Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

कारगिल के 'शेरशाह' के आगे नहीं टिक पाए पाक घुसपैठिए, कैप्टन बत्रा के इस मिशन ने बदल दी युद्ध की दिशा

Kargil war: भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध 26 साल पहले 3 मई 1999 को शुरू हुआ था। इस युद्ध में जहां भारतीय सेना ने दुनिया में अपने पराक्रम का शानदार प्रर्दशन किया। वहीं कई बहादुर जवानों को भी खोना पड़ा। वैसे तो इस युद्ध में लड़ने वाला हर जवान योद्धा था, लेकिन कुछ जवान ऐसे भी थे, जिन्होंने सबसे अलग छाप छोड़ी।

उन्हीं बहादुर जवानों में से एक थे परमवीर चक्र से सम्मानित शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा। इस युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने जिस तरह से पाकिस्तानी सैनिकों से लोहा लिया था उसका हर कोई कायल हो गया। कारगिल युद्ध का 'शेरशाह' करने जाने वाले विक्रम के शौर्य की कहानी हर किसी को गर्व से भर देती है।

25 year of Kargil war hero Param Veer Chakra Captain Vikram Batra shershah story

कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी आतंकियों के घुसपैठ की खबर मिलने के बाद 5 जून 1999 को लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा के बटालियन को आदेश में मिला कि वो द्रास पहुंचे। जिसके बाद वह 6 जून को द्रास पहुंच गए। विक्रम बत्रा को युद्ध शुरू होने के पांच सप्ताह बाद 19 जून 1999 को भारतीय हिस्से को छुड़ाने का टास्क मिला था। कैप्टन विक्रम बत्रा की टुकड़ी को श्रीनगर-लेह रास्ते के ठीक ऊपर सबसे महत्वपूर्ण चोटी 5140 को फतह करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

पीक 5140 को फतह करने की कहानी

श्रीनगर-लेह रास्ते के ठीक ऊपर सबसे महत्वपूर्ण चोटी 5140 को फतह करने के मिशन की जिम्मेदारी विक्रम को मिली। इस ऑपरेशन का नाम रखा गया 'शेरशाह'। ऑपरेशन 19 जून को रात में साढ़े आठ बजे शुरू करना था। तय किया गया कि, भारतीय तोपों की फायरिंग के बीच 20 जून की आधी रात को ऊपर चढ़ाई की जाएगी। कैप्टन बत्रा ने पूर्व दिशा से इस चोटी की तरफ बढ़े। दुश्मनों को इसकी भनक तक नहीं लगी

जब सैनिक टारगेट से 100 मीटर दूर रहते तब तोपों से फायरिंग बंद कर दी गई। जैसे ही तोपों से गोले दागने बंद किए गए। पाकिस्तानी सैनिक बंकरों से बाहर आए। तब तक भारतीय सैनिक चोटी पर पहुंच चुके थे। जिसके बाद भारतीय जवानों ने फायरिंग शुरु कर दी। अचनाक हुए हमले से पाकिस्तानी सैनिकों का साहस टूट गया। कैप्टन बत्रा की टीम ने कुछ ही मिनटों में दुश्मनों को मार गिराया। 20 जून 1999 को सुबह 3 बजकर 30 मिनट पर बत्रा की टीम ने प्वाइंट 5140 चोटी पर कब्जा कर लिया।

कैप्टन ने इस चोटी से करने के बाद रेडियो पर संदेश दिया कि 'ये दिल मांगे मोर'। इस ऑपरेशन के दौरान बत्रा को 'शेरशाह' कोड नेम दिया गया था। 5140 जीतने के बाद सेना के आला अफसरों ने बत्रा को युद्ध के दौरान ही प्रमोट करते हुए कैप्टन से नवाजा। अब नए मिशन के लिए सेना बत्रा और उनकी टीम को आराम देना चाहती थी लेकिन, बत्रा युद्ध से हटने को तैयार नहीं थे। उन्होंने सेना के अफसरों से आराम करने की सलाह पर जवाब में कहा- ये दिल मांगे मोर..।

