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हिमाचल के सीएम जय राम ठाकुर के सामने हैं पहाड़ सी चुनौतियां

By Rajeevkumar Singh
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    शिमला। हिमाचल प्रदेश के तेरहवें मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर को पहाड़ की राजनिति में अब भी पहाड़ सी चुनौतियों से सामना करना पड़ेगा। मुफलिसी में बचपन में बिताये समय के बाद उम्र के इस पड़ाव पर राजनीति के क्षितिज पर पहुंचकर लंबे समय तक टिके रहने के लिये उन्हें कांटो भरे रास्तों से गुजरना होगा। एक तरफ प्रदेश की राजनिति में अपने आपको फिट करने के लिये उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनों से जूझना होगा, चूंकि सीएम बनते ही जिस तरीके से व्रिकम जरियाल व नरेन्द्र बरागटा के मंत्री न बनने पर उनके समर्थकों में गुस्सा फूटा है वह उनके लिये शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।

    प्रदेश की माली हालत खराब

    प्रदेश की माली हालत खराब

    वहीं सियासी भंवर से निकल कर प्रदेश की माली हालत सुधारने के लिये भी उनके सामने पहाड़ सी चुनौती उनके सामने है। पिछली सरकार की देनदारियों के हजारों करोड़ रुपए को उतारने के लिये उन्हें प्रयास करने होंगे। 52 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज से मुक्ति पाने के लिए प्रयास शुरू करने होंगे। प्रदेश की कानून व्यवस्था को सुधार पुलिस लोगों का भरोसा लौटाने के लिये उन्हें संजीदा कदम उठाने होंगे। वहीं प्रदेश के नए मुख्यमंत्री को शक्ति केंद्रों से भी समन्वय बनाना होगा। इसमें केंद्र व राज्य के बीच संबंधों की मजबूत डोर भी शामिल है। मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले कई वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना भी एक बड़ी चुनौती नए मुख्यमंत्री के लिए रहेगी।

    वेतन आयोग की सिफारिश को लागू करने की चुनौती

    वेतन आयोग की सिफारिश को लागू करने की चुनौती

    जय राम ठाकुर पांच बार विधायक चुने गए हैं लेकिन बतौर मुख्यमंत्री यह उनका पहला तजुर्बा होगा। लिहाजा सरकार के संचालन में उन्हें जल्द परिपक्व होना पड़ेगा। प्रशासनिक अमले को संभालना भी उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इनमें आईएएस, एचएएस अधिकारियों को उनकी विशेष योग्यता के साथ विभिन्न विभागों व जिलों में तैनाती में गंभीरता शामिल है। सरकार के सामने हाईकोर्ट से रद्द की गई रिटैंशन पॉलिसी पर अगले समाधान के लिए रास्ते निकालने होंगे। सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए लंबित नए वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी। केंद्र ने इसे लागू कर दिया है। पंजाब सरकार ने इसे लागू करने के लिए कमेटी का गठन कर दिया है।

    बेरोजगारी और माफियाओं से निपटने की चुनौती

    बेरोजगारी और माफियाओं से निपटने की चुनौती

    पूर्व सरकार की ओर से राज्य में चुनाव से एक वर्ष पहले से लेकर आखिरी तक की अरबों रुपए की घोषणाओं को धरातल पर लाना होगा। वर्तमान में राज्य में बेरोजगारी एक सबसे बड़ा मुद्दा है। भाजपा ने इस मुद्दे को चुनावों में भुनाते हुए सरकार बनाई थी। लिहाजा बेरोजगारी दूर करने के लिए उन्हें जल्द अहम कदम उठाने होंगे। भाजपा सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव लड़ी है। लिहाजा भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर गंभीरता बरतना भी सबसे बड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री ने राज्य चुनावों में माफियाराज पर जमकर हमला बोला था। लिहाजा, पूरे प्रदेश में फैले माफिया राज्य से निपटना और सुरक्षा एजेंसियों के मनोबल को बनाए रखना भी एक कड़ी चुनौती होगी।

    जय राम के पक्ष में कैसे बना माहौल

    जय राम के पक्ष में कैसे बना माहौल

    सीएम कैंडिडेट के उम्मीदवार धूमल के चुनाव हारने के बाद पार्टी के लिये धर्म संकट खड़ा हो गया था। हारने के बाद धूमल के समर्थकों ने भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने की पैरवी शुरू कर दी। इसी बीच जयराम ठाकुर का नाम आगे आया। दोनों पक्षों में टकराव तक सामने आ गया। इसके बावजूद पार्टी हाईकमान पर दबाव बढ़ता गया। धूमल और जयराम पक्षों में टकराव को देखते हुए पहले जेपी नड्डा का नाम सुर्खियों में आया। जेपी नड्डा का राजयसभा का कार्यकाल अप्रैल में खत्म होने को है और वह हिमाचल से ही पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और केद्र में मंत्री भी हैं। सूत्रों ने यहां बताया कि नड्डा के नाम पर सहमति हो गई थी और रविवार को उनको ही शिमला में सीएम पद के चयन के लिए आना तय हुआ था लेकिन शनिवार की रात को ही अचानक मामले में फिर मोड़ आया।

    सूत्र बताते हैं कि नड्डा के मामले में वही फैक्टर अवरोध के रूप में उनके विरोधियों की ओर से पेश किया जो धूमल के लिए कहा गया कि वह हारे हुए सीएम नहीं बन सकते हैं। नड्डा के लिए तर्क दिया गया कि वह भी क्योंकि विधायकों से बाहर के हैं तो उन्हें भी मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाए। हलांकि इस तर्क को नैतिकता की दृष्टि से हाईकमान ने सही माना लेकिन सूत्रों का कहना है कि यही तर्क नड्डा के मुख्यमंत्री बनने की राह में रोड़ा बन गया और तर्कों की इस परिभाषा को गढ़ने में नड्डा के खिलाफ कथित तौर पर पांडे फैक्टर की भूमिका काम कर गई। सूत्र बताते हैं कि जयराम का ससुराल पक्ष आरएसएस की बेहद करीबी रिश्तेदारी में है। खुद जयराम की धर्मपत्नी डा. साधना सिंह भी प्रचारक रह चुकी है। सूत्र बताते हैं कि विधायक के रूप में बड़ी योग्यता व जयराम के बहुपक्षीय समर्थन के आगे नड्डा व धूमल कहीं नहीं टिक पाए।

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    English summary
    Challenges before CM Jai Ram Thakur in Himachal Pradesh.

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