किसान की जान गई और आप नेता आशुतोष संवेदनहीन रहे
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष एक जमाने में हिन्दुस्तान टाइम्स में काम करते थे। तब हम दोनों मित्र थे। ये 1994 तक की बातें हैं। उस दौर में उन्हें बेहद संवेदनशील इंसान मानता था।
पर कल दिल्ली में एक किसान की ख़ुदकुशी के बाद उन्होंने जिस ढंग से रिएक्ट किया, उसके बाद से उनकी संवेदनशीलता संदिग्ध हो गई है। आपने एक सवाल के जवाब में कहा- क्या केजरीवाल पेड़ से लटकते।
पेड़ से लटकना केजरी का
बेशक, उस गजेन्द्र सिंह नामक किसान को बचाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को पेड़ पर नहीं चढ़ना चाहिए था, शाखाओं से नहीं लटकना चाहिए था लेकिन क्या करना चाहिए था, आपको पता है।
जज ने बचाई जान
वैसे किसी आदमी को को बचाने के लिए किसी खास आदमी को पेड़ पर चढ़ना भी पड़े को कोई गुनाह नहीं। वरिष्ठ लेखक अनामी शरण बबल भी आशुतोष की संवेदनहीनता से आहत हैं। वे कहते हैं किआपको पता होगा कि कुछ ही दिनों पहले चंडीगढ़ के सुकना लेक में डूबते हुए किसी शख्स को बचाने के लिए पास से गुज़र रहे हाईकोर्ट के जज पानी में कूद गए और डूबते -उतराते हुए उसे बचा लिया, जबकि वहाँ तमाशबीनों की तादाद कम नहीं थी। आज तो वहाँ आपके नेता और कार्यकर्ता सब थे। फिर भी ऐसा बयान कैसे दे सकते हैं आप आशुतोष?
मिस्त्री बनकर चढ़े पेड़ पर
दरअसल एक टीवी रिपोर्टर ने सही सवाल पूछा कि वोट लेने के लिए तो केजरीवाल बिजली कनेक्शन काटने ख़ुद बिजली मिस्त्री बनकर पहुँच सकते हैं तो यहाँ तमाशा क्यों देखते रह गए? जवाब में आपने जो कहा उसे सुनकर मुझे अफ़सोस है। आपके उटपटांग बयान की जानकारी मिलने पर यक़ीन नहीं था कि आपने ऐसा बयान दिया होगा, लिहाज़ा पूरे दिन चुप रहा। पर बाद सच सामने आ गया।
टीवी पर आपका बयान देखा तो रहा नहीं गया। वहाँ क्या हुआ? कैसे हुआ? गजेन्द्र कौन था? उसके इरादे क्या थे? उसे कैसे बचाया जा सकता था ? इन सवालों का जवाब तो मिल जाएगा। लेकिन आपके बयान को किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता। निंदनीय। याद रखिए दिनकर की पंक्तियाँ याद है न आपको-जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा, उनका भी अपराध।













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