16 दिसंबर: वो भयानक काली रात और हैवानियत का नंगा नाच

नयी दिल्‍ली (ब्‍यूरो)। 16 दिसंबर, जी हां पिछले साल की इस तारीख को पूरा देश सहम गया था। कड़कड़ाती सर्दी के मौसम में दिल्ली के माथे से परेशानी के पसीने की बूंदें टपक रही थी। उसकी एक वजह थी और वो ये थी कि राजधानी दिल्‍ली की सड़कों पर चलती बस में 6 दरिंदों हैवानियत का जो नंगा नाच किया था उससे पूरा देश उबल रहा था। हर तरफ गुस्से की आग थी। हर तरफ जज्बातों का सैलाब था। और हर तरफ एक ही सवाल था कि क्या ये सूरत कभी बदलेगी? आज इस दर्दनाक वारदात को एक साल हो गये मगर सवाल यही कि क्‍या कुछ बदला है भारत?

शायद ही किसी को उसका नाम मालूम हो। किसी अखबार ने उसे नाम दे दिया- निर्भया, और देश के करोड़ों लोगों की भावनाएं उसके साथ जुड़ गयीं। हालांकि नाम तो उसे और भी मिले, किसी ने दामिनी कहा, तो किसी ने ज्योति, पर लोगों को संभवत: निर्भया नाम ही सबसे सटीक लगा और वह लोगों के गुस्से का आधार बन गयी। साधारण-सी लड़की ही तो थी निर्भया, पड़ोस में रहनेवाली किसी रीता या सुनीता की तरह। फिजियोथेरेपी प्रशिक्षु के तौर पर काम करनेवाली युवती, जिसे लेकर उसके पिता ने कुछ सपने संजो रखे थे। वह शायद एक आम लड़की की तरह पहले नौकरी ढूंढती और फिर शादी कर घर बसा लेती। क्या था उस साधारण-सी लड़की में, जिसने उसे असाधारण बना दिया?

निर्भया यानी जिसे डर ही न लगे। जब 6 वहशियों ने उसे बस में चढ़ा कर गेट बंद कर लिया होगा, तो क्या वाकई उसे डर नहीं लगा होगा? उसके साथी को लोहे की छड़ से मारने के बाद वे शैतान जब उसकी तरफ बढ़े होंगे, तो क्या उसने डर कर भगवान को याद नहीं किया होगा? हां, वह एक साधारण-सी लड़की ही थी, पर इस एक पल ने उसे असाधारण बना दिया। क्या यदि उसने उन दरिंदों के सामने घुटने टेक दिये होते तो उसका यही अंजाम होता? उसने खुद को यदि उन नर-पिशाचों को सौंप दिया होता तो क्या उसकी जान बच नहीं जाती? लेकिन उसे अपनी जान कहां बचानी थी, उसे तो अपनी इज्‍जत बचानी थी। उस एक पल में उसके भय ने उसे इतना हौसला दे दिया कि वह निर्भया हो गयी। वहशियों के शरीरों पर नाखून और दांत के गहरे निशान इस बात के प्रमाण बने कि उस एक क्षण में वह साधारण सी लड़की किसी जख्‍मी शेरनी में बदल गयी थी।

इस एक घटना ने उत्प्रेरक का काम किया। आग की इस लपट में न सिर्फ दिल्ली, बल्कि कोलकाता से लेकर बेंगलुरु तक झुलस गये। गौर करने वाली बात यह है कि उन तमाम शहरों का मध्यवर्ग सड़कों पर उतर आया, जहां लोगों को पड़ोस में पड़े डाके की खबर भी अगले दिन अखबार से ही मिलती है। पड़ोस की आराधना या रुखसाना के लिए शायद ही वे कभी ऐसा करते, पर निर्भया में उन्हें अपनी बहन-बेटी की झलक दिख पड़ी और वे खुद को रोक नहीं पाये। जिस जघन्यता से कुछ गुंडों ने इस कुकृत्य को अंजाम दिया था, वह किसी को भी हिला देने के लिए काफी था। हालांकि आज देश के उस बहादुर बेटी को सच्‍ची श्रृद्धाजंली देने का दिन है। तो आईए स्लाइडर में तस्‍वीरों के माध्‍यम से जानते हैं 16 दिसंबर की उस रात की घटना को:

