आजादी के 75 साल: देश के 5 ऐसे स्वतंत्रता सेनानी, जो इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गए
आजादी के 75 साल: देश के 5 ऐसे स्वतंत्रता सेनानी, जो इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गए
नई दिल्ली, 10 अगस्त: भारत की आजादी के 15 अगस्त 2021 को 75 साल पूरे होने वाले हैं। भारत को स्वतंत्र कराने के लिए लाखों देशवासियों ने ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिए अपना खून-पसीना बहाया है। सैकड़ों ने अंग्रेजी हुकूमतों के खिलाफ प्राणों की आहुति भी दी। इसमें से बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों के नाम तो हम जानते हैं कि लेकिन कईयों के नाम इतिहास के पन्नों में गुम में हो गए हैं। महात्मा गांधी, भगत सिंह, रानी लक्ष्मी बाई, बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस, मंगल पांडे और सरदार पटेल जैसे वीर स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी के मार्ग को प्रशस्त किया है। लेकिन इन नामों के अलावा कैसे ऐसे नाम भी हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया है। स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ पर आइए हम आपको पांच ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बताते हैं, जो तिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गए हैं।

1. अवध बिहारी
ये एक राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता सेनानी थे। अवध बिहारी ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थे। अंग्रेजी हुकूमतों के खिलाफ अवध बिहारी ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में मोर्चा संभाला था। वह राम बिहारी बोस के आंदोलन से जुड़े हुए थे। अवध बिहारी ने ही ब्रिटिश अधिकारी लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाई थी, जिन्होंने 1910 से 1916 तक भारत के वायसराय और गवर्नर-जनरल के रूप में काम किया था। अवध बिहारी को फरवरी 1914 में गिरफ्तार कर लिया गया था और मौत की सजा सुनाई गई थी। अवध बिहारी को 1 मई 1915 को अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी।

2. खुदीराम बोस
खुदीराम बोस अपने बचपन से ही ब्रिटिश शासकों के खिलाफ थे। खुदीराम बोस ने अंग्रेजों पर कई बम हमले किए थे। ब्रिटिश शासकों के नाक में दम करने वाले खुदीराम बोस 19 साल की छोटी सी उम्र में ही शहीद हो गए थे। 11 अगस्त 1908 को बम हमलों के आरोप में खुदीराम बोस को मौत की सजा सुनाई गई थी। फांसी के वक्त उनकी उम्र 18 साल 7 महीने 11 दिन थी। फांसी से पहले उनके अंतिम शब्द थे, 'वंदे मातरम'। खुदीराम ने अंग्रेजों पर कई बम हमले किए थे। जिनमें सबसे प्रमुख था मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड पर किया गया बम हमला।

3. बटुकेश्वर दत्त
1900 की शुरुआत में एक भारतीय क्रांतिकारी थे। व्यापार विवाद बिल के विरोध में बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली में 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा में भगत सिंह के बम विस्फोट किए थे। उन्होंने "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा भी लगाया था।
दिल्ली विधानसभा बम मामले में बटुकेश्वर दत्त को भगत सिंह के साथ ही आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। बटुकेश्वर दत्त ने भगत सिंह के साथ भारतीय राजनीतिक कैदियों के अपमानजनक व्यवहार के विरोध में एक ऐतिहासिक भूख हड़ताल भी शुरू की थी।

4. राम प्रसाद बिस्मिल
प्रसिद्ध काकोरी रेल डकैती की साजिश का नेतृत्व करने के लिए राम प्रसाद बिस्मिल का याद किया जाता है। राम प्रसाद बिस्मिल एक बहादुर क्रांतिकारी थी। राम प्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक सदस्यों में से भी एक थे। स्वतंत्रता सेनानी होने के अलावा बिस्मिल उर्दू और अंग्रेजी के एक महान कवि और लेखक भी थे। "सरफरोशी की तमन्ना" कविता भी उनके द्वारा लिखी गई है। काकोरी कांड में बिस्मिल को अशफाकउल्लाह खान और दो अन्य लोगों के साथ फांसी की सजा दी गई थी। 19 दिसंबर, 1927 को 30 साल की उम्र में बिस्मिल फांसी दे दी गई थी।

5. उधम सिंह
जलियांवाला बाग हत्याकांड के पीछे जिम्मेदार शख्स जनरल माइकल ओ डायर की हत्या की साजिश उधम सिंह ने रची थी। कहा जाता है कि शहीद उधम सिंह ने जलियांवाला बाग नरसंहार देखने के बाद शपथ ली थी कि वह इसका बदला जरूर लेंगे। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद उधम सिंह ने माइकल ओ डायर की हत्या की। हालांकि महात्मा गांदी और जवाहर लाल नेहरू दोनों ने उस समय उधम सिंह के बदले की भावना की निंदा की थी।
महात्मा गांधी ने टिप्पणी की थी, "आक्रोश ने मुझे गहरा दर्द दिया है। मैं इसे पागलपन का कार्य मानता हूं ... मुझे आशा है कि इसे राजनीतिक निर्णय को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी"। वहीं नेहरू ने अपने अखबार नेशनल हेराल्ड में लिखा था, "हत्या के लिए खेद है, लेकिन यह पूरी उम्मीद है कि इसका भारत के राजनीतिक भविष्य पर दूरगामी प्रभाव नहीं पड़ेगा" लेकिन सुभाष चंद्र बोस शायद एक मात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने उधम सिंह के उठाए कदम की सराहना की थी। उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को माइकल ओ डायर की हत्या के लिए पेंटनविले जेल में फांसी दी गई थी।












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