प्वाइंट 4875 को तो जीत लिया लेकिन मौत से हार गए विक्रम

प्वाइंट 5140 चोटी पर फतह के बाद कैप्टन बत्रा की टीम को प्वाइंट 4875 चोटी पर कब्जे की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनकी टीम ने 7 जुलाई को मिशन शुरू किया। इस चोटी पर पहुंचना बहुत ही मुश्किल था, क्योंकि इसके दोनों तरफ खड़ी ढलान थी। दुश्मन सीधी नजर रख रहा था। जिसके चलते रात में इस चोटी पर चढ़ाई की गई। इस दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने पहले हैंड टू हैंड फाइट की और उसके बाद प्वाइंट ब्लैक रेंज से दुश्मन के 5 सैनिकों को मार गिराया।

कैप्टन इस दौरान बुरी तरह से जख्मी हो गए। गहरे जख्म होने के बाद भी बत्रा नहीं रुके, वो क्रॉलिंग करते हुए दुश्मन के करीब तक पहुंचे और ग्रेनेड फेंकते हुए पोजीशन को क्लियर कर दिया। अपने कैप्टन की इस बहादुरी ने उनकी टीम के जोश को हाई कर दिया। जख्मी विक्रम बत्रा को उनके सूबेदार ने रेस्क्यू करने की कोशिश की तो वो बोले तू बाल बच्चेदार है, हट जा पीछे। बत्रा की टीम के दो सैनिक जख्मी हो गए थे। बत्रा और रघुनाथ सिंह दोनों अपने चोटिल सिपाही को बचाने के लिए उठाकर नीचे ले जा रहे थे, तभी पाकिस्तानी स्नाइपर ने कैप्टन विक्रम बत्रा के सीने में गोली मार दी। लेकिन तब तक उनकी टीम प्वाइंट 4875 को दुश्मनों से वापस ले चुकी थी। इस हिल का नाम अब बत्रा टॉप है।

हिमाचल की मिट्टी का वीर सपूत

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में 9 सितंबर 1974 को विक्रम का जन्म हुआ था। बत्रा ने डीएवी स्कूल और उसके बाद सेंट्रल स्कूल पालमपुर में पढ़ाई की। 12वीं की पढ़ाई के बाद बत्रा चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज में साइंस से ग्रेजुएशन किया। कॉलेज में बत्रा एनसीसी एयर विंग में शामिल हुए। 1994 में बत्रा मर्चेंट नेवी के लिए चुना गया था, लेकिन उन्होंने अपना इरादा बदल दिया और साल 1995 में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने अंग्रेजी से एमए की पढ़ाई के लिए पंजाब विश्वविद्यालय में दाखिला लिया।

1996 में विक्रम बत्रा ने सीडीएस की परीक्षा दी। जिसमें उनका चयन हो गया। ट्रेनिंग के बाद 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर में लेफ्टिनेंट के पद पर पहली नियुक्ति मिली। साल 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण लिए।

25 year of Kargil war hero Param Veer Chakra Captain Vikram Batra shershah story

कैप्टन बत्रा की प्रेम कहानी

कैप्टन विक्रम बत्रा के शौर्य की कहानी की तरह उनकी लव स्टोरी भी दुनियाभर में फेमस है। विक्रम चंड़ीगढ़ की रहने वाली डिंपल चीमा से प्यार करते थे। विक्रम बत्रा और डिंपल चीमा की पहली मुलाकात पंजाब यूनिवर्सिटी के कॉलेज 1995 में हुई थी। पहली ही मुलाकात से दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे। डिंपल के परिवार को उनके रिश्ता मंजूर नहीं था। इसके बावजूद दोनों ने एक-दूसरे के साथ रहने का वादा किया।

एक बार मनसा देवी मंदिर में परिक्रमा करते हुए बत्रा ने डिंपल का दुपट्टा पकड़ रखा था। उनके अनुसार यह उनकी शादी थी। उन्होंने डिंपल के माथे पर सिंदूर भी लगाया था। कारगिल युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों शादी करने का इंतजार कर रहे थे। कैप्टन विक्रम बत्रा 1999 में शहीद हो गए। लेकिन डिंपल चीमा ने विक्रम के जाने के बाद कभी किसी से शादी नहीं की।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+