Himachal Elections 2022: टिकट के नाम पर बहन और भाई में जंग
Himachal Elections 2022: राजनीति में स्वार्थ सर्वोपरि है। इसमें भावनाओं की कोई कद्र नहीं। रिश्ते-नाते सब बेमानी। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में पिता की जगह पुत्र को टिकट मिल गया तो बेटी ने बगावत कर दी। उसने सवाल उठाया, पिता की विरासत हमेशा बेटों को ही क्यों ? बेटियों को क्यों नहीं? अगर संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति भी बेटा और बेटी में फर्क करे तो यह नीति और मर्यादा के खिलाफ है। हिमाचल प्रदेश के जलशक्ति मंत्री महेन्द्र ठाकुर सात बार विधायक रह चुके हैं।

उन्होंने अगर-अलग सिम्बल पर जीत का रिकॉर्ड बनाया है। इसके लिए उनका नाम गिनिज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है। लेकिन बेटे-बेटी की लड़ाई से उनकी साख को धक्का लगा है। इस बार महेन्द्र ठाकुर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। भाजपा ने उनकी जगह उनके बेटे रजत ठाकुर को धर्मपुर से टिकट दिया है। महेन्द्र ठाकुर की बेटी वंदना गुलेरिया भाजपा महिला मोर्चा की महामंत्री थीं। वे भी टिकट के लिए दावेदार थीं। जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो उन्होंने भाजपा छोड़ दी। अब निर्दलीय चुनाव लड़ने पर अड़ी हैं। हालांकि महेन्द्र ठाकुर का दावा है कि वंदना को चुनाव नहीं लड़ने के लिए मना लिया गया है। लेकिन वंदना के तेवर ढीले नहीं पड़े हैं।

पार्टी सर्वे में अव्वल फिर भी टिकट नहीं
महेन्द्र ठाकुर के उत्तराधिकार के लिए वंदना और रजत में बहुत पहले से लड़ाई चल रही थी। वंदना भाजपा की राजनीति में सक्रिय थीं और पिता का उत्तराधिकारी बनना चाहती थीं। तीन बार जिला परिषद का चुनाव लड़ा। दो बार उन्हें जीत मिली। वंदना का कहना है, दो बार जिला परिषद सदस्य रह चुकी हूं। पार्टी के लिए दिन रात मेहनत की और जब टिकट देने का समय आया तब दरकिनार कर दिया गया। मैं दो बार यूं ही तो जिला पार्षद नहीं बन गयी ? जनता के लिए कुछ काम किया होगा सभी जीत मिली। लोगों के बीच मेरी एक पहचान है। टिकट पाने की तमाम योग्यता रखती थी। पार्टी सर्वे में धर्मपुर सीट पर मैं पहले पायदान पर थी। यह सोच कर टिकट के लिए आवेदन नहीं दिया। अचानक मेरे भाई रजत को टिकट दे दिया गया।

क्या पिता की जगह बेटी नहीं ले सकती ?
मैं सोचती रह गयी कि मेरा टिकट क्यों काट दिया गया ? क्या महिला होने की वजह से मेरा टिकट गया ? क्या पिता की जगह बेटी नहीं ले सकती ? क्या भाजपा दिखावे के लिए महिला सशक्तिकरण का नारा लगाती है ? दस साल से भाजपा की राजनीति कर रही थी। जब तक आप महिलाओं को टिकट नहीं देंगे तो उनकी राजनीतिक सहभागिता कैसे बढ़ेगी ? दिल्ली में बैठ कर चुनाव की जमीनी हकीकत को नहीं समझा जा सकता। किसे वोट मिलेगा और किसे नहीं, यह चुनाव क्षेत्र में जा कर ही समझा जा सकता है। बेटी के इस विद्रोह से महेन्द्र ठाकुर परेशान हैं। एक तरह से वंदना ने उन्हें ही चुनौती दी है कि उन्होंने बेटे को क्यों टिकट दिला दिया । वंदना की यह नाराजगी रजत ठाकुर को भारी पड़ सकती है।

मंत्री के पुत्रमोह से बेटी नाराज
वंदना ने वाजिब सवाल उठाया है। देश के नेता दूसरों को आदर्शवाद का पाठ पढ़ाते हैं। सरकार भी कहती है-बेटा और बेटी एक समान। बेटियों को पढ़ाने और बढ़ाने का नारा लगाया जाता है। लेकिन हकीकत क्या है? कम पढ़े लिखे या अनपढ़ लोगों की बात तो छड़िए, संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी पुत्रमोह से ग्रसित हैं। वे खुद तो बेटी को बेटे के बराबर दर्जा नहीं देते लेकिन देश की जनता को इसकी सीख जरूर देते हैं। क्या बेटी पिता की राजनीतिक विरासत नहीं संभाल सकती ? वंदना के इस सवाल ने महेन्द्र ठाकुर को विचलित कर दिया है। वे गुरुवार को अपनी बेटी को मनाने के लिए उनके घर गये। मां ने भी वंदना को समझाया। लेकिन महेन्द्र ठाकुर और उनकी पत्नी को बेटी से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला।

जगजीवन राम ने बेटे की बजाय बेटी को आगे बढ़ाया
भारत के अधितर नेता पुत्रमोह से ग्रसित रहे हैं। कांग्रेस से अगर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की चर्चा होती है तो सोनिया गांधी के पुत्र राहुल गांधी का नाम आता है। प्रियंका का नहीं। लालू यादव ने अपना उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव का बनाया। बेटी मीसा भारती को नहीं। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। लेकिन पूर्व उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम इन सब नेताओं से अलग थे। उन्होंने अपने बेटे सुरेश राम (अब स्वर्गीय) की बजाय बेटी मीरा कुमार को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। योग्यता के मामले मीरा कुमार अपने भाई सुरेश से बहुत आगे थीं। जगजीवन राम सुरेश को राजनीति से दूर रखना चाहते थे। लेकिन घर के दबाव और सुरेश की जिद के सामने जगजीवन राम को एक हद तक झुकना पड़ा। 1972 के बिहार विधानसभा चुनाव में सुरेश राम को मोहनिया से कांग्रेस का टिकट मिला। सुरेश राम जीत कर विधायक बने।

लेकिन बेटे के मंत्री नहीं बनने दिया
1972 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला था। जगजीवन राम कांग्रेस के दिग्गज नेता थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नजदीकी भी थे। ऐसे में सुरेश को बिहार में मंत्री बनाने की तैयारी होने लगी। लेकिन जगजीवन राम ने ऐसा किये जाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, सुरेश पहली बार विधायक बने हैं। उन्हें अभी बहुत कुछ सीखना है। मंत्री पद देना जल्दबाजी होगी। सुरेश राम विधायक तो बन गये लेकिन बिहार विधानसभा की बैठक में वे गिने चुने दिन ही आये। पांच साल इसी तरह गुजर गये। सत्र के दौरान सुरेश दिल्ली में रहते। ये बात जगजीवन राम को बहुत अखरती थी। 1977 में जब सुरेश ने फिर टिकट मांगा तो जगजीवन राम ने इंकार कर दिया। उन्होंने अपने बेटे को राजनीति छोड़ देने की सलाह दी थी। जगजीवन राम के निधन के एक साल पहले 1985 में उनकी बेटी मीरा कुमार सांसद बनी थीं। बाद में वे अपने पिता की उत्तराधिकारी बनी।
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