Haryana Chunav Result: हरियाणा में बीजेपी की तीसरी बार सरकार बनने के 5 बड़े फैक्टर
Haryana Result in Hindi: हरियाणा में जो चुनाव परिणाम आए हैं, वह कई चुनावी पंडितों को अप्रत्याशित लग रहा है। एग्जिट पोल भी बुरी तरह फेल हुए है। कहां कांग्रेस की बंपर बहुमत की संभावना जताई गई थी और कहां बीजेपी को अबतक का सबसे बड़ा बहुमत मिल रहा है। हरियाणा में कभी भी कोई सरकार लगातार तीसरी बार नहीं आई। लेकिन, भाजपा ने इस मिथक को भी तोड़ दिया है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि बीजेपी की इस बड़ी जीत में किन 5 बड़े फैक्टर ने काम किए हैं।
भाजपा हरियाणा की 90 सीटों में से 48 सीटें जीत चुकी है और कांग्रेस को 37 सीटें मिल रही हैं। आईएनएलडी गठबंधन को 2 और अन्य को तीन सीटें मिलीं हैं। हरियाणा 1966 में पंजाब से अलग होकर राज्य बना था। तब से लेकर अबतक कोई भी पार्टी वहां सरकार की हैट्रिक नहीं लगा सकी थी।

जाट फैक्टर
हरियाणा के वोटरों के बीच शुरू से यह संदेश पहुंचा कि इस बार जाट पूरी तरह से कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद हो चुके हैं। इसका परिणाम ये हुआ कि बीजेपी को गैर-जाट मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में आसानी हुई। इंडिया टुडे टीवी को सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के एक फेलो राहुल वर्मा ने बताया है, 'अगर कांग्रेस के पक्ष में जाट वोटों का पोलराइजेशन हुआ, तो भाजपा के पक्ष में काउंटर-पोलराइजेशन हुआ।'
जबकि, परिणामों में ऐसा नहीं नजर आ रहा है कि जाटों ने पूरी तरह से गोलबंद होकर कांग्रेस के लिए ही वोट किया है। जाट-बहुल 36 सीटों में से आधी से ज्यादा पर बीजेपी की बढ़त नजर आई है। इसके ठीक उलट लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने इन 36 जाट-बहुल सीटों में से 27 पर बढ़त बनाई थी।
कांग्रेस के चुनाव का कमान पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने पूरी तरह से अपने हाथों में संभाल रखा था और ऐसा लगता है कि वह इस भुलावे में रह गए कि उनके रहते जाट वोटर कांग्रेस छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। नतीजे संकेत दे रहे हैं कि बीजेपी ने जाट-बहुल सीटों पर अपने पूर्व सहयोगी दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी की जगह अपनी पैठ बना ली है।
अहिरवाल बेल्ट में फिर चला बीजेपी का जादू
बीजेपी ने दक्षिण हरियाणा के अहिरवाल इलाके पर भरोसा किया, जिसने पिछली दो बार (2014 और 2019) उसकी सरकार बनने में मदद की थी। 2024 में भी यह इलाका भाजपा के प्रति वफादार साबित हुआ है।
इलाके में 11 विधानसभा सीटें हैं और बीजेपी ने लगभग क्लीन स्वीप कर लिया है। लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को 10 ही सीटों पर बढ़त मिली थी। अहिरवाल नेता राव इंद्रजीत सिंह ने खुद को सीएम उम्मीदवार प्रोजेक्ट करके भी बीजेपी के प्रति वोटरों के ध्रुवीकरण में बड़ा योगदान दिया है।
शहरी सीटों पर बीजेपी का दबदबा कायम
गुड़गांव से भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह अहिरवाल नेता हैं। वह इस बार 6ठी बार लोकसभा चुनाव जीते हैं। यह शहरी क्षेत्र है, जो हमेशा से और हर जगह आमतौर पर बीजेपी के लिए मतदान करता रहा है। इस बार भी शहरी वोटरों ने अपनी वफादारी 'कमल' के ही प्रति जाहिर की है। शहरी सीटों पर बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की है।
एकजुटता के साथ लड़ी चुनाव
जहां कांग्रेस नेताओं की आपसी गुटबाजी किसी से छिपी नहीं रही, वहीं बीजेपी ने न सिर्फ सीएम नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया, बल्कि उनके पक्ष में एकजुट होकर पूरी तालमेल के साथ चुनाव भी लड़ी।
बीजेपी में सैनी के नेतृत्व को चुनौती देने की क्षमता किसी में नहीं रही और किसी ने कुछ कहा भी तो वह रणनीतिक बयान साबित हुआ, जो अब जाकर सफल हुआ है। पार्टी नेतृत्व ने सैनी के नेतृत्व पर पूरा यकीन जताया और उन्होंने जीत वाला परिणाम पार्टी के हाथों में सौंप दिया।
अपने भीतर ही कई मोर्चे पर लड़ती रही कांग्रेस
पूरे चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस पार्टी सार्वजनिक तौर पर बंटी हुई नजर आई। राहुल गांधी जैसे नेता ने नेताओं के मतभेदों को गंभीरता से सुलझाने की जगह मंच पर फोटो खिंचवा लेने में ज्यादा भरोसा दिखाया। परिणाम ये हुआ कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा के चेहरों पर हंसी तो नजर आ गई, लेकिन दिल की खटास कभी दूर नहीं हो पाई।
हुड्डा ने एक तरह से पूरी पार्टी पर कंट्रोल कर लिया था। 90 में से 72 टिकट अपने वफादारों में बांट दिए। उनकी नजर सिर्फ सीएम की कुर्सी पर लगी रही और कांग्रेस नेतृत्व के पास उनपर भरोसा करने के अलावा कोई उपाय नहीं था।
उनकी पार्टी संगठन पर पकड़ इस कदर बन चुकी थी कि उनको नाराज करने का मतलब था, पूरा चुनाव अभियान डीरेल हो सकता था। इसलिए न तो सैलजा पूरे लगन से काम कर सकीं और न ही रणनदीप सिंह सुरजेवाला को अपने बेटे के चुनाव प्रचार से ज्यादा हाथ बंटाने का कोई मौका मिल पाया।












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