राजसी पोशाक और हाथ में तलवार लेकर कुलदेवता के दरबार पहुंचे ज्योतिरादित्य सिंधिया, शाही मंदिर में किया पूजन
Jyotiraditya Scindia Royal Outfit on Dussehra
Jyotiraditya Scindia Dussehra 2024: दशहरे के मौके पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने राजसी अंदाज में दिखे हैं। शाही पोशाक पहन कर सिंधिया अपने राजवंश के पूजा घर देवघर पहुंचे हैं।
उन्होंने कुलदेवताओं को नमन किया और शाही शस्त्रों की पूजा की। इस दौरान बेटे महाआर्यमन सिंधिया भी उनके साथ थे। सालभर में एक दिन ग्वालियर के लोगों को केंद्रीय मंत्री का ये शाही अंदाज देखने को मिलता है।

पूजा अर्चना के दौरान शहनाई का वादन किया जाता है। साथ ही ढोल नगाड़े बजाए जाते हैं।ज्योतिरादित्य सिंधिया आज के दिन राज शाही पोशाक पहनकर सिंधिया राजवंश की परंपराओं का निर्वहन करते हैं। उनके साथ उनके बेटे महान आर्यमन सिंधिया भी राजशाही पोशाक में पूजा करने पहुंचे।
सिंधिया राजवंश के सभी सरदार सिंधिया का स्वागत करते हुए राजशाही शिंदे शाही पगड़ी में उनका स्वागत करते नजर आए हैं। पूजा के दौरान सिंधिया राजपरिवार के साथ-साथ सिंधिया राजघराने के सरदार और उनसे जुड़े लोग शामिल हुए।

गोरतलब है कि ग्वालियर का दशहरा पूरे देश में विख्यात है।यहां कई वर्षों से दशहरे के दिन सिंधिया राजपरिवार पूजा अर्चना और देव स्थानों के दर्शन करता है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार के महाराज कहलाते हैं।
इस नाते वह दशहरे पर ग्वालियर के महाराज बनकर राजवंश की परंपराओं को निभाते दिखाई देते हैं। राज शाही पोशाक में ही केंद्रीय मंत्री सिंधिया ने देशवासियों को दशहरे की शुभकामनाएं दी है।

आपको बताते चलेंकी पुराने दौर में गोरखी के कुल देवता मंदिर में शस्त्र पूजन के बाद महाराज बाड़े पर सैनिकों की ड्रिल होती थी। इस रॉयल जुलूस को देखने के लिए लोग महाराज बाड़े पर और परिवार की महिलाएं और बच्चे छतों पर चढ़ जाते थे। यहां से महाराज हाथी पर सवार होकर सीधे मांढरे की माता पहुंचते थे। जहां पर शमी पेड़ की पूजा की जाती थी। पूजा के दौरान मराठा सरदार फिर से मुजरा करते थे।
राजशाही खत्म होने के बाद सिंधिया परिवार में दशहरे की परंपराएं भी काफी सीमित हो गई हैं। फिर भी, परिवार के मुखिया इस दिन शस्त्र पूजा के लिए पूजा घर पहुंचते हैं। ज्योतिरादित्य, ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार के महाराज कहलाते हैं। इस नाते वह दशहरे पर ग्वालियर के महाराज बनकर राजवंश की परंपराओं को निभाते दिखाई देते हैं।












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