हिमाचल चुनाव के लिए कांग्रेस नहीं बना पा रही रणनीति, हर दिन पार्टी में पड़ रही फूट

हिमाचल चुनाव के लिए कांग्रेस नहीं बना पा रही रणनीति, हर दिन पार्टी में पड़ रही फूट

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया समाप्त हो गई है और प्रदेश की 68 सीटों के लिए 561 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाने मैदान में उतर रहे हैं। तो वहीं, प्रदेश में भी सियासी माहौल गरमाया हुआ है। सरकारी कर्मचारी हों या फिर आम आदमी मौजूदा भाजपा सरकार से नाराज चल रहा है। तो दूसरी ओर बढती महंगाई और बेरोजगारी ने लोगों को परेशान कर दिया है। इस सबके बावजूद प्रदेश कांग्रेस के कई नेता लगातार कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम रहे हैं। पार्टी में पड़ी रही फूट के चलते कांग्रेस हिमचाल चुनाव को लेकर कोई खास रणनीति नहीं बना पा रही है।

Himachal Pradesh Assembly Elections 2022 Congress Party Former CM Virbhadra Singh

लोग भी अभी तक अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं कि क्या कांग्रेस पार्टी का समर्थन करें या न करें? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण प्रदेश की सियासत में छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह की गैर मौजूदगी है। उनके निधन के बाद पार्टी में जो शून्य पैदा हुआ, उसकी भरपाई अभी तक कोई नहीं कर पाया है। वीरभद्र सिंह के बिना कांग्रेस पार्टी संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी में कद्दावर नेता के अभाव में संगठन की एकता तार-तार हो रही है और निराशा के भाव में पार्टी नेता भाजपा में जा रहे हैं। अनिश्चितता के इस माहौल का लाभ भाजपा को मिलता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस आलाकमान ने कुछ माह पहले पंजाब पैटरन पर हिमाचल में कांग्रेस अध्यक्ष को हटाकर नए अध्यक्ष के तौर पर वीरभद्र सिंह की पत्नी सांसद प्रतिभा सिंह की तैनाती की थी।

प्रतिभा सिंह के साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष भी तैनात किए। लेकिन यह फार्मूला ज्यादा देर तक नहीं चल पाया। विडंबना है कि चार में से दो कार्यकारी अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष भाजपा में चले गए। जाहिर है कि संगठन में बदलाव करने का लाभ पार्टी को नहीं मिला और पार्टी के लोग कांग्रेस छोड़ भाजपा में जा रहे हैं। पार्टी के उपाध्यक्ष विधायक लखविंदर राणा, कार्यकारी अध्यक्ष पवन काजल जो कि कांगड़ा से विधायक हैं, ने भी पार्टी को अलविदा कह दिया। पार्टी में मची भगदड़ के बीच लगातार पार्टी छोड़ रहे हैं। गंगू राम मुसाफिर भी पार्टी छोड़ चुके हैं। उन्होंने पच्छाद से निर्दलीय चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। वहीं, मेजर विजय सिंह मनकोटिया और राकेश कालिया ने भी पार्टी छोड दी है। पूर्व सांसद सुरेश चंदेल भी अब भाजपाई हो गए हैं। कई स्थानों पर टिकट न मिलने से कांग्रेसी मुंह फुलाए बैठे हैं।

कांग्रेस पार्टी को प्रदेश में तीन लोग संभाल रहे हैं। जिनमें प्रतिभा सिंह, नेता प्रतिपक्ष और प्रचार समिति अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू हैं। लेकिन नामांकन भरने के अंतिम दिन तक तीनों ही नेताओं का आपसी तारतम्य नहीं बन पाया है। कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद एक सर्वमान्य नेता को आगे लाने में पूरी तरह नाकाम रही है। जिससे पार्टी में गुटबाजी को हवा मिल रही है। प्रदेश कांग्रेस इन दिनों तीन खेमों में बंटती नजर आ रही है। पार्टी प्रभारी राजीव शुक्ला के पास हिमाचल आने का समय ही नहीं है। कांग्रेस पार्टी का हर दांव फेल होता जा रहा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पार्टी को चुनावों से पहले ही मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना चाहिए था। ताकि पार्टी में अनिश्चितता का माहौल खत्म होता।

बताया जा रहा है कि प्रतिभा सिंह और मुकेश अग्निहोत्री अपने-अपने तरीके से अपने लिए गोटियां बिठाने में लगे हैं। तो दूसरी ओर सुखविंदर सिंह सुक्खू भी अपनी दावेदारी मजबूत करने में लगे हैं। अपनी दावेदारी के सवाल सुक्खू ने बताया कि मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश रखने में कोई बुराई नहीं है। आलाकमान इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि पार्टी के सत्ता में लौटने के बाद संभावित नेता कौन हैं या वास्तव में राज्य का नेतृत्व करने के गुण कौन रखते हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या मैं इस पद के लिए योग्य नहीं हूं? मेरी अपनी हैसियत और योग्यता है। मैंने जमीनी स्तर से पार्टी के सर्वोच्च पद तक काम किया है और राज्य में कांग्रेस को मजबूत किया है। मेरी पहली प्राथमिकता कांग्रेस को सत्ता में लाना है इसके लिए पार्टी को एकजुट होना जरुरी हैं।

कांग्रेस नेता ही मानते हैं कि हिमाचल प्रदेश में पार्टी इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। आज पार्टी को पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह जैसे कद्दावर नेता की जरूरत है। जो सबको साथ लेकर चल सके। व चुनावों में जीत दिला सके। वीरभद्र सिंह हमेशा ही पार्टी के लिए संकटमोचक साबित हुए। उन्होंने कई चुनाव अकेले ही जीतवा दिए, लेकिन आज हालात अलग हैं। माना जा रहा है कि हालात न सुधरे तो भाजपा इस मौके का पूरा फायदा उठाने का प्रयास करेगी।

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