Raakh Review: दिल दहला देने वाली सच्ची घटनाओं से प्रेरित है ये क्राइम थ्रिलर, 'राख' अंदर तक झकझोर देगी
वेब सीरीज: राख (Raakh)
स्टारकास्ट: अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर, राकेश बेदी
डायरेक्टर: प्रोसित रॉय
एपिसोड:8
OTT प्लेटफॉर्म: अमेजन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video)
स्टार: 4 (****)
Raakh Review: ओटीटी प्लेटफॉर्म पर क्राइम थ्रिलर की कोई कमी नहीं है लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो एंटरटेनमेंट से कहीं आगे जाकर दर्शकों के दिल और दिमाग पर जबरदस्त असर छोड़ती हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर आज यानी 12 जून 2025 (शुक्रवार) को रिलीज हुई 'राख' एक ऐसी ही वेब सीरीज है। 'पाताल लोक' जैसी चर्चित सीरीज के निर्देशक प्रोसित रॉय इस बार एक ऐसे अपराध की कहानी लेकर आए हैं, जिसने कभी पूरे देश को हिला कर रख दिया था।

अपराध, दर्द और इंसाफ की कहानी है 'राख'
ये केवल अपराधियों की तलाश की कहानी नहीं है बल्कि उन परिवारों की पीड़ा, बेबसी और इंसाफ के लिए लंबी लड़ाई का भावनात्मक दस्तावेज भी है, जिनकी जिंदगी एक क्रूर घटना ने हमेशा के लिए बदल दी थी।
क्या है वेब सीरीज 'राख' की कहानी?
-'राख' वेब सीरीज की शुरुआत दिल्ली के एक साधारण लेकिन खुशहाल परिवार से होती है। टीचर मोना अरोड़ा अपने दोनों बच्चों को एक कार्यक्रम में भेजते हुए ये सोच भी नहीं सकतीं कि ये मुलाकात उनकी आखिरी सामान्य शाम साबित होगी। सेना अधिकारी अशोक अरोड़ा और उनकी पत्नी की जिंदगी उस वक्त पूरी तरह बदल जाती है जब उनके बच्चे रहस्यमयी तरीके से लापता हो जाते हैं।
-बच्चों की तलाश की जिम्मेदारी पुलिस अधिकारी जयप्रकाश उर्फ जेपी को सौंपी जाती है। जांच आगे बढ़ती है तो कहानी कई ऐसे अंधेरे रास्तों पर पहुंचती है, जहां मानवता शर्मसार होती दिखाई देती है। इसी दौरान दो ऐसे अपराधियों का चेहरा सामने आता है, जिनकी क्रूरता किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अंदर तक हिलाकर रख सकती है। जैसे-जैसे रहस्य की परतें खुलती हैं, दर्शक एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करता है जहां डर, असुरक्षा और दर्द लगातार उसका पीछा करते हैं।
पारंपरिक थ्रिलर नहीं, एक भावनात्मक इन्वेस्टिगेशन ड्रामा है 'राख'
'राख' की सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये दर्शकों को अपराधी कौन है, इस सवाल में उलझाकर नहीं रखती। यहां कहानी का फोकस अपराधियों की पहचान से ज्यादा उस दर्द, संघर्ष और न्यायिक प्रक्रिया पर है जो किसी भी बड़े अपराध के बाद शुरू होती है। निर्देशक प्रोसित रॉय ने 70 और 80 के दशक के माहौल को बेहद वास्तविक तरीके से पर्दे पर उतारा है। दिल्ली की सड़कों से लेकर उस दौर की सामाजिक बेचैनी तक, हर फ्रेम कहानी के माहौल को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
सीरीज की धीमी रफ्तार लेकिन गहरा असर
आठ एपिसोड की ये वेब सीरीज अपने विषय की गंभीरता के अनुरूप धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। शुरुआत में इसकी रफ्तार कुछ दर्शकों को धीमी लग सकती है लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, ये भावनात्मक रूप से आपको अपने साथ बांध लेती है। सीरीज लगातार एक ऐसा तनाव बनाए रखती है जो हर एपिसोड के साथ और गहरा होता जाता है। यही वजह है कि ये केवल देखने की नहीं बल्कि महसूस करने की कहानी बन जाती है।
