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मुक्त व्यापार शुरू करने को तैयार भारत और ऑस्ट्रेलिया, किसे होगा फायदा

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन

नई दिल्ली. 18 फरवरी। ऑस्ट्रेलिया के व्यापार और पर्यटन मंत्री डैन टेहन पिछले हफ्ते भारत के दौरे पर थे. उनकी भारतीय वाणिज्य मंत्री और अन्य नेताओं से लंबी बैठकें हुईं, जिनका मकसद था अंतरिम मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देना.

पीयूष गोयल और डैन टेहन ने एक साझा बयान भी जारी किया, जिसमें कहा गया कि मार्च में बातचीत पूरी हो जाएगी. भारतीय वाणिज्य मंत्री ने कहा कि लगभग 30 दिन के भीतर अंतरिम समझौते का ऐलान हो जाएगा जिसमें दोनों देशों के हितकारी ज्यादातर पक्षों को शामिल किया गया है. मुक्त व्यापार समझौते के तहत वस्तुओं और सेवाओं के अलावा कराधान और आयात-निर्यात से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी शामिल किया गया है.

कैसे अंजाम तक पहुंचा समझौता?

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत करीब दस साल से चल रही थी लेकिन सहमति बनना मुश्किल रहा क्योंकि दोनों देशों के व्यापारिक हालात बहुत हद तक एक जैसे हैं. मेलबर्न की मोनाश यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले अर्थशास्त्री डॉ. विनोद मिश्रा कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया विकसित देश तो है लेकिन तकनीकी रूप से उतना सुदृढ़ नहीं है.

डॉयचे वेले हिंदी से बातचीत में डॉ. मिश्रा ने कहा, "ऑस्ट्रेलिया के व्यापारिक क्षेत्र वही हैं जो भारत के हैं. जैसे कि ऑस्ट्रेलिया का बड़ा निर्यात कृषि और खनन से आता है. भारत भी कृषि पर निर्भर देश है. इसलिए हितों का टकराव होना लाजमी है. लेकिन इसी से सहयोग की संभावनाएं भी पैदा होती हैं."

विशेषज्ञ पहले भी इस बात की ओर इशारा करते रहे हैं कि भारत अपने कई क्षेत्रों को लेकर संरक्षणवाद की नीति पर चल रहा है, जिस कारण मुक्त व्यापार समझौते में दिक्कत आ रही है. लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों देशों के रुख में बदलाव नजर आया, जिसका परिणाम अंतरिम समझौते के रूप में सामने आ रहा है.

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विशेषज्ञ मानते हैं कि रुख में बदलाव के पीछे अमेरिका और चीन के बीच हुई तनातनी और चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में गिरावट भी जिम्मेदार रही है. विदेश मंत्रालय में काम कर चुके पूर्व ऑस्ट्रेलियाई राजनयिक जस्टिन ब्राउन ने द इंटरप्रेटर पत्रिका में एक लेख में इस बात का जिक्र भी किया था.

ब्राउन ने लिखा, "भारत कम उत्साहित रहा है लेकिन समझौते पर जारी बातचीत को दो वजहों से नई जिंदगी मिली. एक तो अमेरिका-चीन की प्रतिद्वन्द्विता और चीन को लेकर भारत की चिंताएं जिन्होंने भारत को नए रणनीतिक और आर्थिक साझीदार बनाने के लिए तैयार किया."

ब्राउन कहते हैं कि दूसरा कारण है कोविड-19 के कारण हुए आर्थिक नुकसान ने भारत को आर्थिक बहाली के लिए नए बाजार खोजने पर केंद्रित किया है और अब वह अहम बाजारों तक पहुंचने को प्राथमिकता दे रहा है.

मुलाकातों के बाद दोनों देशों के मंत्रियों ने इस बात पर जोर दिया कि व्यापारिक सौदेबाजी के दौरान एक दूसरे की संवेदनशीलताओं का ध्यान रखा गया है. ऑस्ट्रेलिया के व्यापार मंत्री डैन टेहन ने कहा, "ऑस्ट्रेलिया ने यह बात समझी है कि दूध, बीफ और गेहूं भारत के लिए संवेदनशील क्षेत्र हैं."

डॉ. विनोद मिश्रा कहते हैं कि दुग्ध और कृषि क्षेत्र के संवेदनशील होने की वजह आर्थिक और राजनीतिक दोनों हैं. वह कहते हैं, "भारत में दूध और खेती छोटे किसानों के जीवनयापन का आधार है. और वहां जो मौजूदा परिस्थितियां हैं उनमें आयात बढ़ने से इन छोटे किसानों के लिए मुश्किलें पैदा होने की संभावना है."

क्या-क्या है समझौते में?

अंतरिम मसौदे में दोनों देशों के बीच कृषि क्षेत्र पर सबसे अहम समझौता हुआ है. दोनों देशों के बीच उत्पादों पर कर छूट देने के लिए अंतरिम समझौते का प्रयोग किया गया है. इसका अगला चरण समग्र रणनीतिक व्यापार समझौते के रूप में आने वाले महीनों में पूरा होने की संभावना है.

