यूपी की 11 लोकसभा सीटों पर कभी क्यों नहीं जीती एसपी-बीएसपी?

नई दिल्ली- सपा और बसपा की यूपी में कई बार अपने दम पर सरकारें रही हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले लगभग दो दशकों तक दोनों पार्टियों का उत्तर प्रदेश में दबदबा कायम रहा है। लेकिन, आप सुनकर हैरान होंगे कि इसके बावजूद राज्य की 11 लोकसभा सीटों से दो दशकों में इन दोनों पार्टियों का एक भी सांसद चुनकर लोकसभा नहीं पहुंचा है। आइए ये समझते हैं कि वो 11 सीटें कौन सी हैं, किन कारणों से वहां अबतक उन्हें सफलता नहीं मिली और 2019 के चुनाव में उनके लिए क्या संभावनाएं हैं?

उत्तर प्रदेश के वो 11 लोकसभा क्षेत्र

उत्तर प्रदेश के वो 11 लोकसभा क्षेत्र

यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से हम यहां जिन 11 लोकसभा क्षेत्रों की बात कर रहे हैं, उनमें राजधानी लखनऊ, देश की सांस्कृतिक राजधानी कहलाने वाली वाराणसी, कांग्रेस की फर्स्ट फैमिली का गढ़ माने जाने वाली अमेठी और रायबरेली की सीटें भी शामिल हैं। इनके अलावा बागपत, बरेली, पीलीभीत, कानपुर, मथुरा, हाथरस और कुशीनगर में भी दो दशकों से न तो साइकिल को मौका मिला है और न ही हाथी ही अपना लोहा मनवा पाया है। मजे की बात ये है कि इन सभी 11 सीटों में से इसबार भी 4 सीटों पर बुआ और बबुआ की पार्टी का खाता खुलने नहीं जा रहा है। क्योंकि, उन्होंने अमेठी और रायबरेली की सीटें राहुल और सोनिया के लिए छोड़ दी हैं और बागपत एवं मथुरा की सीट गठबंधन के तहत आरएलडी (RLD) के लिए छोड़नी पड़ी है।

यहां किसका रहा है दबदबा?

यहां किसका रहा है दबदबा?

अगर बात लखनऊ सीट की करें, तो ये 1998,1999 और 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सीट रही। जब अटल जी सक्रिय राजनीति से हटे तो उनकी जगह बीजेपी ने लालजी टंडन को 2009 में यहां से उम्मीदवार बनाया और वो वहां से जीतकर संसद पहुंचे। 2014 में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को वहां से सफलता मिली और वे इसबार भी वहां से भाजपा के उम्मीदवार हैं। इस सीट को बीजेपी का गढ़ माना जाता है और महागठबंधन इसबार अभी तक यहां से अपना प्रत्याशी भी तय नहीं कर पाया है। यही स्थिति कानपुर की भी है, जहां 1999 से लेकर 2009 के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस के टिकट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल जीतते रहे और 2014 में यह सीट बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी के खाते में चली गई। इस दफे बीजेपी ने वहां योगी सरकार के मंत्री सत्यदेव पचौरी को उतारा है, जिनके मुकाबले कांग्रेस की ओर से श्रीप्रकाश जायसवाल और एसपी के राम कुमार मैदान में हैं।

बात वाराणसी सीट की करें तो 2014 में यह तब देश की सबसे हाईप्रोफाइल सीट बन गई, जब नरेंद्र मोदी वहां से चुनाव लड़ने के लिए पहुंच गए। इसबार के आम चुनाव में भी यह देश की सबसे हॉट सीट है, जहां से चुनकर मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सपना संजो रहे हैं। 2009 में बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी वाराणसी से जीते थे और 2004 में वहां कांग्रेस के राजेश कुमार मिश्रा को जीत मिली थी। जबकि,1999 में वहां भाजपा के टिकट पर शंकर प्रसाद जायसवाल जीते थे। यही पैटर्न पीलीभीत लोकसभा चुनाव क्षेत्र में भी देखने को मिलती है, जिसपर 1999 से बीजेपी का लगातार कब्जा रहा है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी 1999, 2004 और 2014 में वहां से सांसद बनीं, 2009 में उनके बेटे वरुण गांधी ने जीत दर्ज की। वरुण इसबार भी पीलीभात से भाग्य आजमा रहे हैं, जिनका मुकाबला समाजवादी पार्टी के हेमराज वर्मा से हो रहा है। बरेली लोकसभा क्षेत्र का भी यही हाल है, 2009 को छोड़कर, यहां 1999 से लगातार केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार जीतते रहे हैं। 2009 में यहां कांग्रेस के प्रवीण सिंह जीते थे। संतोष गंगवार अबकी बार भी भाजपा के प्रत्याशी हैं और उनके मुकाबले में अखिलेश यादव ने अपनी सरकार में मंत्री रहे भगवान शरण गंगवार को उतारा है।

2019 में परंपरा टूटेगी?

2019 में परंपरा टूटेगी?

2019 के चुनाव में यूपी में जातीय समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। पहलीबार एसपी-बीएसपी और आरएलडी महागठबंधन बनाकर चुनाव मैदान में है। इनमें से अमेठी, रायबरेली और आरएलडी के लिए मथुरा और बागपत को छोड़कर बाकी 7 सीटों पर समाजवादी पार्टी के ही उम्मीदवार एनडीए से मुकाबला कर रहे हैं। जब इन चुनाव क्षेत्रों में सपा-बसपा के दो दशकों से नहीं जीत पाने का कारण पूछा गया, तो एसपी नेता एवं एमएलसी राजपाल कश्यप ने कहा कि, "राजनीति में कोई भी चीज हमेशा के लिए नहीं होती। परिस्थितियां बदलती रहती हैं। इस लोकसभा चुनाव में..... यह गठबंधन का समय है और हमारा उम्मीदवार जीतेगा, क्योंकि परिस्थितियां बदल चुकी हैं।" दरअसल, इनके भरोसे के पीछे वजह भी है। दलित+यादव+मुस्लिम वोट के दम पर महागठबंधन को अपने उम्मीदवारों की जीत का भरोसा होना स्वाभाविक है। राजनीतिक विश्लेषक जे पी शुक्ला बताते हैं कि राज्य में 22 फीसदी दलित, 45 फीसदी ओबीसी (OBC) और 19 फीसदी मुस्लिम वोट इसबार निर्णायक भूमिका में हैं। यानी अगर इस चुनाव में बीएसपी और एसपी एक-दूसरे का वोट आपस में ट्रांसफर कराने में सफल रहे, तो इन 7 सीटों पर इसबार उनका भी खाता खुल सकता है।

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