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Himachal Pradesh Disasters: 2018 से अब तक 148 बादल फटे, 294 बाढ़- 5000 से ज्यादा भूस्खलन, 275 सड़कें ठप!

Himachal Pradesh Natural Disasters Report: हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। गुरुवार, 24 जुलाई को अधिकारियों ने खुलासा किया कि 2018 से अब तक राज्य में 148 बादल फटने, 294 अचानक बाढ़ और 5,000 से ज्यादा भूस्खलन की घटनाएं हो चुकी हैं।

कुल्लू, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और मंडी जैसे जिले इन आपदाओं के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। यह जानकारी विशेष सचिव (राजस्व-आपदा प्रबंधन) डी.सी. राणा ने केंद्रीय बहु-क्षेत्रीय दल (MSCT) की बैठक में दी।

Himachal Pradesh Natural Disasters

केंद्रीय दल की बैठक और चिंताएं

गृह मंत्रालय द्वारा गठित MSCT ने गुरुवार को शिमला में अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) के.के. पंत की अध्यक्षता में बैठक की। इस बैठक में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं के कारणों और रोकथाम पर चर्चा हुई। पंत ने केंद्रीय जल आयोग (CWC) और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) से राज्य में गहन अध्ययन करने और आपदा-प्रवण क्षेत्रों का आकलन करने की मांग की। उन्होंने जोर देकर कहा कि जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए आपदा के बाद की प्रतिक्रिया से ज्यादा पहले से योजना बनाने की जरूरत है। इसके लिए उन्नत सेंसर लगाकर डेटा संग्रह को बेहतर करने का सुझाव भी दिया गया।

मानसून का कहर: सड़कें, बिजली और जलापूर्ति ठप

20 जून 2025 को मानसून की शुरुआत के बाद से हिमाचल में बारिश से जुड़ी घटनाओं ने तबाही मचाई है। राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (SEOC) के अनुसार, इस सीजन में 42 अचानक बाढ़, 25 बादल फटने और 28 भूस्खलन की घटनाएं हुईं, जिनमें 79 लोगों की मौत हो चुकी है और 34 लोग लापता हैं। इन आपदाओं से ₹1,387 करोड़ का नुकसान हुआ है।

गुरुवार शाम तक भारी बारिश के कारण राज्य में 275 सड़कें बंद हो गईं, जिनमें मंडी जिले का राष्ट्रीय राजमार्ग-70 (मनाली-कोटाली) भी शामिल है। मंडी में सबसे ज्यादा 165 सड़कें प्रभावित हैं। इसके अलावा, 56 बिजली ट्रांसफार्मर और 173 जलापूर्ति योजनाएं भी बाधित हैं।

सबसे ज्यादा प्रभावित जिले

कुल्लू, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और मंडी में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं सबसे ज्यादा हुई हैं। ये क्षेत्र अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और अनियोजित निर्माण ने इन आपदाओं को और गंभीर बना दिया है।

सरकार का क्या रुख?

केके पंत ने कहा, 'हमें आपदा प्रबंधन में तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल करना होगा। सेंसर और डेटा विश्लेषण से हम भविष्य की घटनाओं का पहले से अनुमान लगा सकते हैं।' उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से दीर्घकालिक समाधान पर काम करने की बात कही।

हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या चिंताजनक है। 2018 से अब तक 148 बादल फटने और 5,000 से ज्यादा भूस्खलन ने राज्य की कमजोर स्थिति को उजागर किया है। मानसून सीजन में हुए नुकसान और सड़कों के बंद होने से स्थानीय लोगों और पर्यटकों को भारी परेशानी हो रही है। सरकार को अब पहले से बेहतर योजना, उन्नत तकनीक, और सख्त नीतियों के जरिए इन आपदाओं से निपटने की जरूरत है।

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