'मेरा परिवार' से 'इट्स माइ फ़ैमिली' तक बदलाव का सफ़र

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पिता जी! मेरा दफ़्तर ख़ासा दूर पड़ जाता है लिहाज़ा मैं ऑफ़िस के पास एक कमरा लेने का विचार कर रहा हूं. लेकिन मैं वीकेंड पर घर आता-जाता रहूंगा.

पिताजी - लेकिन फिर परिवार का क्या होगा. तुम अकेले कैसे रहोगे?

पिछले कुछ सालों में इस तरह का संवाद शहरी घरों में आम हो गया है, जहाँ मामूली सुविधा के लिए, थोड़ी असुविधा से बचने के लिए लोग परिवार से अलग होने का फ़ैसला कर लेते हैं.

भारत में जहां एक परिवार की परिकल्पना एक साथ रहने पर होती थी और उसे हरे-भरे या खुशहाल परिवार की संज्ञा दी जाती थी. वहीं 21वीं शताब्दी में कहीं न कहीं इस भरे-पूरे घर का ढांचा सिमटता नज़र आता है.

हालांकि भारतीय समाज में पारिवारिक रिश्तों की डोर हमेशा ही बेहद मज़बूत मानी जाती रही है. ख़ानदानी रिश्ते, सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से लोगों के अंदर सुरक्षा का मज़बूत भाव पैदा करते रहे हैं. लोग बड़े ग़ुरूर से कहते हैं कि मैं फ़लां ख़ानदान से ताल्लुक़ रखता/रखती हूं. वहीं समाज में लोगों का सामाजिक दर्ज़ा इस बात से तय होता था कि वो किस परिवार से आते हैं.

भारत के अलग-अलग हिस्सों में परिवार की बनावट और इसके आकार में हमें बहुत विविधताएं देखने को मिलती हैं. किसी भी परिवार के वर्गीकरण की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होती है, शादी का तरीक़ा और परिवार में लोगों के अधिकार.

भारत की आज़ादी के बाद से अब तक अलग-अलग राज्यों में परिवार की सरंचना में विविधताएं दिखती हैं.

हिमालय की तराई के जौनसर बावर इलाक़े में यानी देहरादून से लेकर लद्दाख तक हमें तरह-तरह की पारिवारिक संरचनाएं दिखती हैं. इस इलाक़े में एक स्त्री और एक पुरुष के वैवाहिक संबंध (मोनोगैमी) वाले परिवार, बहुपत्नी प्रथा (पॉलीगेमी) और बहुपति प्रथा (पोलिएंड्री) आम थे. हालांकि अब इनकी तादाद कम हो रही है और अब यहां समाज के ज़्यादातर तबक़ों में मोनोगैमी ही आम है.

परिवार, संयुक्त परिवार, महिला
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वहीं पूर्वोत्तर राज्य मेघालय के गारो और खासी समुदाय में मातृसत्तात्मक परिवार देखने को मिलते हैं. इन समुदायों में पारिवारिक संपत्ति मां से बेटी को विरासत में मिलती है और पति अपनी पत्नियों के घर में रहते हैं.

इसी तरह, दक्षिणी राज्य केरल के नायर समुदाय में भी कुछ हद तक महिलाओं को परिवार में ज़्यादा अधिकार हासिल होते हैं. ये भी एक हक़ीक़त है कि महिलाओं की अगुवाई वाले इन समुदायों में परिवार का मुखिया के तौर पर पुरुष के होने का चलन बढ़ रहा है.

देश के बहुत से हिस्सों में संयुक्त परिवारों का चलन है. जिन्हें, आम तौर पर हिंदू संयुक्त परिवार कहा जाता है. हिंदुओं की ज़्यादातर आबादी के बीच हम ऐसे ही ख़ानदान देखते हैं. हालांकि, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों के बीच भी बड़े और संयुक्त कुनबे देखने को मिलते हैं.

भले ही इनकी बनावट या रंग-रूप अलग हों. ख़ास तौर से खेती-बाड़ी करने वाले समुदायों के बीच बड़े और संयुक्त परिवारों का चलन आम है ताकि सब लोग मिल-जुलकर काम करें.

