25 जून 1975: आपातकाल से बदतर हालात के दावों में कितना है दम, फिर कैसे एकजुट हो पा रहा विपक्ष?
इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी लागू कर लोकतंत्र की हत्या की थी। मौलिक अधिकारों को छीन लिया था। विरोध करने वालों को जेल में ठूस दिया गया था। कांग्रेस सरकार की पुलिस ने नीतीश कुमार को आरा के एक गांव से आधी रात को उठा लिया था। वह भी बंदूक के बल पर। जिस पुलिस दल ने नीतीश कुमार को गिरफ्तार किया तो उसे सरकार ने इनाम दिया था। लालू यादव भला कैसे इमरजेंसी के जुल्म को भूल सकते हैं। पुलिस ने उन्हें मीसा कानून के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल गिया था। लालू मीसा कानून को कभी भूले नहीं। इसलिए उन्होने अपनी पहली संतान का नाम ही मीसा रख दिया।

यह बिडम्बना है कि आज 48 साल बाद इंदिरा गांधी के पोता राहुल गांधी लोकतंत्र बचाने की बात कर रहे हैं। संविधान की हत्या तो इंदिरा गांधी ने की थी जब उन्होंने संसद का कार्यकाल अपने फायदे के लिए बढ़ा दिया था। आज उनके पोता राहुल गांधी संविधान बचाने की बात कर रहे हैं।
किसके कारण लालू-नीतीश ने जेल की यातना सही ?
कांग्रेस की जिस अधिनायकवादी सरकार की वजह से नीतीश कुमार और लालू यादव को जेल की यातना सहनी पड़ी थी आज वही कांग्रेस के सबसे प्रबल समर्थक हो गये हैं। ये दोनों नेता अब कांग्रेस में ही अपना भविष्य देख रहे हैं। अब जरा पुराने पन्नों को पलट कर देख लिया जाय कि नीतीश कुमार कैसे गिरफ्तार हुए थे। नालंदा जिला के रहने वाले और पटना में पढ़ने वाले नीतीश कुमार इमरजैंसी के दौरान आखिर कैसे भोजपुर (आरा) जिले के एक गांव में पहुंच गये थे। दरअसल भोजपुर जिले के दुबौली के रहने वाले महेन्द्र दुबे नीतीश कुमार के सहपाठी और मित्र थे।
जब पुलिस ने नीतीश और साथियों को घेर लिया
9 जून 1976 की रात। इमरजेंसी लगे लगभग एक साल होने को थे। कई विरोधी नेता और छात्र गिरफ्तार हो चुके थे। छात्र संघर्ष वाहनी के जो नेता भूमिगत थे वे अंदोलन की लौ जलाये रखने के लिए सक्रिय थे। पुलिस के मुताबिक, नीतीश कुमार की पहल पर भोजपुर जिले के सहार थाना के दुबौली गांव में आंदोलनकारियों की एक सभा बुलायी गयी थी। नीतीश के मित्र महेन्द्र दुबे के घर पर बैठक हो रही थी। उस समय आरा के डीएम थे के झा। वाई एन श्रीवास्तव एसपी थे। इन अधिकारियों को दुबौली में होने वाली मीटिंग की जानकारी मिल चुकी थी। पुलिस को इस बात की भी सूचना मिली थी कि आंदोलनकारी इमरजेंसी के एक साल पूरा होने पर 25 जून 1976 को कुछ बड़ा करने की योजना बना रहे हैं। करीब 20 पुलिसवाले सिविल ड्रेस में दुबौली गांव पहुंचे। बैठक जैसे ही शुरू हुई पुलिस ने महेन्द्र दुबे के घर को घेर
लिया।
पुलिस ने तब नीतीश पर तान दी थी बंदूक
नीतीश कुमार समेत 19 आंदोलनकारी वहां जमा थे। इन पर सहारा थाना में इनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया। नीतीश कुमार समेत छह नेताओं को मीसा के तहत नजरबंद कर लिया गया था। नीतीश कुमार की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को 2750 रुपये का इनाम भी
मिला था। यानी कांग्रेसी सरकार की पुलिस ने नीतीश को इनामी वांटेड बना दिया था। नीतीश कुमार ने हाल ही में विधान परिषद में चर्चा के दौरान खुद बताया था कि 1976 में उनकी गिरफ्तारी के समय पुलिस ने उन पर बंदूक तान दी थी। नीतीश कुमार जब भी किसी पुलिस वाले को बंदूक ताने देखते होंगे उन्हें इमरजेंसी को वो काली रात जरूर याद आती होगी।
लालू यादव भला कैसे भूल सकते हैं इमरजेंसी ?