16 दिसंबर को दिल्‍ली की सड़कों पर हुआ था हवस का नंगा नाच

16 दिसंबर को दिल्‍ली की सड़कों पर हुआ था हवस का नंगा नाच

अपने दोस्‍त के साथ फिल्‍म देख कर निकली पैरा-मेडिकल की छात्रा के साथ चलती बस में 6 लोगों ने सामूहिक बलात्‍कार किया। बलात्‍कार के दौरान उन दरिंदों ने उसे शारिरीक यातनाएं दी और उसके प्राइवेट पार्ट में जंग लगी रॉड डालकर नग्‍न अवस्‍था में जमा कर रख देने वाली ठंड में सड़क किनारे फेंक दिया गया। पहले तो उसे सफदरजंग अस्‍पताल में भर्ती कराया गया फिर उसे सिंगापुर रेफर कर दिया गया। सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्‍पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

दरिंदों में से एक ने की खुदकुशी, 4 को मिली फांसी और एक को कैद

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बलात्कारियों में से एक किशोर था इसलिए उसके खिलाफ सुनवाई जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में की गई। बोर्ड ने उसे तीन साल के लिए सुधार गृह में भेज दिया था। पीड़िता की मौत के पांच दिन बाद पुलिस ने पांच व्यस्क आरोपियों के खिलाफ बलात्कार, हत्या, अपहरण और सबूत मिटाने के आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कर लिया था। एक आरोपी राम सिंह 11 मार्च को तिहाड़ जेल में मरा हुआ पाया गया था और उसके खिलाफ मामला बंद कर दिया गया है। चार वयस्क आरोपियों अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और मुकेश पर फास्ट ट्रैक अदालत में मुकदमा चलाया गया। फास्ट ट्रैक अदालत ने उन्हें 13 सितंबर को मौत की सजा सुनाई। इस फैसले की पुष्टि के लिए यह मामला अभी उच्च न्यायालय में है।

आज भी हरे हैं निर्भया के परिजनों के जख्‍म

आज भी हरे हैं निर्भया के परिजनों के जख्‍म

दिल्‍ली गैंगरेप की शिकार पीड़िता के पिता ने कहा कि हमारे आंसू अभी तक सूखे नहीं हैं। हर दिन के गुजरने के साथ उसकी यादें और गहरी होती जाती हैं। घर पर कोई न कोई तो हमेशा रोता रहता है। पीड़िता के 48 वर्षीय पिता ने आंसुओं से भरी आंखों के साथ बताया कि हम कभी इससे उबर नहीं पाएंगे और वह हमारे बीच अभी भी जीवित है। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी जब भी कुछ पकाती है तो वह अपनी बेटी को याद करती है। भरी हुई आवाज से उन्होंने कहा कि जब भी हम खाना खाने बैठते हैं, मेरी पत्नी कहती है कि यह उसका पसंदीदा खाना है और हम उसके बिना ही इसे खा रहे हैं।

नेता बातूनी, कानून अफलातूनी और दकिया नूशी राजनीति

नेता बातूनी, कानून अफलातूनी और दकिया नूशी राजनीति

इस दर्दनाक घटना के एक साल बाद भी कुछ नहीं बदला। अगर बात करें तो सरकार ने इसी घटना के बाद निर्भया फंड की शुरुआत की थी। रपटें बताती हैं कि 1000 करोड़ रुपये के इस फंड से अभी तक एक रुपया भी नहीं खर्च किया गया है। वहीं दिल्ली सरकार ने हेल्पलाइन नंबर 181 शुरू किया। इस पर अब तक 6,52,786 कॉल आ चुकी हैं। मनचलों का दुस्साहस देखिए कि इस नंबर पर अश्लील कॉल आ रही हैं। 2012 के मुकाबले इस साल राष्ट्रीय महिला आयोग को रेप, छेड़खानी और घरेलू हिंसा जैसे मामलों की दोगुनी शिकायतें मिली हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद दिल्ली दूसरे नंबर पर है।

2 महीने में 500 में से केवल 24 मामले निपटे

2 महीने में 500 में से केवल 24 मामले निपटे

देश में रेप की घटनाओं में बढ़ोतरी के बीच महिलाओं के खिलाफ अत्याचार से जुड़े मामलों को त्वरित सुनवाई अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट) में निपटाने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि अब भी कई वर्ग सुनवाई में उम्मीद के अनुरूप तेजी नहीं आने की शिकायतें कर रहे हैं। दिल्ली में पिछले वर्ष 16 दिसंबर को गैंगरेप के बाद ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए छह फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया गया और 500 मामले सौंपे गए। इसके माध्यम से दो महीने में 24 मामलों की सुनवाई पूरी की गई।


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