परिवार, संयुक्त परिवार, महिला
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लेकिन, हिंदू संयुक्त परिवारों के मुक़ाबले अन्य समुदायों में ऐसे कुनबों को वो दर्ज़ा हासिल नहीं है जो हिंदुओं के बीच है. संयुक्त परिवारों में कुल देवता के लिए भोग को साझा रसोई में पकाया जाता है. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के मुताबिक़, हिंदू अविभाजित परिवार को एक क़ानूनी मान्यता भी मिली हुई है.

इस आधार पर हिंदू संयुक्त परिवारों को इनकम टैक्स से भी राहत मिलती है. इन्हीं वजहों से हम ये कह सकते हैं कि संयुक्त परिवारों की जो मान्यताएं और अहमियत हिंदुओं के बीच हैं. वो ग़ैर हिंदू समुदायों के संयुक्त परिवारों को हासिल नहीं हैं.

ऐसे संयुक्त परिवारों की ख़ूबी ये होती है कि इन में तीन या इससे भी ज़्यादा पीढ़ियों के लोग साथ रहते हैं. उन की संपत्तियां साझा होती हैं. रसोई एक साथ होती है और ख़ानदान के मुखिया आम तौर पर मर्द होते हैं, जिन्हें परिवार का कर्ताधर्ता कहा जाता है.

परिवार, संयुक्त परिवार
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भारत के खेतिहर समुदाय के बीच संयुक्त परिवार का उदय कब हुआ, इस का कोई सटीक वक़्त तो नहीं बताया जा सकता. ये कहना ही बेहतर होगा कि जब से भारत में संगठित रूप से खेती करने का चलन शुरू हुआ, उसके बाद से ही यहां के खेतिहर समुदायों के बीच संयुक्त परिवारों की संरचना का उदय हुआ और समय के साथ ये और विकसित होती गईं.

खेतिहर समुदायों के बीच ऐसे परिवारों का विकास उस वक़्त हुआ था जब खेती के लिए आधुनिक उपकरण इजाद नहीं हुए थे. ऐसे में बड़े परिवार खेती में बहुत मददगार होते थे क्योंकि खेती की ज़रूरत के वक़्त मेहनत के लिए तमाम हाथ इकट्ठे हो जाते थे और अन्य संसाधनों को भी आपस में साझा किया जाता था.

लेकिन, वक़्त गुज़रने के साथ-साथ समाज में आए बदलावों ने ऐसे कुनबों की बनावट पर भी असर डाला. संयुक्त परिवार बिखरने लगे, ताकि बदले हुए हालात और चुनौतियों का सामना कर सकें.

आपको बिमल रॉय की मशहूर फ़िल्म दो बीघा ज़मीन याद होगी. जिसमें एक किसान की भूमिका निभा रहे बलराज साहनी, साहूकार से अपनी ज़मीन छुड़ाने के लिए शहर जाते हैं और गाड़ी खींचने का काम करते हैं. वो जी-तोड़ मेहनत करते हैं और जब पैसे बचाकर अपनी गिरवी ज़मीन को छुड़ाने के लिए गांव लौटते हैं तो पता चलता है कि उनकी ज़मीन पर तो एक कारखाना खड़ा हो गया है.

वर्ष 1990 के बाद भारत में शहरीकरण और औद्योगीकरण का असर संयुक्त परिवारों पर भी पड़ा है. हमने इस के तमाम पहलू फ़िल्मों में भी देखे हैं. मज़े की बात ये है कि बड़े ख़ानदान वाले परिवार तो कमोबेश फ़िल्मी दुनिया से विलुप्त ही हो गए हैं. अब तो न्यूक्लियर फ़ैमिली यानी मियां-बीवी और एक-दो बच्चों वाले छोटे कुनबे भी फ़िल्मी परदे से गुम हो रहे हैं.

परिवार, संयुक्त परिवार
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हालांकि, ये भी एक हक़ीक़त है कि बहुत से कारोबारी समुदायों जैसे कि मारवाड़ियों के बीच, अब भी बड़े ख़ानदानों की परंपरा को मज़बूती से निभाया जा रहा है. इसकी वजह कारोबारी हित हैं. आप इसकी मिसाल, फ़िल्म, 'हम आप के हैं कौन' में देख सकते हैं, जो सुपरहिट रही थी.

