नाराजगी के कारण उन्होंने टिकट वितरण वाले भाजपा कोर ग्रुप से खुद को अलग कर लिया था। भूपेन्द्र य़ादव ने इन बातों को बेबुनियाद करार दिया है। उन्होंने कहा कि नितिन गड़करी भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर जीतने योग्य प्रत्याशियों के चयन में अहम भूमिका निभायी है। विरोधियों ने उनके बारे में गलत प्रचार किया है। एग्जिट पोल के संकेतों के आधार पर कहा जा सकता है कि भाजपा ने सबसे अधिक योग्य उम्मदवारों को टिकट दिये। इसलिए अब ऐसी निर्थक बातों का कोई मतलब नहीं है। महाराष्ट्र के चुनावी प्रबंधन में भाजपा ने हर एक पहलू का ध्यान रखा था। भूपेन्द्र यादव का यह आत्मविश्वास अब नतीजों में तब्दील होता दिख रहा है। देवेन्द्र फडणवीस अगर पांच साल मुख्यमंत्री रहने के बाद फिर सीएम बनने वाले हैं तो यह एक ऐतिहासिक बात है। 1967 के बाद ऐसा पहली बार होगा कि कोई सीएम चुनाव जीत कर दोबारा सीएम बनने वाला है।

एजेंडा सेट करने में आगे हैं मोदी और शाह

एजेंडा सेट करने में आगे हैं मोदी और शाह

शरद पवार और कांग्रेस ने कहा था कि धारा 370 राष्ट्रीय मुद्दा है, यह विधानसभा चुनाव में कारगर नहीं हो सकता। लेकिन एग्जिट पोल के संकेत इसे झुठलाते हुए लग रहे हैं। मोदी- अमित शाह की जोड़ी ने चुनावी राजनीति में कई नयी मंजिलें तय की हैं। जीत-दर जीत ने भाजपा की हैसियत बदल दी है। कल तक शिवसेना की छत्रछाया में रहने वाली भाजपा अब महाराष्ट्र की सबसे मजबूत पार्टी बन चुकी है। 2014 में भाजपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा था। वह बहुमत से 23 सीटें पीछे रह गयी थी। शिवसेना ने मजबूर हो कर भाजपा को समर्थन दिया था। शिवसेना को ये डर हो गया था कि अगर उसने मौका गंवाया तो शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भाजपा सरकार को समर्थन दे देगी। शिवसेना की जो विचारधारा है वह केवल भाजपा से ही मेल खा सकती है। चाहे जितने मतभेद हों, चाहे जितनी नाराजगी हो, दोनों की मंजिल एक ही है। भाजपा शिवसेना का गठबंधन 1990 से चल रहा है जो भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे लंबा गठबंधन है।

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