मानहानि विवाद में Adani Group को बड़ी राहत, दिल्ली कोर्ट ने झूठे दावों के प्रसार पर लगाई रोक

Adani Defamation Case: दिल्ली की एक अदालत ने हाल ही में अदाणी समूह (Adani Group) से जुड़े मानहानि मामले में जो हस्तक्षेप किया है, उसे लेकर आलोचकों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार बताया। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला दरअसल इस बात का उदाहरण है कि किस तरह लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन कायम करती हैं।

अदालत ने शिकायत की गंभीरता को देखते हुए न तो जल्दबाज़ी में किसी की बात को अपराध घोषित किया और न ही आलोचना को दबाने की कोशिश की। इसके बजाय अदालत ने एक पारंपरिक और संतुलित रास्ता चुना-अंतरिम निषेधाज्ञा (interim injunction)।

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इसके तहत पत्रकार और कार्यकर्ता परांजॉय गुहा ठाकुरता समेत अन्य प्रतिवादियों को फिलहाल ऐसे आरोप प्रकाशित या प्रसारित करने से रोका गया है, जिन्हें न्यायाधीश ने प्रारंभिक तौर पर असत्यापित और प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाने वाला माना। साथ ही पहले से अपलोड की गई सामग्रियों को हटाने का निर्देश भी दिया गया।

अदालत का फैसला सेंसरशिप नहीं, एहतियात

विशेषज्ञों का कहना है कि यह सेंसरशिप नहीं बल्कि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक न्यायिक सतर्कता है। दरअसल, अमेरिका और यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में मानहानि कानून यह मानते हैं कि जब प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुँचने की आशंका हो, तो अंतरिम राहत ही मीडिया ट्रायल को रोकने का एकमात्र रास्ता हो सकती है।

इस मामले की ख़ासियत यह रही कि पहले से ही यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर सैकड़ों पोस्ट और वीडियो प्रसारित हो रहे थे। अदालत ने माना कि डिजिटल युग में इस तरह की सामग्री तेज़ी से फैलकर स्थायी दुष्प्रचार का रूप ले सकती है। इसी वजह से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को आदेश दिया गया कि वह इस फैसले के पालन को सुनिश्चित करे।

सरकार का काम सिर्फ़ पालन कराना

सरकार ने अदालत के आदेश के तहत 221 लिंक की सूची बनाई-138 यूट्यूब और 83 इंस्टाग्राम पर-और उन्हें हटाने के लिए प्लेटफ़ॉर्म को निर्देश दिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यही सही प्रक्रिया है: अदालत तय करती है कि क्या वैध है, सरकार अमल करवाती है और प्लेटफ़ॉर्म उसका पालन करते हैं। इसके उलट, अगर वैश्विक टेक कंपनियाँ भारतीय अदालतों के आदेशों पर सवाल उठाएँ, तो यह न्यायिक संप्रभुता का उल्लंघन होगा।

पत्रकारिता पर नहीं, अप्रमाणित आरोपों पर रोक

इस आदेश को प्रेस की आज़ादी पर हमला बताना पूरी तरह ग़लत है। अदालत ने न तो खोजी पत्रकारिता पर रोक लगाई और न ही आलोचनात्मक लेखन को दबाया। रोक केवल उन विषयों पर लगी है जिन्हें प्रारंभिक जाँच में तथ्यहीन पाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र पत्रकारिता का आधार तथ्य और साक्ष्य होते हैं। जिम्मेदार पत्रकार सबसे पहले यही सुनिश्चित करते हैं कि उनके आरोप सबूतों से समर्थित हों।

विदेशी कड़ियों पर भी शक

इस मामले में शामिल कई प्रोफ़ाइल भी ध्यान देने योग्य है। भारतीय कार्यकर्ताओं के साथ-साथ कुछ विदेशी वेबसाइट और संगठन भी इन आरोपों को लगातार बढ़ावा दे रहे थे। अदालत ने संकेत दिया कि यह कोई संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित मुहिम हो सकती है, जिसका मकसद भारतीय संस्थाओं और बड़े कॉरपोरेट घरानों की छवि को धूमिल करना है।

लोकतंत्र और प्रतिष्ठा का रिश्ता

अदालत ने अपने आदेश में साफ किया कि लोकतंत्र कमजोर नहीं होता जब न्यायपालिका कहती है कि प्रतिष्ठा भी मायने रखती है। निवेशक, कर्मचारी और उपभोक्ता सभी भरोसे पर निर्भर रहते हैं। अगर झूठी सूचनाएँ "स्वतंत्र पत्रकारिता" के नाम पर फैलाई जाती हैं, तो यह भरोसा टूटता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा असर डालता है। अदाणी मानहानि मामला आलोचकों की आवाज़ दबाने का प्रयास नहीं है। यह केवल उन पर लागू कानूनी सिद्धांतों की याद दिलाता है जो हर नागरिक पर लागू होते हैं-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन वह ज़िम्मेदारी से बंधी हुई है।

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