यहां भारतीय समाज का एक और तथ्य है यहां परिवार, शादी-ब्याह और जाति व्यवस्था में बीच बेहद गहरा ताल्लुक़ रहा है. भारत में जाति व्यवस्था एक अहम पहलू है जहां अपनी ही जाति में शादी करने का चलन अभी भी है जिसे अंग्रेज़ी में एंडोगैमी कहते हैं.

इस चलन का नतीजा ये हुआ है कि इसके माध्यम से जाति व्यवस्था ने परिवार की बनावट से लेकर बच्चों की पैदाइश तक पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखा है. दो लोगों का रिश्ता इसी आधार पर तय होता है कि वो किस ख़ानदान से आते हैं.

ऐसे में ये हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए कि भारत में केवल पांच फ़ीसदी लोग ही अपनी जाति के बाहर ब्याह करते हैं. ऐसे में भारतीय समाज में बड़े बदलाव की बातें करना ही बेइमानी लगता है.

लेकिन एक बदलाव जो दिखाई देता है वो ये कि महिलाओं की तालीम में इज़ाफ़ा और उनके सशक्तिकरण ने परिवारों की बनावट को बदला है.

समलैंगिक रिश्ते
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महिलाओं को आगे बढ़ाने में सरकारी संस्थाओं और कई सुविधाओं का भी अहम रोल रहा है. जैसे कि कामगार महिलाओं के लिए छात्रावास, कामकाजी महिलाओं के बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच का इंतज़ाम, पूरी तनख़्वाह के साथ मैटरनिटी लीव जैसी अन्य सुविधाओं ने महिलाओं के सशक्तीकरण में बेहद अहम रोल निभाया है.

इन महिलाओं का दायरा किचन या घर की चारदिवारी से निकलकर बढ़ा है . 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़, (घर के बाहर) काम करने वाली कामकाजी महिलाओं की संख्या जहां शहरी इलाक़ों में महज़ 25.5 फ़ीसद थी. वहीं, ग्रामीण इलाक़ों में घरों से बाहर निकल कर काम करने वाली महिलाओं की तादाद क़रीब 89 प्रतिशत थी.

अब शहरों और क़स्बों में छोटे परिवारों चलन बढ़ रहा है. नौकरी के लिए लोग पलायन कर जाते है, परिवार नियोजन और महिलाओं का सशक्तीकरण इसकी प्रमुख वजहें हो सकती है. हालांकि परिवारों में अभी पितृसत्तात्मक सोच अब भी दिखाई देती है. पितृसत्ता से मतलब ये है कि महिलाओं या लड़कियों के जीवन के भी सभी बड़े फ़ैसले पुरुष ही करते हैं.

परिवार, संयुक्त परिवार, महिला
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अब महानगरों और दूसरे बड़े शहरों में अविवाहित लड़के और बड़ी तादाद में लड़कियां भी अपने मां-बाप से अलग रहने लगे हैं. इसकी वजह कभी, घर और उन के शिक्षण संस्थानों के बीच ज़्यादा दूरी होती है. तो कभी घर और दफ़्तर के बीच ज़्यादा फ़ासला कारण बनता है. हालांकि, परिवार से अलग रहने के बाद भी ये युवा पारिवारिक दायित्वों की डोर से बंधे रहते हैं.

भारतीय समाज में पारिवारिक मूल्यों में बदलाव लाने में एक और बात ने अहम भूमिका निभाई है. वो है 'लिव-इन रिलेशनशिप'. जहां दो व्यक्ति आपसी रज़ामंदी से बिना शादी किए साथ रहते हैं.

ये हिंदुस्तान के पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों से बिल्कुल हट कर है. जब से 'लिव-इन' संबंधों को क़ानूनी मान्यता मिली है. तब से, कुनबों की बनावट में एक और आयाम जुड़ा है. शादी के पारंपरिक रिवाजों को पहली बड़ी चुनौती अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादियों से मिली थी.

लेकिन, अब तो परिवारिक व्यवस्था को 'लिव-इन' के इस नए चैलेंज का भी सामना करना पड़ रहा है. क्योंकि, ये ज़रूरी नहीं है कि लिव-इन में रहने वाले जोड़े, आगे चल कर अपने संबंधों को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए शादी कर लें.