लेखन और तकनीकी पक्ष
-लेखकों ने कहानी को केवल अपराध तक सीमित नहीं रखा है बल्कि न्याय व्यवस्था, पुलिस जांच और पीड़ित परिवारों की मानसिक स्थिति को भी बारीकी से दिखाया है। अपराधियों के मनोविज्ञान को जिस तरह कहानी में पिरोया गया है, वह इसे साधारण क्राइम ड्रामा से अलग बनाता है।
-सिनेमैटोग्राफी सीरीज की बड़ी ताकतों में से एक है। कैमरा उस दौर की दिल्ली और मुंबई को इतनी बारीकी से जीवंत करता है कि दर्शक खुद को उसी समय का हिस्सा महसूस करने लगता है। बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन कई सीन्स को और ज्यादा प्रभावशाली बना देते हैं। हालांकि एडिटिंग कुछ जगह और ज्यादा कसाव मांगती है लेकिन सीरीज का भावनात्मक प्रभाव इतना मजबूत है कि ये कमी ज्यादा खलती नहीं।
सीरीज की दमदार स्टारकास्ट और उनकी जबरदस्त एक्टिंग
-अली फजल इस सीरीज के लीडएक्टर हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारी जयप्रकाश के किरदार में बेहतरीन अभिनय किया है। उनका किरदार एक नायक का है लेकिन इसके बावजूद वह सुपरहीरो जैसा नहीं लगता बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह सामने आता है जो अपनी सीमाओं के भीतर रहकर न्याय की लड़ाई लड़ रहा है।
-सोनाली बेंद्रे ने एक मां के दर्द, टूटकर बिखर जाने और असहायता को बेहद संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा है। उनका अभिनय कई सीन्स में दर्शकों को इमोशनल कर देता है। आमिर बशीर भी एक ऐसे पिता के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं, जो अंदर से टूट चुका है लेकिन अपने परिवार के लिए मजबूती से खड़ा रहने की कोशिश करता है।
-राकेश बेदी, दिव्येंदु भट्टाचार्य, विवान शर्मा और दिव्या शर्मा अपने-अपने किरदारों में पूरी तरह फिट बैठते हैं। वहीं अपराधियों की भूमिका निभाने वाले कलाकार अपने भयावह अभिनय से दर्शकों को असहज करने में सफल रहते हैं।
क्लाइमैक्स के बाद भी पीछा नहीं छोड़ती 'राख'
'राख' उन सीरीज में से नहीं है जिन्हें देखकर आप आसानी से भूल जाएं। इसका प्री-क्लाइमैक्स और अंत लंबे समय तक दिमाग में बना रहता है। कहानी खत्म होने के बाद भी इसके कई सीन और भावनाएं दर्शकों को परेशान करती रहती हैं।
ये सीरीज देखें या नहीं?
-अगर आपको डार्क, गंभीर और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली क्राइम थ्रिलर पसंद हैं, तो 'राख' आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है। ये मनोरंजन के साथ-साथ समाज के एक बेहद दर्दनाक सच से भी रूबरू कराती है। हालांकि हल्के-फुल्के कंटेंट या तेज रफ्तार थ्रिलर पसंद करने वाले दर्शकों को इसकी धीमी गति चुनौतीपूर्ण लग सकती है।
-'राख' सिर्फ एक क्राइम सीरीज नहीं बल्कि इंसाफ, दर्द और मानवीय संवेदनाओं की गहरी पड़ताल है। शानदार अभिनय, मजबूत निर्देशन और भावनात्मक कहानी इसे इस साल की सबसे प्रभावशाली वेब सीरीज में शामिल कर देते हैं।












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