इमरजेंसी से पहले बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हो चुका था। बिहार की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को खिलाफ छात्रों में गहरा असंतोष पैदा हो चुका था। छात्र आंदोलन के अगुआ जय प्रकाश नारायण ने छात्रों से जेल भरो अभियान का आह्वान किया था। इस अभियान के तहत लालू यादव ने भी गिरफ्तारी दी थी। शादी के बाद लालू यादव का तुरंत ही गौना हुआ था कि वे जेल चले गये। उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया था। लालू यादव को जेल में सूचना मिली कि वे पिता बनने वाले हैं। उनके साथी कभी कभी उनकी पत्नी राबड़ी देवी को मुलाकात के लिए जेल लाया करते थे। 22 मई 1975 को लालू यादव पिता बने। उनकी पहली पुत्री का जन्म हुआ। बेटी से मिलने के लिए वे पेरोल पर जेल से बाहर निकले। जब बेटी से मिले तो जेपी ने सुझाव दिया,चूंकि तुम्हारी गिरफ्तारी मीसा के तहत हुई है इसलिए बेटी का नाम मीसा रख दो। लालू यादव ने ऐसा ही किया। लालू यादव जब भी अपनी बड़ी बेटी को नाम से बुलाते होंगे उन्हें इमरजेंसी और उसकी यातना जरूर याद आती होगी।
अभी इमरजेंसी से भी खराब हालत कैसे ?
अब जब कांग्रेस का समर्थन करने के कारण नीतीश कुमार की आलोचना हो रही है तो जदयू बचाव में उतर आया है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह का कहना है, देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति इमरजेंसी से भी बदतर है। क्या सचमुच ऐसा है ? 25 जून 1975 को इमरजेंसी लागू हुई थी। करीब एक महीना बाद ही 22 जून 1975 को केन्द्र सरकार ने 38 वां संविधान संशोधन कर के न्यायपालिका को शक्तिविहीन बना दिया। इस संशोधन के बाद न्यायपालिका आपातकाल की समीक्षा नहीं कर सकती थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था। इसके कारण उन पर इस्तीफा देने का दबाव था। तब इससे बचने के लिए इंदिरा गांधी ने कोर्ट का अधिकार ही छीन लिया। 39वें संविधान संशोधन से उन्होंने व्यवस्था कर दी कि कि प्रधानमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति के चुनाव से संबंधित सुनवाई सिर्फ संसद द्वारा गठित समिति ही कर सकती है, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट नहीं।
आज लोकतंत्र जिंदा है तभी विपक्षी राजनीति परवान चढ़ रही
42 वें संविधान संशोधन से मौलिक अधिकारों को छीनने की व्यवस्था कर दी गयी थी। राज्य में कानून व्यवस्था बनाये रखने के नाम केन्द्र सरकार कभी भी वहां सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी। क्या आज सचमुच ऐसा ही है ? अगर आज ऐसा होता तो राज्य सरकारें सीबीआइ जांच से पहले अपनी मंजूरी का कानून नहीं बना पातीं। ममता बनर्जी प्रशासनिक मामलों में जिस तरह से केन्द्र सरकार को लगातार चुनौती दे रही हैं क्या वह संभव हो पाता ?
क्या आज भी ऐसा ही है ?
जिस तरह से बिहार ने केन्द्र की असहमति के बाद भी जातीय जनगणना की शुरुआत की थी क्या वह इमरजेंसी में मुमकिन थी ? अगर कोर्ट ने रोक नहीं लगायी होती तो आज बिहार सरकार जातीय जनगणना करा चुकी होती। जिस रात इमरजेंसी लागू हुई थी उस रात अखबारों के दफ्तर की बिजली काट दी गयी थी ताकि समाचार पत्र छप नहीं सकें। बिना सेंसर अधिकारी की मंजूरी के राजनीतिक खबरों के प्रकाशन पर रोक लगा दी गयी थी। क्या आज भी ऐसा ही है ? जदयू, राजद और तृणमूल को अगर विपक्षी एकता करनी है तो वे करें, लेकिन लोकतंत्र के खत्म होने की दुहाई न दें। आज लोकतंत्र जिंदा है तभी वे इतनी आजादी से अपनी गतिविधियां संचालित कर पा रहे हैं।












Click it and Unblock the Notifications