रायसीना डायलॉग में भारत अपने रुख को लेकर हुआ और मुखर

नई दिल्ली, 28 अप्रैल। विदेश मंत्रालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन रायसीना डायलॉग के आखिरी दिन एक सत्र को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खुश करने की कोशिश करने की जगह दुनिया से लेन देन करने के लिए अपनी पहचान पर विश्वास को आधार बनाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "हम कौन हैं इस बारे में हमें आत्मविश्वास-पूर्ण होना चाहिए. मुझे लगता है कि हमें दूसरे देशों की एक धुंधली परछाई बन कर उन्हें खुश करने की कोशिश करने की जगह दुनिया से हमारी असली पहचान के आधार पर ही लेन देन करना चाहिए."
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पश्चिम के दबाव का मुकाबला
जयशंकर ने आगे कहा, "दूसरे लोग हमें परिभाषित करते हैं, हमें किसी भी तरह दूसरों की स्वीकृति चाहिए, मुझे लगता है यह सब एक एक बीते हुए युग की बातें हैं जिसे अब हमें पीछे छोड़ देना चाहिए."
जयशंकर ने सम्मेलन के दौरान अलग अलग सत्रों को संबोधित किया और और कई बार भारत के रुख को रेखांकित किया. बुधवार 27 अप्रैल को ही उन्होंने यूक्रेन संकट पर कहा कि इस समय "लड़ाई को रोकने और बातचीत शुरू करने" पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है और कि समय इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए भारत सबसे अच्छी स्थिति में है.
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यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से ही पश्चिमी देश भारत के रुख को लेकर असहज रहे हैं, जिसकी उन्होंने बीच बीच में आलोचना भी की है. भारत ने कई बार युद्ध और हिंसा को खत्म करने की और बातचीत करने की अपील की है, लेकिन रूस की आलोचना करने में पश्चिम का साथ नहीं दिया है.
अमेरिका और यूरोपीय देश लगातार भारत पर रूस से दूरी बनाने का दबाव बना रहे हैं, लेकिन भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है. रायसीना डायलॉग के दौरान भारत ने अपने रुख को और भी मुखर रूप से सामने रखा.
भारत की दो टूक
यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला फोन डेय लायन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा की और कहा कि यूक्रेन में जो हो रहा है उसका असर हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर भी पड़ेगा.
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इशारों में ही रूस पर लगाए गए यूरोपीय प्रतिबंधों को समर्थन देने के लिए भारत से अपील करते हुए उन्होंने कहा, "हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सभी सदस्यों से अनुनय करते हैं कि वो लंबी चलने वाली शांति के लिए हमारी कोशिशों का समर्थन करें."
लेकिन इसके बावजूद भारत अपनी स्थिति पर कायम रहा. बल्कि जयशंकर ने अगले दिन एक सत्र के दौरान बोलते हुए पश्चिमी देशों को आड़े हाथों लिया. उन्होंने पश्चिमी देशों पर चीन की आक्रामकता को नजरअंदाज करने और अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी जैसी एशिया की सबसे बड़ी चुनौतियों को लेकर बेपरवाह रहने का आरोप लगाया.
यह रायसीना डायलॉग का सातवां अध्याय था और इसमें 90 देशों से करीब 200 वक्ताओं ने भाग लिया. इनमें फोन डेय लायन के अलावा संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष अब्दुल्ला शाहिद, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबॉट, स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री कार्ल बिल्ट जैसे नेता शामिल रहे.
Source: DW
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