जिन उत्पादों और सेवाओं पर दोनों देशों ने विशेष रूप से बात की है, उनमें वाइन और शिक्षा के आदान प्रदान प्रमुख हैं. भारत ने ऑस्ट्रेलिया की वाइन पर करों में सशर्त छून देने की बात कही है. भारत की शर्त यह है कि आयातित उत्पाद न्यूनतम अर्हता मूल्य से अधिक होने चाहिए, तभी वे कर छूट के योग्य होंगे.

भारत में आयातित वाइन पर 150 प्रतिशत तक कर लगता है. वाइन ऑस्ट्रेलिया का एक प्रमुख निर्यात है और वह भारत के विशाल बाजार तक अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है. पिछले साल जब डैन टेहन भारत की यात्रा पर गए थे तो उन्होंने कहा था, "इससे ज्यादा आनंद मुझे और किसी बात में नहीं आएगा कि मैं भारत को ऑस्ट्रेलिया की कुछ बेहतरीन वाइन सस्ते दामों पर उपलब्ध करवा सकूं. इसे हम हासिल करना चाहते हैं."

भारत का वाइन उद्योग भी तेजी से तरक्की कर रहा है. उसे विदेशी वाइन के आने से अपना बाजार सिकुड़ने की आशंकाएं हैं. कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहोलिक बेवरेज कंपनी (CIABC) ने वाणिज्य मंत्रालय को एक पत्र भेजकर कहा, "मुक्त व्यापार समझौते के तहत छूट पाने के लिए उत्पाद में क्षेत्रीय सामग्री की कीमत 70 प्रतिशत होनी चाहिए. यानी उसमें 70 प्रतिशत स्थानीय चीजें होनी चाहिए."

वीजा क्षेत्र

शिक्षा और पर्यटन अन्य ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर दोनों देशों में विशेष तौर पर बातचीत हुई है. ऑस्ट्रेलिया में पिछले कुछ सालों से सबसे ज्यादा पर्यटक भारत से ही आ रहे हैं. दोनों देशों ने पिछले हफ्ते ही एक सहमति पत्र पर दस्तखत कर एक-दूसरे के पर्यटकों को और ज्यादा बढ़ावा देने पर सहमति जताई है.

मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारतीय छात्रों को ऑस्ट्रेलिया में विशेष वीजा सुविधाएं देने की संभावना तलाशी जा रही है. शिक्षा उद्योग ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था का पांचवां सबसे बड़ा क्षेत्र है. भारत से आने वाले छात्रों की संख्या वहां सबसे ज्यादा होती है, जिस पर देश के तमाम निजी और सरकारी विश्वविद्यालय निर्भर करते हैं.

यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया भारतीय छात्रों को लुभाना चाहता है. अपने दिल्ली प्रवास के दौरान डैन टेहन ने भारतीय छात्रों के एक दल से मुलाकात कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि ऑस्ट्रेलिया के लिए उनकी कितनी अहमियत है. ऑस्ट्रेलियाई अखबार सिडनी मॉर्निंग हेरल्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019-20 भारतीय छात्रों से देश को 6.6 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर यानी लगभग 355 अरब भरतीय रुपयों की कमाई हुई थी.

भारतीयों को नहीं मिलता ऑस्ट्रेलिया का यह खास वीजा

मुक्त व्यापार समझौते में अपने कुशल युवाओं और छात्रों को वीजा छूट भारत की अहम मांग है. दोनों देशों में इस बात की संभावना तलाशी जा रही है कि भारतीय छात्रों को पढ़ाई के बाद तीन से पांच साल तक वीजा बढ़ाने की छूट दी जाए. फिलहाल, पढ़ाई के बाद अंतरराष्ट्रीय छात्रों को ऑस्ट्रेलिया में काम करने के लिए एक से दो साल तक का वीजा दिया जाता है.

मुक्त व्यापार से किसे होगा फायदा?

अर्थशास्त्री डॉ. विनोद मिश्रा कहते हैं कि शुद्ध अर्थव्यवस्था के नजरिए से देखा जाए तो मुक्त व्यापार हमेशा और सभी के लिए लाभप्रद होता है. उन्होंने डीडबल्यू से कहा, "ज्यादातर अर्थशास्त्री मानते हैं कि अगर सरकार लोगों को बेरोक-टोक व्यापार करने दे तो उसके फायदे हमेशा नुकसान से ज्यादा होते हैं."

हालांकि, डॉ. मिश्रा मानते हैं कि छोटी अवधि में कुछ लोगों को मुक्त व्यापार से नुकसान हो सकता है, लेकिन आमतौर पर ज्यादातर लोगों को फायदा ही होता है. वह कहते हैं, "भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही कई मामलों में संवेदनशील हैं लेकिन कुछ क्षेत्रों में भी अगर रुकावटें हटाई जाती हैं, टैक्स घटाया जाता है तो निश्चित तौर पर दोनों देशों में रेवन्यू बढ़ेगा."

वित्त वर्ष 2021 में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 12.5 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. वित्त वर्ष 2022 के पहले दस महीनों में ही यह 17.7 अरब डॉलर को पार कर चुका है. भारत ने 12.1 अरब डॉलर का आयात किया है जबकि 5.6 अरब डॉलर का निर्यात किया है. भारत के मुख्य आयातित उत्पादों में कोयला, सोना और लीक्विड नेचरल गैस हैं जबकि भारत से डीजल, पेट्रोल, कीमती पत्थर और गहनों का निर्यात हुआ है.

Source: DW

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