समलैंगिक रिश्ते
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बहुत से समलैंगिक जोड़ों के लिए भी यह एक ज़िंदगी जीने के एक नए तरीके के तौर पर उभरा है जहां वे साथ रह सकते हैं क्योंकि सामाजिक तौर पर वे शादी नहीं कर सकते.

कुछ लोग पैसों की वजह से ऐसे संबंध को तरजीह देते हैं. तो, कुछ अलग-अलग संप्रदाय के होने की वजह से शादी की बात पर पैदा होने वाले टकराव से बचने के लिए लिव-इन में रहने लगते हैं.

कई लोग दावा करते हैं कि ऐसे संबंधों को वैदिक युग में भी मान्यता मिली हुई थी. कई आदिवासी समुदाय भी 'प्रोबेशनल मैरिज' या अस्थायी वैवाहिक संबंधों को मान्यता देते हैं. जहां किसी जोड़े को एक तय वक़्त के लिए साथ रहने की इजाज़त मिलती है. हालांकि, भारतीय समाज के एक तबक़े ने पारिवारिक व्यवस्था के इस बदलाव को भी स्वीकार करना शुरू कर दिया है.

लेकिन, आज भी समाज में ज़्यादातर लोग दो लोगों के बिना शादी किए साथ रहने को अच्छा नहीं मानते इसीलिए 'लिव-इन संबंध' को सामाजिक रूप से व्यापक मंज़ूरी हासिल नहीं है. बड़े शहरों में भी समाज ने 'लिव-इन' संबंधों को बस बर्दाश्त करना सीख लिया है. उन्हें स्वीकार तो आज भी नहीं किया जाता.

तलाक़
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बड़े शहरों में बेहतर जीवन स्तर और नए-नए अवसरों ने देश के तमाम इलाक़ों के युवाओं को इन शहरों में आ कर बसने के लिए आकर्षित किया है. इन शहरों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसे बाहर से आए लोगों या अप्रवासियों का है. इन्हें दूसरों की ज़िंदगी से कोई ख़ास मतलब नहीं होता. आप हाल के बरसों में आई फ़िल्मों, जैसे-प्यार का पंचनामा, को काल्पनिक कहानी पर आधारित फ़िल्म न मानिए. ये आज के समाज की हक़ीक़त है.

इन तमाम कारणों से, आज भारतीय समाज में परिवार और शादी की व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आ रहे हैं. हालांकि, ये भी एक हक़ीक़त है कि अभी मुट्ठी भर लोग ही ऐसे बदलावों का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें स्वीकार कर रहे हैं. ज़्यादातर लोग अब भी पिछली शताब्दियों की ख़ानदानी परंपरा में यक़ीन रखते हैं.

इस संदर्भ में ये कहना ग़लत नहीं होगा कि आज भी हिंदुस्तान एक साथ कई युगों में जी रहा है. हमारे समाज में कई लोग आज भी अठारहवीं सदी की मान्यताओं के साथ जी रहे हैं. तो कुछ लोग ऐसे हैं, जो उन्नीसवीं-बीसवीं सदी के बदलावों के साथ आगे बढ़े हैं.

वहीं, समाज के गिने-चुने लोग ही इक्कीसवीं सदी के जीवन मूल्यों को स्वीकार कर पाये हैं. वरना, हम आज भी खाप पंचायतों के महिलाओं के ख़िलाफ़ फ़ैसलों को कैसे वाजिब ठहरा सकते हैं?

अलग-अलग जातियों और धर्मों के प्रेमियों की हत्या को कैसे जायज़ कहा जा सकता है? आज भी हमारा समाज जादू-टोने और झाड़-फूंक जैसी मध्यकालीन कुरीतियों और रूढ़ियों का शिकार क्यों बना हुआ है?

(नदीम हसनैन ,लखनऊ यूनिवर्सिटी में मानवशास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं. वो अमरीका के फुलब्राइट स्कॉलर इन रेज़िडेंस हैं, और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ सदस्य हैं.)

(इलस्ट्रेशन- पुनीत बरनाला, प्रोड्यूसर- सुशीला सिंह)

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